वो ’45 मिनट’ नहीं बल्कि ये फैसले और खिलाड़ी हैं हार के जिम्मेदार

ऐसे वक्त में टीम मैनेजमेंट ने प्रयोगशाला भी खोल कर रख दी. पहले ऋषभ पंत फिर दिनेश कार्तिक और फिर हार्दिक पांड्या को मैदान में उतार दिया जबकि धोनी ड्रेसिंग रूम में बल्ले से बांसुरी बजाते दिखे.

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टीम इंडिया ने जब न्यूजीलैंड के साथ वार्म अप मैच खेला था तो किसी ने सोचा नहीं होगा कि ये सेमीफाइनल का न सिर्फ रिहर्सल है बल्कि एडवांस में एक्शन रीप्ले भी है. वॉर्म अप मैच में ही  न्यूजीलैंड ने टीम इंडिया के जोश पर ठंडा पानी डालने का काम किया था और उसके बाद सेमीफाइनल में होश उड़ा देने का काम किया. कप्तान विराट कोहली कहते हैं कि सिर्फ 45 मिनट में ही सारा खेल बदल गया. आखिर वो 45 मिनट क्या था जब न सिर्फ रोहित, विराट और राहुल ब्लैक-कैप्स के ‘काला जादू’ के वशीकरण में बेबस हो गए बल्कि टीम मैनेजमेंट भी खिलाड़ियों को मैदान में उतारने में हड़बड़ी दिखा गया?

रोहित के विकेट से टीम इंडिया की कहानी का पहला अध्याय शुरू होता है. ये याद रखने वाली बात है कि रोहित को मैचों में लगातार जीवनदान मिले और उन्हीं जीवनदान का फायदा उठा कर वो सेंचुरी बनाते चले गए. लेकिन जहां उन्हें जीवनदान नहीं मिला तो वहां उनकी पारी ऐसे ही 1 या शून्य पर सिमट गई. इस बार भी यही हुआ कि वो नई गेंद का ताजा शिकार बने और जीवनदान नहीं मिला. सवाल उठता है कि ऐसे समय में जब शिखर धवन चोट से बाहर हैं और सारी जिम्मेदारी उठाने वाले रोहित को सेट होने का मौका भी नहीं मिला और वो पवैलियन लौट गए तो ऐसे में क्या कोहली को धैर्य के साथ सिर्फ विकेट पर टिकने की कोशिश नहीं करना चाहिए? कोहली पर सवाल उठाना आसान नहीं है क्योंकि उनके साथ उनके रिकॉर्ड खड़े हैं तो उनकी वर्ल्ड-क्लास टॉप बल्लेबाजी लेकिन सवाल बैटिंग तकनीक से ज्यादा उस माइंडसेट का है जो कोहली की बैटिंग के वक्त पहली बार नहीं दिखा. उनका आउट होना साल 2015 के सेमीफायनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ आउट होने जैसा था. कोहली लड़खड़ाए तो के एल राहुल तो धराशायी ही हो गए जैसे उन्हें आउट होने का बहाना मिल गया.

ऐसे वक्त में टीम मैनेजमेंट ने प्रयोगशाला भी खोल कर रख दी. पहले ऋषभ पंत फिर दिनेश कार्तिक और फिर हार्दिक पांड्या को मैदान में उतार दिया जबकि धोनी ड्रेसिंग रूम में बल्ले से बांसुरी बजाते दिखे. बड़ा सवाल ये है कि ऐसे वक्त में जब आपका चौथे नंबर का बल्लेबाज ओपनिंग में मजबूरी में भेजा गया हो तो क्या चौथे नंबर पर धोनी को नहीं उतारा जाना चाहिए?

कोहली कहते हैं कि सिर्फ 45 मिनट में सारा खेल बदल गया. जाहिर तौर पर 5 रन पर जब 3 विकेट गिरेंगे तो ऐसा ही होगा. लेकिन टीम के कोच और कप्तान ने मैदान में एक छोर पर जोश और एक छोर पर होश रखने का काम क्यों नहीं किया?  ज़रा सोचिए अगर एक छोर पर ऋषभ पंत होते और दूसरे छोर पर धोनी होते तो क्या ऋषभ पंत उतना गैरजिम्मेदारना और गली के क्रिकेट का शॉट खेलकर आउट होते?

ऐसे समय वो दूसरे छोर पर खड़े सीनियर खिलाड़ी धोनी के दबाव में होते और गैरजिम्मेदाराना शॉट कतई नहीं खेलते बल्कि रन तेजी से रोटेट होते रहते. लेकिन दोनों ही छोर पर हार्दिक और  ऋषभ जैसे बल्लेबाजों में गेंदबाजों का गुरूर उतारने की होड़ लगी हुई थी. उन्हें अपने विकेट की ही नहीं बल्कि इस मैच की कीमत का अंदाज़ा नहीं था कि यहां से हारने का मतलब सीधे घर वापसी थी.

