ज़रा समझिये एक सीधी सी बात

खयाल, ज़िन्दगी और हकीकत जुड़े हैं एक दूसरे से जिन्हें बांध रक्खा है साँसों की डोर ने .. जब टूटती है ये डोर तो बिखर जाते हैं खयाल और जिन्दगी भी.. और तब इसी को कहते हैं -हकीकत !!..

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हमको मिली है आज ये घड़ियाँ नसीब से,  .जी भर के देख लीजिये हमको क़रीब से.फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो | इंडियन आईडल शो देख रही थी | मेरी फेवरेट कन्टेस्टेंट अरूणिका गा रही थी इस गीत को | जैसे-जैसे वो गीत गा रही थी.जैसे उनकी आवाज़ मेरी रगों में उतरती जा रही थी |
एक तो ये गीत ही इतना लाजवाब जिससे बहुत सी यादें जुड़ी हैं अतीत की | दूसरा अरुणिका का गायन कमाल है… दिल कर रहा था बस सुनती ही जाऊँ क्यूँकि जैसा कहा कि बहुत यादें जुड़ी हैं इस गीत से…सुनते-सुनते भावुक हो गई थी | जानती हूँ आप सोच रहे होंगें कि “आज ज़रूर मुझे अपना पहला क्रश याद आ गया होगा | ” हा हा हा… काश, ऐसा होता पर सौभाग्यवश जिनसे प्रेम हुआ वे आज मेरे पति बन चुके हैं.. हा हा हा | पर मैं सिर्फ इस प्रेम की बात नही कर रही जो एक स्त्री और पुरूष के बीच हो जाता है |
मैं उस प्रेम की बात कर रही हूँ जो हर रिश्ते में होता है…  पति-पत्नी,  माता-पिता-बेटा-बेटी, सास-बहू, ससुर-दामाद,  नौकर-मालिक,  शिक्षक-छात्र और ऐसे बहुत से रिश्ते हैं हमारे जीवन में जो हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं परन्तु न हम अपनी व्यस्तता के कारण उन्हें वक्त दे पाते हैं और न ध्यान दे पाते हैं | प्रेम है बहुत पर वक्त नही,   हम नही होते जब उनको हमारी आवश्यकता होती है | हम अपनों के लिये चाहते हुए भी वो सब कुछ नही कर पाते क्यूँकि हमारी व्यस्तता,  हमारी असमर्थता किसी भी प्रकार की हमें ऐसा करने नही देती |
तो जब हम अपने रिश्तों के लिये उपलब्ध नही तो राष्ट्र प्रेम की बात करना बेमानी लगता है | परन्तु आज के समय की ये मांग है और ज़रूरत भी | जी हाँ मैं बात कर रही हूँ महामारी के उस दौर की जिसके प्रभाव से आ़़ज पूरा  विश्व पीड़ित है | ज़्यादा डिटेल में न जाते हुए ये कहूँगी कि आज जो हालात हैं .हर कोई वाकिफ है इससे |
महामारी की चपेट में हर पाँच में से एक व्यक्ति है | जन-जन में इसका आतंक और भय फैल गया है | हर दूसरे घर में महामारी से पीड़ित लोग मिल रहे हैं |
कालरूपी दानव अपना विकराल,  भयावह मुँह खोले भोले,  निरीह,  मासूम,   बेगुनाह लोगों को अपना ग्रास बना रहा है | पर….पर….पर…मैं कुछ कहना चाहती हूँ कि महामारी तो लोगों को निगल ही रही है इसमें कोई दो राय नही | लेकिन कुछ लोगों ने यह सिद्ध कर दिया है कि “मनुष्य सचमुच एक सामाजिक पशु है |”
पशु जो करते हैं वो अपनी जो योनि पाई है उन्होंने उसके अनुसार व्यवहार है उनका | परन्तु वे इतने पाश्विक नही जितना कि मनुष्य मानव रूप में |  सोच ऐसी भी हो सकती है ये सोच कर ही रूह काँप उठती है मेरी और कुछ लोग तो इस पाश्विक सोच को अंजाम दे रहे हैं |
अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या कर रहा है आज के दौर का मानव? माना कि हमारे देश की आबादी चौतीस करोड़ नही एक सौ चौतीस करोड़ है | महामारी पर इतना शीघ्र काबू पाना आसान नही होगा जैसे पश्चिमी देशों में काबू पाया गया है,  ,  अमेरिका इसका एक सटीक उदाहरण है |
जब मैं  मात्र ग्यारह वर्ष की थी,  ,    घर में भागवत बाँची गई थी,  ,  ,  ,  जिसमें गुरूजी ने ये बताया था कि कलयुग तो है ही ये… तभी भागवत में लिखित है कि लोगों को पानी भी खरीद-खरीद कर पीना पड़ेग..जो कि हो रहा है  | परन्तु कलयुग जब अपने चरम पर होगा तो लोग अपने पेट पालने के लिये एक-दूसरे का खून बहा कर अपनी क्षुधा को शांत करेगें |
