गाँधी का अंधकार पक्ष

कांग्रेस ने गाँधी को बनाया और गाँधी ने कांग्रेस को..पर काले रंग पर कोई रंग नहीं चढ़ता..औऱ चढ़ता है तो फिर धुल जाता है धीरे- धीरे..

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सबसे पहले तो में.ये स्पष्ट कर देना चाहता हूँ.कि मैं गाधीं जी का बडा सम्मान करता हूँ और उन पर मुझे गर्व हैं लेकिन आपके प्रशन का उत्तर मैं एक इतिहास के विधार्थी होने के नाते दे रहा हूँ और इतिहास हर घटना का मुल्यांकन अपने स्वयं के सिद्धांत के अधार पर करता हैं वहाँ प्रेम, सम्मान, अदार जैसी चीजे मायने नही रखती इस कारण यदि मेरा उत्तर किसी को प्रभावित करें तो उसे इतिहास माना जायें मेरी स्वयं कि राय नहीं

चेतावनी:-जो लोग अपने विचार में परिवर्तन देखना नहीं चाहते वे कृप्या आगे ना पढें

गाधीं जी ने स्पष्ट रूप से भारत के अधुनिक इतिहास को प्रभावित किया हैं उस समय में शायद ही कोई दुसरा मनुष्य ऐसा था जिसे गाधीं जी के समकक्ष माना जा सकता था वे एक महान व्यक्ति थे लेकिन जैसा इतिहास हमे बताता हैं कोई भी व्यक्ति सर्वगुणसम्पन्न नहीं होता हैं और गांधी जी भी इसका अपवाद नहीं थें उनमें कुछ खामियां थी जो आगे चलकर राष्ट्र के उत्थान में बाधक साबित हुई उनमें से कुछ खामिया में यहाँ सुचीवार कर रहख हूँअपने मुल्यों की रक्षा के लिऐ उन्होंने कई बार राष्ट्र हित का त्याग किया:- वे अपने विचारो को लेकर काफी सजग थे 1910 से लेकर 1930 तक वे बिना किसी प्रमुख विरोध के अपने कार्य करते रहे लेकिन प्रथम और द्वतिय विश्व युध्द में भारतीयों कि हिस्सेदारी उनकी छवि को लेकर एक धब्बा बनी रही हैं विश्व युध्द उस समय के बडी ताकतो के बिच अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिऐ लडा गाया था

लेकिन भारतीयों को उन युध्दों में भाग लेने देना समझ से परे था भारत से सिधे सिधे किसी प्रकार का कोई वादा नहीं किया बल्कि प्रथम विश्व युध्द के खत्म होने के बाद रौलैट एक्ट और जलियांवाला बाग काडं हुयें

हमने अपने सैनिक खोये और बदले में हमे और दमनकारी व्यवहार देखेने को मिला ,याद रखिये ये वहीं समय था जब पुरा भारत गाधीं जी कि एक अवाज पर खडा हो जाया करता था गाधीं जी ने यहा दोगलापन दिखाया और अपने अहिंसा के वचन को भुलकर विश्व युद्ध जैसे भीषणतम हिसां के अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी बन गयें

भारत के 2.5 मिलयन यानी 25 लाख सैनिक ब्रिटिश सम्राट के लिऐ लडें. मजबुरन उन्हे उन अत्याचार से भरे लोगो के लिऐ लडने को मजबुर किया गाया वे अपनी इच्छा से कभी इग्लैण्ड के लिऐ लडने को तैयार ना होते. ये संख्या इतनी बडी थी कि अगर भारत के सैनिक इस महायुद्ध का हिस्सा ना बनते तो युध्द का परिणाम कुछ और ही होता. ब्रिटश लोगो कि हुकुमत को भारी नुकसान पहुचता और शायद ही उनमें इतनी क्षमता बचती की वे भारत को गुलाम बनाये रख पातें. उस समय लगभग हर व्यक्ति ये बात समझ रहा था लेकिन गाधीं इतने भी बात न समझ पायें ये तथ्य गले नही उतरता. इतनी महत्वपूर्ण बात ना समझ पाने के केवल दो कारण हो सकते थें या तो गाधीं जी भारत के हित के विरुद्ध किसी और योजना पर काम कर रहे थे अथवा उन्होंने आखें बन्द कर फिरंगियों कि हाँ में हाँ मिलाना स्वीकार कर लिया था। इतिहास मे भारतीयों के साथ गाधीं जी द्वारा कीया गाया सबसे बडा मजाक ये था कि एक तरफ तो वे ब्रिटिश हुकुमत को 25 लाख सैनिक दे कर उनके सम्राज्य की रक्षा कर रहे थे और दुसरी और भारत के लोगो से व्यक्तिगत सत्यग्रह की अपील कर रहे थें ताकि वे व्यक्तिगत रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड सकें। भारतीयो के साथ इतना बडा मजाक शायद ही इतिहास में कभी हुआ हो। सुभाष चन्द्र बोस ने गाधीं जी को कहा था कि “आप जानते है अकेला चन्ना बाढ नही फोड सकता”

