Gaaliyan: समय आ गया है कि ‘इन’ हिन्दुओं को नाम के पीछे मुगलई सरनेम लगा लेने चाहिये !

गाली का इतिहास भारत में ये बताता है कि बाहर से भारत में घुस कर आक्रमण करने वाले और बहुसंख्यक हिन्दुओ का दमन करने वाले मुगल शासकों की ये भाषाई गंदगी आज भारत की जन-संस्कृति का अभिन्न और बेशर्म अंग बन गई है..

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जान लीजिये कि जो माँ और बहन की गालियां आज भारत में आम हैं वे भारतीय परम्परा की धरोहर नहीं हैं.और हाँ, यदि आप सच्चे सनातनी हिन्दू हैं, तो आपको ये गालियां नहीं बकनी चाहिए!
भारत सनातनी हिन्दुओं का देश है. सनातन संस्कृति अनादि है और अनंत भी. अनादि इसलिए क्योंकि इसके प्रारम्भ बिंदु का ज्ञान किसी को नहीं है. ऐसी सनातन संस्कृति में गालियों के लिए कभी कोई स्थान नहीं था और सत्य तो ये भी है कि गालियों के लिए स्थान आज भी नहीं है सनातन धर्म में.
भारत की मूल भाषा भाषा हिंदी नहीं संस्कृत थी. संस्कृत से भारत की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं ने जन्म लिया है जैसे मराठी, गुजराती, बंगाली, उड़िया, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, अवधि, भोजपुरी आदि. लेकिन जो भाषा भारत की सेतु भाषा बनी वो हिंदी भाषा के रूप में जानी गई और लिखते समय इसे देवनागरी लिपि कहा गया. चाहे बात कीजिये सभी भारतीय भाषाओं की मातृभाषा संस्कृत की अथवा सभी भारतीयों की मातृभाषा हिंदी की – गालियों के लिए इन दोनों में अथवा भारत की किसी भी क्षेत्रीय भाषा में कोई स्थान कभी नहीं था.
भारत की मूल भाषा हिंदी अथवा संस्कृत में गालियां नहीं अपितु अपशब्द अवश्य थे. ये अपशब्द गालियों की तरह ही हिन्दू समाज में प्रचलन में थे. ये अपशब्द कायर, कामी, मूर्ख, धूर्त, अधम, पापी, पामर, जड़बुद्धि, मंदबुद्धि, निकृष्ट, पतित, आदि व्यक्ति की योग्यता पर आधारित अपशब्द थे. ये अपशब्द कदापि पुर्लिंग अथवा स्त्रीलिंग अथवा किसी तरह के यौन शब्दों से निर्मित नहीं थे यहां तक कि इन अपशब्दों में नपुंसक शब्द भी शामिल नहीं था जो कि किसी अशक्त व्यक्ति पर अत्याचार करने वाले के लिए प्रयोग में लाया जा सकता था अथवा किसी प्राकृतिक रूप से नपुंसक व्यक्ति का उपहास करने या उस पर शाब्दिक आघात करने के लिए प्रयोग में लाया जा सकता था. परंत ऐसा नहीं था.
भारतीय संस्कृति मूल रूप से धर्म आधारित संस्कृति रही है जिसमे जीवन जीने की शैली को धर्म माना गया है. कहा भी गया है कि धारयते यस्य सह धर्मः! भारतीय संस्कृति धर्म आधारित संस्कृति इस तरह भी समझी जा सकती है कि भारतीय जीवन शैली में कदम कदम पर धार्मिक मूल्य भारतीयों का मार्गदर्शन करते हैं. व्रत त्यौहार पूजा पाठ कला कौशल सभी में धार्मिक मूल्य अंतर्निहित हैं. भारत की मूल सेतु भाषा हिंदी की मातृभाषा संस्कृत देवभाषा मानी जाती है. ऐसी संस्कृत और हिंदी वाली धरती पर गालियों के लिए कोई स्थान नहीं था.
अब बताते हैं आपको कि गालियों के लिए स्थान क्यों नहीं था और गालियों को स्थान कब से मिल गया हिन्दुओं के देश भारत में. भारत एक परिवारवादी और वृहद रूप से देखें तो समाजवादी संस्कृति वाला देश है जिसमे नारी को देवतुल्य स्थान दिया गया है. सम्पूर्ण विश्व में एकमात्र हिन्दुओं का देश भारत ऐसा है जिसकी सनातन संस्कृति में कहा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता! अर्थात जहां नारी की पूजा की जाती है वहीं देवता बसते हैं. वो हमारे परिवार में हमारी जननी हमारी माँ हो, या हमे राखी बाँधने वाली हमारी बहन अथवा हमारी दुलारी बिटिया – सभी को मातृ शक्ति माना जाता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि बहन घर की लाज होती है और बेटी घर की लक्ष्मी.
