गंजे सिर वालों को कोरोना (Corona Virus) से डरने की जरूरत नहीं, रिसर्च का आधार अधूरा

डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक ब्राउन यूनिवर्सिटी (Brown University) के प्रोफेसर और रिसर्चर कार्लोस वैम्बियर (Carlos Wambier) का दावा है कि गंजे सिर वाले मरीजों पर कोरोना संक्रमण (Corona Infection) का ज्यादा खतरा है

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गंजे सिर वालों को कोरोना का ज्यादा खतरा (Courtesy - Daily Mirror)

कोरोना वायरस (Corona Virus) की वैक्सीन (Vaccine) के लिए दुनिया के तमाम देशों में वैज्ञानिक और शीर्ष दवा कंपनियां रात दिन मेहनत कर रही हैं. अब तक इस लाइलाज बीमारी की वजह से दुनिया में 4 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. अब एक नई रिसर्च में ये दावा किया गया है कि जिनके सिर पर बाल नहीं हैं उनके लिए कोरोना बहुत घातक साबित हो सकता है. अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी (Brown University) के रिसर्चरों की एक टीम ने का दावा है कि गंजे पुरुषों के कोरोना वायरस से संक्रमित होने का ज्यादा खतरा है.

कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर रिसर्च जारी है. अब तक के शोध और अध्ययन में ये दावा किया गया है कि विटामिन डी की कमी वाले कोरोना मरीज़ों पर संक्रमण ज्यादा घातक साबित हुआ है. फिर उसके बाद एक रिसर्च में ये दावा किया गया कि 65 साल से ऊपर के लोगों के लिए कोरोना घातक साबित हुआ है. बाद में एक और रिपोर्ट सामने आई कि महिलाओं के मुकाबले पुरूषों में कोरोना संक्रमण का ज्यादा खतरा देखा गया है. अब एक नई रिसर्च के मुताबिक गंजे सिर वाले पुरूषों में कोरोना संक्रमण सबसे ज्यादा गंभीर साबित हुआ है.

डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और रिसर्चर कार्लोस वैम्बियर का दावा है कि गंजे सिर वाले मरीजों पर कोरोना संक्रमण का ज्यादा खतरा है. स्पेन में मैड्रिड के तीन अस्पतालों में भर्ती 122 कोरोना मरीजों पर हुए अध्ययन में ये पाया गया कि कोरोना पॉजिटिव पाए गए 79 फीसदी मरीज गंजे थे. वहीं स्पेन में ही एक दूसरी स्टडी में भी ये सामने आया कि अस्पताल में भर्ती 41 मरीज़ों में 71 फीसदी गंजे थे. अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी के जर्नल में इस रिसर्च को प्रकाशित किया गया. शोधकर्ताओं के मुताबिक पुरुषों में पाए जाने वाला सेक्स हार्मोन ‘एंड्रोजन’ गंजेपन के लिए जिम्मेदार होता है. यही हार्मोन कोरोना वायरस को शरीर में प्रवेश करने में भी सहायक साबित होता है. इस हार्मोन की वजह से दवा का असर कम होता है और मरीज को ठीक होने में काफी वक्त लग सकता है.

लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ कुछ लोगों पर हुई रिसर्च के आधार पर इतना बड़ा निष्कर्ष निकाला जा सकता है. दरअसल कोरोना वायरस के लेकर अब तक कई थ्योरियां सामने आ रही हैं लेकिन सिर्फ कुछ लोगों पर हुए शोध के आधार पर कोई भी रिसर्च किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी है. अभी तक इलाज में दी जाने वाली दवाइयों पर ही विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO और तमाम देशों के बीच आम सहमति नहीं बन सकी है. कहीं हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को कोरोना के इलाज में कारगर माना जा रहा है तो कहीं उसका विरोध हो रहा है. इसी तरह एड्स के इलाज में दी जाने वाली दवा रेमडेसीवीर को कुछ देशों में कोरोना के इलाज में कारगर माना गया तो कई देशों में उसके साइड इफैक्ट दिखे. इसी तरह जब 60 से ऊपर की उम्र को जोखिम की कैटेगरी में रखा गया तो अब तक दुनिया में 100 साल के बुजुर्गों ने भी कोरोना को मात दे कर दुनिया का हौसला बढ़ाने का काम किया है.

ऐसे में सिर्फ एंड्रोजन हार्मोन की वजह से गंजेपन का शिकार हुए लोगों को कोरोना संक्रमण के लिए जोखिम की श्रेणी में मानना गले नहीं उतरता क्योंकि सिर्फ कुछ लोगों पर हुई रिसर्च ये साबित नहीं कर सकती है. जबकि बाल झड़ने की वजह सिर्फ सेक्स हार्मोन ही नहीं होती है. विटामिन बी की कमी, कीमोथेरेपी, अनुवांशिक कारण, गर्भावस्था, डिप्रेशन , लंबी बीमारी और उम्र बढ़ने की वजह से भी बाल कम होते चले जाते हैं.

शरीर में रोगप्रतिरोधक क्षमता ही अब तक कोरोना वायरस से लड़ने में कारगर साबित हुई है. ऐसे में गंजेपन को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट को गंजे लोगों की रोगप्रतिरोधक क्षमता का भी अध्ययन जरूर करना चाहिए. ये रिसर्च सिर्फ कोरोना वायरस को लेकर कयासों के अंधेरे में छोड़े जा रहे तीरों में से एक ही माना जाएगा जब तक कि कोई ठोस समीक्षा किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती.

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