गाधीं जी ने अपने सिवाय किसी और के विचार को स्विकारा करने का साहस नहीं दिखाया: क्या सुभाष जी गाधीं जी से कम बलीदानी थें?

अगर आप इतिहास को सरसरी निगाह से भी देखें तो पायेंगे कि गाधीं जी के समकालीन ऐसे अनेको व्यक्ति थे जिन्होंने उनके बराबर या उनसे अधिक बलिदान दियें लेकिन वे अडिग बने रहें राष्ट्र में उनकी एक गहरी पहुचँ बन गई थी और शायद गाधीं जी ये स्वीकार करने हेतु तैयार नही थें कि उनके सिवा भी कोई राष्ट्र का नायक हो सकता हैं वे अडिग रहें और एक एक कर कुछ महान लोग उनका साथ छोडते चले गयें क्या यें गाधीं जी कि असफलता नहीं है कि उनके जीवीत रहते काग्रेंस में बटवारा हो गाया

वे राष्ट्र हित मे दुर दुष्टि नही दिखा पायें: मोहम्मद अली जिन्ना और जवाहर लाल नेहरू के टकराव जगजाहिर थें 1935 मे ही स्पष्ट होने लगा था कि जिन्ना महत्वाकांक्षी होकर अपना सर उठायेगें लेकिन ये वो ही जिन्ना थें जिन्होंने ब्रिटेन से वापस आ कर भारत भुमि पर कदम रखते ही कहा था कि मैं मुस्लिम बाद में हूँ और एक भारतीय पहलें!

लेकिन भारत में मुस्लिम विभाजन कि विचारधारा फैलती चली गई और गाधीं जी ने हर बार आग में घी छोकने कि बाते करी खिलाफत अन्दोलन का समर्थन एक प्रमुख मुद्दा था जिसने मुस्लिम को एक भारतीय नहीं बल्कि एक धर्म के अनुयायी के अधार पर संगठित किया। ध्यान दिजीऐगा गाधीं जी सदैव अन्य धर्मों को धर्मिक अधार पर संगठित होने की तुलना में राष्ट्र विचार के अनुसार संगठित होने पर अधिक जोर देते थें लेकिन यहाँ पर उनकी नाक के नीचे भारत के टुकडे होते रहे और वे इस बारे में कोई ठोस हल नहीं निकाल सकें मोपला काडं में पुलिस 2–3 दिन तक गायब रहीं लेकिन ये बात गाधीं जी तक पहुच नहीं पाई।

1947 आते आते जिन्ना भारतीय से मुस्लिम हो गयें

जाती को वे भारत के समाज कि अधारभूत संचरना मानते थे और धर्मों क़ो काल्पनिक, सावरकर ने जब दलितो को हरिजन कहने पर रोष जताया तब उन्होंने जाती व्यवस्था को समाज का मुख्य अधार माना था वे जाति के अधार पर हो रही छुआछुत के तो खिलाफ थे पर जातियो के पुर्ण बहिष्कार के नहीं गाधीं जी कि अवाज उस समय इतनी ताकतवर थी कि वो बडी असानी से जाती व्यवस्था को उखाड सकते थें लेकिन एक तरफ वे जाती के अधार पर भविष्य में होने वाले विभाजन को देख नही पायें और दुसरी और वे सोते रहें और मुस्लिमों को डर दिखा कर भारत का विभाजन हो गाया

