Assam – Mizoram सीमा पर खूनी हो रही है इतिहास की गलती

जो बरसों पहले हुआ था उसके कारण बरसों बाद आज भारत के दो राज्य एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं, ऐसी ही एक घटना देश की आजादी के वक्त हुई थी

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बहुत पहले 19वीं सदी के मध्य में अंग्रेजों ने असमी कछार के मैदानों में अपने चाय बागानों की शुरुआत के समय जो गलती की थी, वो अब लगभग एक सत्तर वर्षों के बाद एक गंभीर मुद्दे के रूप में खूनी हो कर सामने आई है.
लगभग 164 किमी की असम-मिजोरम सीमा सोमवार 26 जुलाई, 2021 को उस समय सुर्खियों में आ गई जब दोनों राज्यों की पुलिस द्वारा एक-दूसरे पर गोली चलाने की आवाज सुनी गई और उसके बाद कम से कम पांच पुलिसकर्मियों की मौत की खबर आई. असम और मिजोरम राज्यों के बीच सीमा पर यह इस तरह की एक असामान्य घटना है. सीमांकन को लेकर दोनों पक्षों के बीच लगातार टकराव होता रहता है जो कभी-कभी हिंसक रूप भी ले लेता है. लेकिन पहली बार राज्यों में पुलिस को सीधे टकराव में एक-दूसरे पर फायरिंग करते हुए सुना गया है, जहां मिज़ोस की ओर से हमले में असम के अधिकारियों की जान चली गई।

ये घटना है या गलती इतिहास की?

यह आज नहीं है, समस्याओं की जड़ें इतिहास में वापस जाती हैं और उन्नीसवीं सदी के मध्य में उभरती दिखाई देती हैं। जबकि ब्रिटिश चाय बागान तब कछार के मैदानों में सामने आए थे, किसी ने भी इस बारे में नहीं सोचा होगा कि विस्तार से लुशाई पहाड़ियों में रहने वाले मिज़ो के साथ समस्याएँ पैदा होंगी।

इतिहास हमेशा निर्दोष होता है

निर्दोष इतिहास इस बात का दोषी तो माना ही जा सकता है कि जिस समय ब्रिटिश चाय बागानों का विस्तार यहां हो रहा था उस समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि आगे चल कर यही विस्तार बड़ी समस्या को जन्म देगा और बाद में दो भारतीय राज्यों में इसको लेकर एक गंभीर असंतोष पैदा होगा. यही असंतोष बिगड़ कर विवाद में बदल गया और अब मिजोरम और असम अपनी सीमा पर एक-दूसरे के खिलाफ तने खड़े हैं. जाहिरा तौर पर यदि इस मुद्दे पर संवेदनशीलता से ध्यान नहीं दिया गया तो यहाँ और अधिक खून बहाने के लिए हमें तैयार रहना होगा.

वे एक फॉल्ट लाइन साझा करते हैं

दोनों राज्यों के नागरिकों की नजर से देखें, यह वह सीमा रेखा नहीं है जिसे वे एक-दूसरे के साथ साझा कर रहे हैं, यह फॉल्ट लाइन है जिसे वे वास्तव में स्वीकार नहीं करते हैं।

फॉल्ट लाइन क्या है?

समस्या का केंद्र बिंदु 165 किलोमीटर की असम-मिजोरम सीमा पर है, जिसकी एक नहीं बल्कि दो सीमाएँ भारत में ब्रिटिश काल से ही चली आ रही हैं. इस सीमांकन को कभी भी किसी भी पक्ष के द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है. और फिर यह सीमांकन असंतोष में बदल गया और धीरे-धीरे यह असंतोष दोनो राज्यों के मध्य बड़े विवाद के रूप में उभर आय़ा है.

दो और भाग जोड़े गए

कछार मैदान या कहें बराक घाटी में अब कछार, करीमगंज और हैलाकांडी जिले शामिल कर दिये गये हैं. इस विस्तार ने समस्याओं को जन्म दिया और इस प्रकार इतिहास की यह दोष-रेखा वर्तमान में आग की भांति भड़क उठी है. देश के सामने अपने दो राज्यों को लेकर चल रहे भारी विवाद को सुलझाने की चुनौती भी आ गई है जिसने समाचार पत्रों को आज तनावपूर्ण शीर्षक दे दिये हैं.

