Bengal Polls 2021: बंगाल में BJP की सरकार न बन पाने के 4 बड़े कारण

बीजेपी ने पिछली बार कमल उगाया था बंगाल में, इस बार खिला दिया है किन्तु कमल-दल के खिलने में बस एक चुनावों का वक्त और है. पांच साल बाद सरकार भी बन जायेगी यहां. इस बार क्यों नहीं बनी सरकार- पढ़िए यहां..

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बंगाल चुनाव का आश्चर्यजनक परिणाम ये है कि बंगाल में बीजेपी ने कमाल कर दिया. जिस बंगभूमि में दशकों तक कम्युनिस्ट राज बेधड़क चलता रहा उस प्रान्त की राजगद्दी को इसी तरह आश्चर्यजनक रूप से एक महिला नेता ने कॉमरेडों से छीन कर इतिहास बना दिया था. अब इस एक महिला नेत्री के खिलाफ ऐसी ही सेंध लगाईं है बंगाल में देश की एकमेव राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी ने. पहले ममता को कम्युनिस्टों के विरुद्ध जीत मिली थी अत्याचार से मुक्ति की दिशा में पैदा हुई उम्मीद के कारण, और अब उसी ममता के अत्याचार और भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध बंगजनों ने बीजेपी में मुक्ति की उम्मीद देखी है.

अपनी-परायी वोटिंग

‘घरे-बाहिरे’ एक सफल और सार्थक बंगाली फिल्म थी जिसने आम बंगजनों की सोच को दर्शाया था. घरे-बाहिरे अर्थात अपना-पराया. आम बंगजनों की सोच वही है जो महाराष्ट्र में या साउथ इण्डिया में है या अंदरूनी तौर पर हर प्रांत में होती है कि बाहर के लोगों का स्वागत कम होता है और उनको हमेशा बाहरी ही माना जाता है. यही हाल यहाँ भी है, ममता मनमानी चाहे कितनी भी कर लें, .बाहर वालों के मुकाबले उनको ही अधिक प्राथमिकता मिलेगी- और ये बात इन चुनावों ने सिद्ध कर दी है.

मोदी-विरोधी राजनीतिक वोटिंग

बंगाल में इस बार जबरदस्त मोदी विरोधी राजनीतिक वोटिंग देखने को मिली. मोदी विरोधी वोटिंग अर्थात वो वोटर जो भले ही ममता समर्थक न हो किन्तु मोदी विरोध की लहर में वह भी ममता का समर्थन कर रहा है. दूसरे शद्बों में कहें तो तीन अलग-अलग समूहों के के वोट एकजुट हो कर ममता के पाले में आ गिरे. कांग्रेस के वोट्स और जनता दल जैसे क्षेत्रीय दलों के वोट्स बिखरे नहीं, अर्थात अपनी-अपनी जगह उन्होंने मोदी विरोध में वोट दिए और ममता के पक्ष में दिए. कम्युनिस्टों के कैडर वोट तो पूरी तरह से ममता को गए ताकि ममता जीते और मोदी की पार्टी सरकार न बना सके अर्थात मोदी के प्रखर विरोध में शत्रु भी मित्र नज़र आने लगे कॉमरेडों को.

एकजुट साम्प्रदायिक वोटिंग

चाहे बीजेपी कितना भी कह ले देश के मुस्लिम अल्पसंख्यक उसे स्वीकार करने से रहे. चाहे मोदी देश के बहुसंख्यकों के हितों को अनदेखा करके अल्पसंख्यकों के हित में कितने भी बड़े कदम उठा लें – भारत के अल्पसंख्यक उनको अपना नेता स्वीकार नहीं करेंगे. इसका कारण है साम्प्रदायिक कट्टरता और यही कट्टरता है बड़ी वजह जिसने मोदी की बीजेपी के पैर बंगाल में न जमने नहीं दिये -इसके लिए एकजुट हो कर वोटिंग की गई और आज परिणाम सबके सामने है.

समर्थकों की निकम्मी वोटिंग

मोदी अर्थात भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा नेता. ऐसे में मोदी का समर्थन करना राष्ट्रवाद का समर्थन करना है. मोदी का समर्थन करना बहुसंख्यकों का समर्थन करना भी है यदि हम उनके वोटों को चुनावी चश्मे से देखें. ऐसी स्थिति में आप यदि ईमानदारी से पश्चिम बंगाल के एक-एक बहुसख्यक से पूछें तो लगभग सभी मोदी के साथ खड़े नज़र आएंगे.  लेकिन ये सभी एकजुट हो कर बाहर नहीं निकले और वोटिंग लाइन में खड़े नज़र नहीं आये. इस निकम्मे समर्थन ने भी सरकार नहीं बनने दी बीजेपी की बंगाल में!

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