महानायक के पिताजी हरिवंश राय बच्चन थे मधुशाला के नायक

ये तो अमिताभ बच्चन का व्यक्तित्व है कि उन्होंने अपने पिताश्री से अधिक लोकप्रियता हासिल की वरना हरिवंश राय बच्चन देश के सबसे अधिक सम्मानित कवियों में एक थे और उनकी मधुशाला उत्तरप्रदेश ही नहीं देश भर के हिंदी-प्रेमी लोगों की जुबान पर चढ़ी हुई थी..

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अठारह जनवरी 2021 थी पुण्यतिथि इस महाकवि की जो आज से पूरे 18 साल पहले वर्ष 2003 में दुनिया को अलविदा कह गए थे. उनके जाने के बाद उनके प्रशंसकों ने देश भर में उनकी स्मृति में कवि सम्मेलन आयोजित किये और उनकी मधुशाला गाकर देश के बड़े कवियों ने उन्हें कवितात्मक विदाई दी थी.

मधुशाला के महाकवि थे बच्चन

आज से एक सौ तरह वर्ष पूर्व जन्म हुआ था हरिवंश राय बच्चन का. हरिवंश जी छायावाद के प्रमुख कवियों में से एक थे. देश की आम हिंदीभाषी जनता और कवियों की पंक्तियां याद रखे या नहीं, मधुशाला की पंक्तियां लोगों को मुंहजुबानी याद थीं. याद थीं क्या आज भी याद हैं भले ही अब बच्चन जी के वे प्रशंसक उम्रदराज हो गए हों किन्तु उनके लिए बच्चन जी और उनकी मधुशाला आज भी चिरयौवना है.

सरस्वती और प्रताप थे मातापिता प्रतापी कवि के

देश के प्रतापी कवियों में एक हरिवंश राय बच्चन जी का 27 नवम्बर 1907 को इलाहाबाद के एक कायस्थ परिवार मे जन्मे थे. आपकी माता जी का नाम माता का नाम सरस्वती देवी था और पिताश्री थे प्रताप नारायण श्रीवास्तव. प्यार से उन्हें घर में ‘बच्चन’ कह कर पुकारा जाता जिसका अर्थ ‘बच्चा’ या ‘संतान’ होता है, और यही नाम हरिवंश जी ने गले लगा लिया जिसके बाद बच्चन नाम ने ही उनको लोकप्रियता दिलाई.

पीएचडी की इंग्लैण्ड से

प्रारम्भिक शिक्षा कायस्थ पाठशाला में लेने के बाद हरिवंश जी ने उर्दू और फिर हिंदी की शिक्षा प्राप्त की जिसके उपरान्त उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए किया. अंगेजी में ही पीएचडी करने के लिए फिर हरवंश जी इंग्लैण्ड चले गए और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य के विख्यात कवि डब्लूबी यीट्स की कविताओं पर उन्होंने शोधकार्य सम्पन्न किया.

सांसद भी बने हरिवंश जी

व्यवसाय के तौर पर बच्चन जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक के रूप में सेवायें दीं. इसके बाद भारत सरकार ने उन्हें विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के तौर पर नियुक्त किया. बच्चन जी राज्य सभा में भी मनोनीत सदस्य के रूप में आमंत्रित किये गए.

दो विवाह किये हरिवंश जी ने

हरिवंश जी का प्रथम विवाह पारम्परिक विवाह था जिसमें परिवार ने उन्नीस साल के हरवंश जी की जीवन डोर श्यामा से बाँध दी जो उनसे पांच वर्ष छोटी थीं. १४ वर्ष की श्यामा ने अगले दस साल पति का पूरा साथ निभाया और 1936 में टीबी के कारण उनका निधन हो गया. इसके पांच वर्षों बाद अगला विवाह खुद हरिवंश जी ने किया और चौंतीस वर्ष के हरिवंश जी की जीवन संगिनी बनी तेजी सूरी जो पंजाबी परिवार से आती थीं और रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं. इन्ही दिनों उन्होंने ‘नीड का निर्माण फिर’ जैसी कविताओं की रचना की थी.

साल 2003 की जनवरी पार न की

ठंड के कारण 2002 के आखिरी महीने में हरिवंश जी का स्वास्थ्य खराब हुआ तो फिर उसने हरिवंश जी को नहीं छोड़ा. पंचानबे वर्षीय हरिवंश जी की तबियत लगातार बिगड़ती चली गई. नए साल के नए महीने में अर्थात जनवरी 2003 के जनवरी माह में तबियत इतनी बिगड़ी कि उनको सांस लेने में दिक्कत होने लगी. फिर तो हरिवंश जी को भी अनुभव हो गया कि अब समय आ गया है और 18 जनवरी 2003 को उन्होंने अपने परिजनों और प्रशंसकों से अंतिम विदाई ली.

पुरस्कार तथा सम्मान

1968 में हरिवंश जी को तीन पुरस्कारों का सम्मान प्राप्त हुआ. उनकी कृति ‘दो चट्टानें’ को इस वर्ष हिन्दी कविता का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया. इसी साल उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला और उसके बाद  एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी हरिवंश जी को सम्मानित किया गया. उनकी आत्मकथा के लिए बिड़ला फाउण्डेशन ने भी उन्हें सरस्वती सम्मान प्रदान किया. वर्ष 1976 में उनको भारत सरकार साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया.

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