द्वतीय विश्व युध्द के दौरान एक और घटना हुई जिसे लगभग सभी इतिहासकारो ने किसी विशेष कारण से कभी नही लिखा.. बगाल और बिहार की अपने कलौनी से उस समय कि ब्रिटिश अधिकारी चार्चिल

ने अपने क्षेत्र के सभी किसानो से उनका उपजा खाना छिन्न कर अपने ब्रिटिश सैनिकों कि और भेज दिया. हलात यह थे कि उस क्षेत्र के लोगो के पास खुद के खाने के लिऐ गेहूँ का एक दाना नहीं बचा था लोगो भुखे से मरने लगे, जब कोई रास्ता नही दिखा तब औरतो ने अपने बच्चे को कुऐं में फैक दिया,

गर्भवती औरतो के शरीर में दुध की एक बुदं नही बनी और नवजात शिशु रोते रोते मर गयें,

जब कुछ लोग भुख सहन नही कर पायें तो वे नरभक्षी बन गयें, हर सडक पर लाशे बिछी होती थी और लाशो कि बदबू से पुरा क्षेत्र भर गाया था लोगो के दाहसंस्कार करने वाला भी कोई नहीं बचा लोगो के मृत शरीर सडको पर गिध्दों और चीलो के अहार बने

लेकिन ब्रिटिश सैनिकों के पास अतिरिक्त खाना सडता रहा लेकिन एक गेहूँ के दाना भी उन लोगो तक नही पहुचा गाया जिन्होंने उसे पैदा किया था लेकिन गाधीं जी उस समय अपने अलीशान भवन में बैठ कर सत्याग्रह कि योजना बना रहे थे

उन्होंने बंगाल के लोगो कि मदद के लिऐ अनशन तो दुर ब्रिटिश अधिकारीयों को एक चिठ्ठी तक नहीं लिखीं ऐसा लगता हैं कि उन्हे बंगाल कि वो भुखमरी कि परवाह ही नही थी 45 लाख लोग इस भुखमरी में मारे गयें दुनिया मे आज तक इतनी बडी तबाही परमाणु बम ने भी नही मचाई

. जो लोग बचे उनमें कुपोष के लक्षण पिढीयो तक दिखते हैं और आज भी दिख रहे हैं इस हि कारण उस समय के बंगाल( आज के बिहार, झारखंड, उत्तर उडी़सा, पश्चिम बंगाल, बंगालदेश) के लोगों कि ऊचाई आज तक भारत के और क्षेत्रों से सबसे कम हैं उन लोगो के साथ किये गयें अपराध का गांधी जी क़ो सीधा समर्थन था Bengal famine of 1943

बेहद चलाक थें उन्होंने केवल उन्हीं कामों मे हाथ डाला जो उनके बस में थें उदाहरण के लिऐ उनकी ईच्छा अनुसार जब पाकिस्तान को 50 करोड दिये गयें और भारत में मुसलमानों को सुरक्षा दि गई तो वो ये ही दबाव जिन्ना पर ना बना सकें और अपने अनशन में जिन्ना के लिऐ कोई मागं नहीं रखी, वे जानते थे उनके मरने से जिन्ना समेत पुरे पाकिस्तान को कोई फर्क ना पडता ये वही जिन्ना थे जो कुछ समय पहले तक गाधीं जी के अनुयायी थें पाकिस्तान में गाधीं को लेकर इतना असम्मान था कि उनकी अस्थियों तक को भी सिंधु नदी में बहाने नही दिया गाया.

मैं किसी तरह एक भारतीय होने के नाते अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखे हुये हुँ कुछ पक्ष जानबूझकर छोड रहा हो जिसमें हिन्दू शरणार्थियों कि दुरदशा, उन्हे मस्जिद से निकालने हेतु किया गाया अनशन( पाक से आये हिन्दू शरणार्थि दिल्ली कि खाली पडी मस्जिदों में शरण लिये हुये थें) शामिल हैं.

(शुभम ऊमा पुण्डीर)

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