CoronA 2.0: Oxygen की मारामारी में सरकार नहीं, सिस्टम हुआ है फेल !

कोरोना की दूसरी लहर में जहाँ कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ी है, वहीं ऑक्सीजन की सप्लाई भी कम हुई है -लेकिन इसकी वजह पर क्या किसी ने गौर किया है?..

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डबल म्यूटेन्ट कोरोना वायरस ने इस बार भारत में वास्तव में कोहराम मचा दिया है. किन्तु ऐसे में यहां यह भी बताना आवश्यक हो जाता है कि इसमें देश की मोदी सरकार का कोई कसूर नहीं है. इसके कसूरवार हैं -हम और हमारा सिस्टम भी – दूसरे शब्दों में कहें तो कोरोना से ये पराजय हमारी है और हमारे साथ हमारे उस सिस्टम की है जो देश में पिछले सत्तर साल से ज्यादा समय से चला आ रहा है.

तीन तत्वों ने किया सिस्टम को फेल

कोरोना में सिस्टम को फेल करने के जिम्मेदार तीन तत्व हैं – एक हैं अस्पताल, दूसरा मीडिया और तीसरे हम खुद. मीडिया ने कोरोना की सनसनी को टीआरपी में बदलने की कोशिश में कोरोना का कहर लगातार दिखाने और जताने की कोशिश की है जिसने देश में जबर्दस्त पैनिक पैदा किया. लोगों ने भयभीत हो कर ज़रा सी समस्या होते ही अस्पताल भाग कर भीड़ लगाने की गल्ती शुरू कर दीं जिससे हालत बद से बदतर हुई. जो कोरोना रोगी न भी थे वे भी वहां संक्रमित हो गए.

सिस्टम फेल होने का मूल कारण

अस्पतालों की कमी है सिस्टम फेल होने के दो मूल कारणों में से एक है. देश में जनसंख्या तो जबरदस्त बढ़ रही है, जन-औषधालय अर्थात सरकारी अस्पताल उस संख्या में और उस गति से बढ़ नहीं रहे हैं. ऐसे में अस्पतालों में ट्रैफिक जाम तो होना ही था. दूसरा मूल कारण भी इसी स्थिति से जुड़ा है अर्थात देश ने अपनी जनसंख्या को इस कदर बढ़ते रहने दिया है कि आज सिस्टम फेल ही हो गया. जनसंख्या के बढ़ते अनुपात में क्या देश की कांग्रेस सरकारों को अस्पताल, स्कूल-कॉलेज, सड़कें आदि मूलभूत आवश्यकताओं के स्रोत बढ़ाने नही चाहिये थे?

इसलिये ही हुई कमी ऑक्सीजन की

ऑक्सीजन की कमी तो होनी ही थी. इसके लिये पहले से पता नहीं था -का बहाना बेकार है. सबको पता है कि कमी इसलिये हुई है कि मरीज ज्यादा थे और सप्लाई कम थी. जनसंख्या पर नियंत्रण होता तो न ऑक्सीजन सिलेंडर कम पड़ते न अस्पताल. अभी भी बहुत देर नहीं हुई है और इस दिशा में सरकार को सोचना ही पड़ेगा – वरना अगली बार कोरोना आया तो जनसंख्या पर नियंत्रण का काम वो स्वयं अपने हाथ में ले लेगा और उस तरह जनसंख्या की सीधी-सफाई किसी को पसंद नहीं आएगी.

हम भी हैं जिम्मेदार

पिछली बार देश की मोदी सरकार ने थालियां इसलिए बजवाईं थीं हमसे ताकि हम समझ सकें कि कोरोना के विरुद्ध युद्ध सिर्फ सरकार का ही नहीं, हमारा भी है. और यदि हम इस युद्ध में सैनिक बन कर नहीं लड़ेंगे तो हम भी हारेंगे, सरकार भी हारेगी और देश भी हारेगा – और जीत जाएगा कोरोना! पिछली बार हमने सावधानी रखी और सरकार के निर्देशों को पालन किया परंतु इस बार सड़कों पर हम कोरोना को हल्के में ले रहे थे और मानने को तैयार नहीं थे कि कोरोना की दूसरी लहर वास्तव में आई है. इस लापरवाही ने मामला गंभीर कर दिया क्योंकि कोरोना स्टेज टू पर पहुँच गया जो पिछली बार पहुँच नहीं पाया था.

सरकार पूरी तरह मुस्तैद है

देश की मोदी सरकार पर आज की स्थिति का दोष नहीं मढ़ा जा सकता है. कोरोना के विरुद्ध युद्ध में सरकार पिछली बार भी कृतसंकल्पित थी और इस बार भी है. किन्तु इस बार बंगाल चुनावों में पीएम मोदी की व्यस्तता को देश के भीतर स्थिति राष्ट्रवादी सरकार के विरोधियों ने एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है और अदालतों की मदद ले कर सरकार पर हल्ला बोला है. इस तरह उन्होंने देश में ये सन्देश देने का प्रयास किया है कि मोदी और उनकी सरकार के लिये कोरोना चिंता का विषय नहीं है. पर सच ये है कि कोरोना की चिंता न होती तो पिछली बार ही हाथ खड़े कर दिए होते भारत की सरकार ने और दूसरे देशों की तरह भारत में भी कोरोना ने कोहराम मचा दिया होता.

तीसरा युद्ध लड़ रही है भारत सरकार

पिछले सवा साल में भारत की सरकार तीसरा युद्ध लड़ रही है. और यह तीसरा युद्ध कोरोना के विरुद्ध ही है. पिछले दो युद्ध भारत जीत चुका है -एक युद्ध था कोरोना के विरुद्ध और दूसरा कोरोना-कंट्री के विरुद्ध – जो लद्दाख बॉर्डर पर मुँह की खा कर वापस हो गई. और अब तीसरा युद्ध फिर सरकार को कोरोना के विरुद्ध ही लड़ना पड़ रहा है जो हमारी सरकार पूरी तरह दृढ़प्रतिज्ञ हो कर लड़ रही है. .याद रखें, विजय इस बार भी हमारी ही होगी – न हम कोरोना को जीतने देंगे न कोरोना-कंट्री को !!

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