ऐसे नारी को देवतुल्य स्थान देने वाले सनातनी हिन्दुओं के देश में नारियों को गालियों का निशाना बनाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. यही कारण है कि भारत के पूर्व इतिहास में अथवा भारत के प्राचीनकालिक हिंदी अथवा संस्कृत के ग्रंथों में कदापि कहीं भी किसी भी तरह की गाली का उल्लेख नहीं है. अपशब्दों का चलन अवश्य देखा गया है किन्तु वह भी आभिजात्य संस्कृति का भाग कदापि नहीं रहे. अपशब्द असभ्य और असंस्कृत आमजनो के बीच प्रचलन में रहे हैं परन्तु कुलीन परिवारों में और राज घरानों के लिए ये अपशब्द पतित संस्कारों में सम्मिलित हैं.
भारत में आज जो गालियां आप हर सड़क चौराहे या कभी कभी कार्यालयों और ड्राइंग रूमों में भी सुन सकते हैं ये मूल रूप से गालियां ही हैं, अपशब्द नहीं. गालियां अर्थात पतित संस्कारों वाले अपशब्दों से भी अधिक पतित और वीभत्स शब्द जो हमारी भाषा हिंदी अथवा संस्कृत के अंग नहीं हैं. ये मुगलई संस्कृति के प्रतिनिधि शब्द हैं क्योंकि ये उनके जीवन से जुड़े हैं. मुगलई भाषा से जन्मे ये शब्द जो आज गाली बन कर बेशर्मी से बहुतायत में हिन्दुओं की जुबान पर चढ़े हुए हैं – उसी नारी के यौन अंगों पर आधारित हैं जो उस हिन्दू की संस्कृति में देवी के समतुल्य है.
कहने का अर्थ है कि मुगलों के भारत में आगमन ने अपनी एक और गंदगी से हमारी पावन संस्कृति की चादर को मैला कर दिया है और वह है गालियां. उनकी भाषा भी हमने अपना ली और उनकी गालियां भी. हमारी अपनी मूल भाषा में आज स्थिति ये है कि साठ से पिछत्तर प्रतिशत मुगलई भाषा बोली जाती है जो हिन्दुओं के इस देश में मुगलों की तरह बाहर से आई है. कमाल की बात ये है कि आम अज्ञानी हिन्दू को ये पता नहीं कि जो गालियां वो दिन रात बक रहा है वो मुगलई शब्द हैं और हद तो ये है कि आम हिन्दुओं को ये भी पता नहीं कि दिन भर जो मुगलई भाषा वो आमतौर पर बोले जा रहा है वह सिर्फ पच्ची से चालीस प्रतिशत उसकी अपनी हिंदी भाषा है बाकी सब विदेशी भाषा. हाँ, इसके लिए आम आदमी को दोषी नहीं माना जा सकता उसका अज्ञान, उसकी अनपढ़ता और पिछले सत्तर सालों में देश में राज करने वाली हिन्दू विरोधी ऐतिहासिक कांग्रेस पार्टी भी इसकी बड़ी दोषी है.
ऐसी स्थिति में कुल मिला कर सार ये निकलता है कि यदि नारी यौनांगों पर आधारित गालियां बकते हैं तो आपको अपनेआप को हिन्दू नहीं कहना चाहिए. क्योंकि जिस नारी के यौनांगों पर आधारित गंदे शब्द आप हवा में उछाल रहे हैं वही नारी आपके घर में है और आपके परिवार में आपकी बेटी, बहन और माँ के रूप में प्रतिष्ठित है. ये सारी आपकी गालियां उनको ही लग रही हैं. और तो और इन गलियों को बकने वाले को देवी माँ की पूजा नहीं करनी चाहिए न ही नवरात्रि का व्रत करना चाहिए क्योंकि उसकी ये सारी गलियां सबकी माँ जगदम्बा को लग रही हैं जो शर्मनाक भी हैं और अक्षम्य भी. माँ की गाली बकने वाला नीच व्यक्ति माँ जगदंबा का बेटा कैसे हो सकता है..बेटा तो दूर की बात वह माँ का भक्त भी कैसे हो सकता है?
ये जानने के बाद भी यदि कोई हिन्दू गाली बकना बंद नहीं करता तो उसे हिन्दू कहलाने का ढोंग बंद कर देना चाहिए क्योंकि उसे गौरवशाली हिन्दू संस्कृति में सम्मिलित होने का कोई अधिकार नहीं है और अब समय आ गया है कि उसे खुल कर अपने नाम के साथ जुड़े हुए हिन्दू सरनेम को हटा कर मुगलई सरनेम भी लगा लेने चाहिए.

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