ये वही दौर है जो अपनी आँखों से देख रही हूँ,  सुन रही हूँ…..समझ रही हूँ | इससे बुरा क्या हो सकता है कि नकली दूध और मिठाईयाँ क्या कम थी जो इस संकट की घड़ी में डुप्लीकेट दवाईयाँ और ऑक्सीजन भी बेच रहे हैं लोग वो भी दुगुने,  तीगुने दामों पर | लालच की पराकाष्ठा है ये |
जीवन को एक नई उम्मीद देने वाली,  महामारी से पूर्ण न सही पर कुछ प्रतिशतन का बचाव करने वाली जीवनदायिनी वैक्सीन की। “कालाबाज़ारी” हो रही है |  अस्पतालों में इस महामारी से प्रभावित लोगों के लिये बेड की सुविधा नही है ….इसमें भी प्री बुकिंग और कोटा फिक्स है | आम आदमी बिना दवाओं और ईलाज के तड़प रहा है…  मर रहा है….मानवता..   इंसानियत दम तोड़ चुकी है..तोड़ रही है ये कहना भी अब तो उचित न होगा |
कहने का तात्पर्यय ये है कि हमारे देश की विशाल जनसंख्या भी इसका एक प्रमुख कारण है |
“भीड़ में चरित्र की आशा नही रखी जा सकती | “इतनी भारी जनसंख्या में राष्ट्रप्रेम,   परहित सरस धर्म जैसी भावना जागृत नही होती | चारों ओर मार-काट ही तो मची है | शरीफ के वेष में डकैत घूम रहे हैं | सब्ज़ियों और राशन के दोगुने दाम,  स्टॉक मॉर्केटिंग,   ज़रूरी चीजों की होर्डिंग कर दस गुने ज्यादा दाम में बेचना आम आदमी की कमर तोड़ रहा है,  खाल छील रहा है देह से…..प्राणों की आहुति नही बलि ली जा रही है | समझ में नही आता कि हम मानव हैं या नरभक्षी……छी:…..शर्म आती है मानव को अब मानव कहते हुए | सब के सब ढोंगी…नाटकबाज़…..
स्वयं का कोई गुज़र जाये तो दुख है,  संवेदना है,  जी जान से बचाने की कोशिश भी होती है और दूसरों पर मुसीबत में आप पक्के व्यवसायी बन जाते हो | ये दोगला चरित्र क्यूँ? नाहक ही हम राजनेताओं को गाली बकते हैं……हम तो उनसे भी गये गुज़रे हैं…..हम तो मित्र बनकर अपने मित्र,  रिश्तेदारों को छलते हैं |
इतनी बातें लिख डाली पर जानती हूँ असर कुछ नही होने वाला | पर यही स्थिति हमें धीरे-धीरे प्रलय की ओर धकेल रही है |
अरे !! अब तो जाग जाओ…हृदय की आँखें खोलो …..मैं ये नही कहती कि मुफ्त की धर्मशाला  खोल लो…..ये कह रही हूँ कम से कम ज़रूरी चीजों की सामान्य कीमत रखें ताकि लोग उन्हें खरीद पायें | सामान की जमाखोरी करके कालाबाज़ारी तो न करें | महामारी से पीड़ित लोगों को ऑक्सीजन,  दवाईयाँ,  बेड आदि मुहैया करवाई जाए जाए | कम से कम इसमें तो दस गुना अतिरिक्त कीमत जोड़़कर न कमाएँ | टाटा,  बिड़ला बनना चाहते हैं तो क्या खून से हाथ रंगने ज़रूरी है? उन उद्योगतियों ने भी पैसे कमाने और सफलता पाने के लिये ऐसा घनघोर कर्म नही किया |
इसलिये सरकार के प्रयासों के साथ-साथ हमें भी मदद का पहला कदम बढ़ाना होगा….एक कोशिश…एक पहल यदि देश का हर नागरिक अपना कर्तव्य स़मझ कर करे तो शायद हम इस महामारी के दौर से जल्द उबर पायेगें |
कृष्णा को पुकार रहे हैं कि वो हमारी एक पुकार पर दौड़े चले आए और आ कर संकट  से हमें बाहर निकाले…. प्रभु!!  प्रभु करते हैं हम……..प्रभु क्या बैठे-बैठे “नेटफ्लिक्स”  देखकर टाईम पास कर रहे हैं जो हम  पुकारेंगे और प्रभु हाज़िर हो जायेगें | उन्हें कोई काम-धाम  नही है क्या.? …करें हम और ठीक प्रभु करे? ये तो कोई बात न हुई……
वक्त हर किसी के पास कम है….कुछ टाईम के लिये आत्मप्रेम से ऊपर उठकर राष्ट्र हित में सोचें | अपनी सोच को विस्तार दें…उसे संकुचित न करें हम |
हृदय प्रेम से जो हमारे बस में हो कम से कम हम वो तो कर ही सकते हैं…है ना!! …”फिर ये समाँ कल हो न हो”…….
गीत के शब्द अब भी गूँज रहे हैं ज़ेहन में…”हमको मिली है आज ये घड़ियाँ नसीब से…फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो…शायद फिर इस जनम में मुलाकात हो न हो…..हो न हो…..हो न हो….

(अंजू डोकानिया)

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