अध्यात्म कथा -20 : जैसा आप खायेंगे वैसे हो जायेंगे !

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एक साधु रहता था किसी जंगल में। कितने ही लोग उसके दर्शन करने को आते , जो भी जाता उसे शांति मिलती। एक दिन उस देश के राजा भी गए , देखा साधु एक वृक्ष के नीचे बैठे हैं। सर्दी और वर्षा से बचने का कोई प्रबंध नहीं है।
राजा ने कहा —” महात्मन ! यहां तो बहुत कष्ट होता होगा आपको , मेरे साथ चलिए महल में रहिए।
साधु पहले तो माना नहीं, राजा ने बहुत आग्रह किया तो बोले — “अच्छा चलो !”
महल में गए , एक बड़े सुंदर कमरे में ठहरे। हर समय नौकर उपस्थित रहने लगा। अच्छा भोजन मिलने लगा। 3 माह व्यतीत हो गए । राजा उसकी पूजा करते , रानी उनमें श्रद्धा रखती। एक दिन रानी नहाने के लिए स्नानागार में गई। नहा कर उठी तो वह हीरो का हार पहनना भूल गई , जो उसने उतार कर स्नानागार में रखा था। शान वही पढ़ा रहा। रानी के पश्चात साधु नाना बार में गया। हार को देखा , उठाकर अपनी कोपीन में छुपा लिया। स्नानागार से निकले ,महल से बाहर चले गए ।
कुछ देर पश्चात रानी को हार का ध्यान आया। दासी से बोली—” स्नानागार में हार छोड़ आई हूं ,उसे ले आओ।”
परंतु वहां तो हार नहीं था। खोज होने लगी , पूछा गया — गुसल खाने में रानी के पश्चात कौन गया था ? पता लगा कि महात्मा गए थे। महात्मा की खोज होने लगी ,महात्मा मिले नहीं। राजा को ज्ञात हुआ तो उसने सिपाहियों को आज्ञा दी— ” उस साधु के पीछे जाओ , उसे पकड़ कर ले आओ।”
इधर में महात्मा शहर से बाहर निकले , जंगल में चले गए । दिनभर चलते रहे , पांव थक गए । भूख भी सताने लगी तो जंगल का एक फल तोड़कर खा गए ।फल था एक औषधि, उससे दस्त लग गए ,इतने दस्त आए कि महात्मा निर्बल हो गए। तभी उन्हें हार का ध्यान आया , उसे देखते ही बोले—” मैं इसे क्यों उठा लाया? मैंने चोरी क्यों की?”
उसी समय वापस लौट पड़े। आधी रात के समय राजा के महल पर पहुंचे , आवाज दी , राजा जगे। महात्मा ने उसके पास जाकर कहा — राजन आपका यह हार है , ले लो। मैं यहां से उठाकर ले गया था, मुझसे अपराध हुआ। मैं क्षमा मांगने आया हूं।”
राजा ने आश्चर्य से कहा — वापस ही लाना था, तो तुम इसे ले क्यों गए थे?”
साधु ने कहा — “राजन! क्रोध ना करना,तीन माह तक मैं तुम्हारा अन्न खाता रहा , उससे मेरा मन पापी हो गया। जंगल में जाकर दस्त आए , शरीर शुद्ध हो गया। तेरे अन्न का प्रभाव समाप्त हो गया, वैसे ही मैंने वास्तविकता को जाना और वापस आ गया।
यह है अन्य का प्रभाव! इसलिए यूनान के फिलास्फर पाइथागोरस ने कहा था — “तुम मुझे बताओ, कौन आदमी क्या खाता है ,मैं तुम्हें बताऊंगा कि वह क्या सोचता है।” इसलिए कहते हैं जैसा अन्न खाओ, वैसा मन बनेगा जो व्यक्ति गंदा और खोटा अन्न खाता है तो उसका मन कभी अच्छा नहीं होगा। उनको जिस भावना से कमाया हो और तैयार किया हो – सब का प्रभाव मन पर पड़ता है।

 

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