गैरजिम्मेदाराना तरीके से दोनों खिलाड़ी आउट हुए. क्रिकेट के बेसिक्स कहते हैं कि जब किसी गेंदबाज के सामने बल्लेबाज की एक न चले तो वो चुपचाप उसके ओवर निकालने का काम करे बजाए इसके कि आढ़े-टेहड़े और खराब शॉट खेलकर उसे तोहफे में अपना विकेट दे. इन दोनों महारथियों ने यही किया. सेंटनर ने इन्हें मजबूर किया खराब शॉट खेलने के लिए और ये दोनों सेंटनर के जाल में फंस गए और ऊंचा शॉट मारकर विकेट गंवा गए. इनके विकेट गिरने ने टीम पर जबर्दस्त दबाव बढ़ा दिया. इनसे पहले दिनेश कार्तिक ने सबसे ज्यादा निराश किया. उनके पास भी एक सुनहरा मौका था. दिनेश कार्तिक एक यादगार पारी खेलकर इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज करा सकते थे. लेकिन वो अपने चयन को सही साबित नहीं कर सके. मुश्किल समय में दिनेश कार्तिक किसी नौसीखिए की तरीके मैदान पर नजर आए और फिर आउट हो कर लौट गए.

सवाल फिर उसी मिडिल ऑर्डर और चौथे नंबर की बल्लेबाजी पर उठता है. याद कीजिए जब अंबाति रायुडू को वर्ल्ड कप का टिकट नहीं मिला तो ये कहा गया कि उनकी जगह विजय शंकर 3 डाइमेंशन खिलाड़ी हैं जो गेंद, बल्ले और फील्डिंग से कमाल दिखाएंगे. लेकिन विजय शंकर ने बेहद खराब प्रदर्शन किया. उसके बाद शिखर धवन जब चोट की वजह से टीम से बाहर हुए तो चौथे नंबर की बल्लेबाजी के लिए चुने गए के एल राहुल को उनकी जगह ओपनिंग के लिए भेज दिया गया. ऐसे में चौथा नंबर फिर खाली हो गया जिसे टीम मैनेजमेंट यानी रवि शास्त्री और एमएसके प्रसाद ने ऋषभ पंत के रूप में भरा. लेकिन ऋषभ पंत के आने से मिडिल ऑर्डर में वो जान नहीं आ सकी जिसकी न्यूजीलैंड के खिलाफ जरूरत थी. खास बात ये है कि टीम मैनेजमेंट ने मयंक अग्रवाल के रूप में इंडिया से एक एक्स्ट्रा ओपनर बुलवा लिया लेकिन इंग्लैंड कंडीशन्स में बैटिंग कर रहे आजिंक्य रहाणे को मिडिल ऑर्डर और खासतौर से चौथे नंबर के लिए बुलाना जरूरी नहीं समझा? आखिर क्यों? क्या रहाण का क्लास दिनेश कार्तिक, ऋषभ पंत या विजय शंकर में है?

सेमीफाइनल में हार के पहले से ही टीम इंडिया की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर हो चुकी थी जिस पर रोहित अपने शतकों से और कोहली अपने अर्धशतकों से पर्दा डालने का काम कर रहे थे. लेकिन न्यूजीलैंड ने न सिर्फ इस पर्दे को उठा कर रख दिया बल्कि बोरिया बिस्तर भी समेट दिया.

सवाल कई हैं. सवाल धोनी के दूसरे रन पर भी है तो सवाल अंपायरों की खराब अंपायरिंग पर भी हैं. लेकिन उन सवालों से अब हासिल कुछ नहीं सिवाए खुद को झूठी दिलासा देने के. कोहली मानते हैं कि विश्व कप का ये फॉर्मेट बिल्कुल ठीक नहीं था. उनका ये सोचना लाजिमी भी है क्योंकि पूरे टूर्नामेंट में टीम इंडिया ने शानदार क्रिकेट खेला और वो टॉप पर रही लेकिन किसी तरह ग्रुप में चौथे नंबर पर रहने और सेमीफाइनल पहुंचने वाली न्यूजीलैंड उसे हरा कर फाइनल में पहुंच गई. इस फॉर्मेट में आईपीएल की तर्ज पर एक मौका टॉप में रहने वाली टीम को दिया जा सकता था.लेकिन अब ये बातें बेमानी हैं ठीक उसी तरह कि ऐसा करते तो वैसा हो जाता.

लेकिन एक सवाल का जवाब जरूर टीम मैनेजमेंट को देना होगा कि अंबाति रायुडू को जब वर्ल्ड कप में खिलाना नहीं था तो दो साल तक उनको वर्ल्ड कप के नाम पर तैयार क्यों किया गया? न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरिज में शानदार प्रदर्शन करने वाले रायुडू भी सेमीफाइनल के वक्त याद आए और उनके संन्यास का फैसला भी याद आया. अब सोचने वाली बात है कि जब टीम इंडिया का मिडिल ऑर्डर न्यूजीलैंड के खिलाफ एक-एक रन के लिए संघर्ष कर रहा था तब आजिंक्य रहाणे इंग्लैंड में मौजूद थे और रायुडू क्रिकेट से संन्यास ले चुके थे जो मिडिल ऑर्डर में विकेटों की पतझड़ के बीच दीवार की पहचान बना चुके थे.  

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