हैप्पी हग डे टु ऑल !!

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ये जो हग डे का प्रचलन है न जिसके कारण जिसे देखो गले पड़ने को आतुर नज़र आ रहा है..

ये अचानक से नहीं आया… न ही किसी वेलेंटाइन सप्ताह के लिए बनाया गया दिन है। ये सदियों से चली आ रही हमारी वो परम्परा है जिसे “भेंटने की परंपरा” कहते हैं पूर्वी क्षेत्र में।

भेंटने की ये परम्परा हमारे परिवारों ,रिश्तेदारों, और सामाजिक ताने-बाने में अपनत्व के एहसास को बरकरार रखे हुए हमारे जीवन की दिनचर्या का हिस्सा रही है जो आज भी ग्रामीण अंचलों में देखने को मिलती है ।

बेटी की विदाई हो या मेहमान की अगुआई या फिर सखी -सहेली से मुलाक़ात बिन भेंटे तो जैसे सब अधूरा से होता था…….. और ये आजकल के शहरी मॉर्डन कल्चर के बच्चे लोग hug डे मनाकर ख़ुद को ऐसा जता रहे हैं जैसे फॉरेन से कोई नया कल्चर लाये हों जो प्यार जताना सिखा रहा है।

हग डे सुनने में ही भद्दा लगता है हमें तो …वो क्या है कि हम ठहरे गंवार तो भेंटना ही हमें सुहाता है ….. अब ये नई जनरेशन क्या जाने “भेंटना” ये तो बस अंग्रेजी की भेंट चढ़ रही है..

(शालिनी सिंह)

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