मजबूर है मजदूर बनने के लिये इन्जीनियरिंग की स्टूडेन्ट, गिरवी पड़ा है डिप्लोमा

फीस भरने के लिए इंजीनियरिंग की स्‍टूडेंट कर रही है मजदूरी..जी हाँ, सच्ची कहानी है ये, फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं और आप भी अपनी आँखों से जब इस छात्रा को मजदूरी करते देखेंगे तो सोचने को मजबूर हो जाएंगे..

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भारत में अगर पढ़े-लिखे लोग हर साल बेरोजगारी की लाइन में खड़े हो कर लाइन और लम्बी कर देते हैं तो ऐसी हालत में देश में पढ़ाई इतनी महंगी क्यों है? किस काम है वह पढ़ाई जिससे रोजी न मिले? किस काम की है वो पढ़ाई जिसकी कीमत चुकाने के लिए लोगों को मजदूरी करनी पड़े? कौन है इसका जिम्मेदार – सिस्टम? या सरकार? या शिक्षा प्रणाली ? या फिर पढ़ने वाला छात्र?

उड़ीसा की है रोजी

अब ऐसे कैसे बचायेंगे बेटी और कैसे पढ़ायेंगे बेटी? इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो बड़ी नौकरी की पढ़ाई है लेकिन ये पढ़ाई इतनी बड़ी है कि एक गरीब छात्र इसके सामने बहुत छोटा हो जाता है. उड़ीसा की रोजी है इस कड़वे सच का उदाहरण. उसके लिए न सिर्फ ये इंजीनियरिंग की पढ़ाई बहुत बड़ी हो गई है बल्कि बहुत कड़ी भी हो गई है. रोज़ी को सड़क किनारे कड़ी मेहनत करके पैसे कमाने पड़ रहे हैं ताकि वह अपनी पढ़ाई का खर्चा उठा सके.

फीस चुकाने के लिए ढो रही है मिट्टी

उड़ीसा के पूरी शहर की रहने वाली रोज़ी अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की फीस चुकाने की हालत में नहीं है इसलिए मजबूरन उसे मिट्टी ढोने का काम करना पड़ रहा है. अब उसे रोज़ी कहा जाए, इंजीनियरिंग की स्टूडेंट बोला जाए या मजदूर कह कर पुकारा जाए – ये तय करना आसान नहीं है.

भुवनेश्‍वर की मजदूर है ये भावी इंजीनियर

रोजी अक्सर खुद से सवाल करती होगी कि क्या वह इंजीनियर बनने के लिए मजदूर बनी है है या मजदूर बनने के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है. उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में मजदूरी कर रही रोजी ने अपनी इंजीनियरिंग पढ़ाई तो पूरी कर ली, पर उसे डिप्लोमा नहीं मिला क्योंकि वह कॉलेज की फीस चुकाने में नाकाम रही. अब अपने डिप्‍लोमा के लिए वह दिहाड़ी मजदूर बन गई है और रोजाना 207 रुपये के आधार पर मनरेगा मजदूर की हैसियत से काम कर रही है. उसे कुल 44000 रूपये इकट्ठे करने हैं ताकि अपना डिप्‍लोमा छुड़ा सके जो कॉलेज में गिरवी है.

पिता के साथ कर रही है मजदूरी

एक बेबस बाप की बेबस बेटी है रोजी जो अपने करियर से 44000 कदम दूर खड़ी है. आज की तारीख में एक रुपया उसके लिये एक कदम के बराबर है और इस तरह इन्च इन्च चल कर वो अपनी मन्जिल की तरफ बढ़ रही है. उड़ीसा की इस परिश्रमी छात्रा का घर पुरी जिले के पिपली ब्‍लॉक के गोराडापिढ़ा गांव का है, जहां उसने विपरीत आर्थिक चुनौतियों से दो-दो हाथ करके लगन और मेहनत से इंजीनियरिंग का मुकाम हासिल किया और फिर वह पढ़ाई भी पूरी कर ली, लेकिन उसके बाद भारी भरकम फीस चुकाना उसके लिए इतनी बड़ी चुनौती बन गया है कि उसे अपने पिता के साथ मनरेगा मजदूर के तौर पर काम करना पड़ गया है. आप भी दुआ कीजिये रोजी के लिये और देश में उसके जैसे लाखों छात्रों के लिये !!

 

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