पांच बार खींची गई सीमा

हमें फिर से लगभग पंद्रह दशक पहले वापस जाने की जरूरत है. एक सौ छियालीस साल पहले असम राजपत्र में कछार जिले की दक्षिणी सीमा जारी की गई थी. मिज़ोरम के अनुसार – ऐसा पाँचवीं बार हुआ था जब अंग्रेजों ने कछार के मैदानों और लुशाई पहाड़ियों के बीच की सीमा रेखा खींची थी. पांचवीं बार ही इसको लेकर मिजो प्रमुखों के साथ पहली बार परामर्श किया गया था. दो साल बाद असम के अगस्त 1877 के गजट में इनर लाइन रिजर्व फॉरेस्ट सीमांकन भी इसी के आधार पर हुआ.

1933 का सीमांकन

फिर लगभग नब्बे साल पहले वर्ष 1933 में मणिपुर की तत्कालीन रियासत और लुशाई हिल्स के बीच की सीमा का सीमांकन किया गया. इस बार भी यह विवाद का विषय था क्योंकि मणिपुर की सीमा लुशाई हिल्स, असम के कछार जिले और मणिपुर राज्य के ट्राइजंक्शन से शुरू हुई थी. मिज़ो लोग इस सीमांकन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे, और उन्होंने 1875 की सीमा का सुझाव दिया जो उनके प्रमुखों के परामर्श से खींची गई थी पर ये विवाद लगातार बना रहा.

नौ साल का गठन अंतराल

आइए हम इन दोनो भारतीय राज्यों के आधिकारिक अस्तित्व के गठन पर भी दृष्टि डालें. वर्ष 1963 में असम से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अलग करते हुए – नागालैंड को भारतीय भूगोल पर अपनी संवैधानिक इकाई के साथ निर्मित होते हमने देखा था. और ऐसा मिजोरम के लिए नौ साल बाद 1972 में हुआ जब उसे अरुणाचल प्रदेश और मेघालय के साथ एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया

यथास्थिति अब आवश्यक है

ऐसा लगता है कि मिजोरम और असम के बीच हुए समझौते के शुद्ध इस्तेमाल का समय आ गया है. इसके माध्यम से  सीमा क्षेत्र पर नो मैन्स लैंड में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिये जाने की आवश्यकता है. इसके पहले भी असम-मिजोरम सीमा पर कछार क्षेत्र में फरवरी 2018 में भी एक हिंसा भड़क उठी थी जब मिजो छात्र संघ एमजेडपी (मिज़ो ज़िरलाई पावल) ने जमीन पर किसानों के लिए एक लकड़ी का विश्राम गृह बनाया, जिस पर उन्होंने अपना दावा किया था किन्तु तब असम पुलिस ने उसे ध्वस्त कर दिया था.

घटना के बाद अब

सच तो ये है कि तनावपूर्ण स्थिति को शांत करने के लिए दोनों पक्षों में से कोई भी प्रयास नहीं किया जा रहा है. मुख्यमंत्रियों समेत दोनों राज्यों के अधिकारी एक दूसरे पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाने में लगे हैं.

अचानक विस्फोट नहीं

यह हिन्सात्कम घटना अचानक पैदा हुई घटना नहीं है, दोनो तरफ की पुलिस के बीच हुई फायरिंग की यह घटना मिजोरम और असम के बीच दशकों से लंबित सीमा विवाद को लेकर चल रहे तनाव का परिणाम थी.

व्यर्थ रही है मध्यस्थता

केंद्रीय गृह मंत्रालय 1994 से लेकर अब तक पिछले 27 वर्षों से इन दोनों राज्यों के बीच संभावित ‘संघर्ष विराम’ की खोज में लगा है और मध्यस्थता का यथासंभव प्रयास कर रहा है किन्तु अब तक सब व्यर्थ ही रहा है.

सौहार्दपूर्ण समाधान?

गृह मंत्री अमित शाह ने असम और मिजोरम के मुख्यमंत्रियों हिमंत बिस्वा सरमा और ज़ोरमथांगा के साथ विवादित सीमा पर शांति वापस लाने का अनुरोध किया है. उन्होंने उनसे अब इस समस्या का एक “सौहार्दपूर्ण समाधान” खोजने की अपेक्षा की गई है, जो कदापि आसान नहीं होगी.

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