ज़रा सोचिये: क्यों विदेश चली जाती हैं भारत की प्रतिभायें?

क्या कोई ऐसा रास्ता नहीं है कि भारत की प्रतिभाओं को हम देश छोड़ कर विदेश चले जाने से रोक सकें? आखिर क्या कमी है भारत देश में ?

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कल ही बात हो रही थी मामा जी ऑस्ट्रेलिया जाने की बात कर रहे थे, वहां उनकी बेटी – दामाद रहते हैं , उन्होंने नया घर खरीदा है जिसे देखना चाहते हैं। इस विषय पर विचार करते हुए मेरे मन में कुछ सवाल उठे, क्या यह देश के प्रति गद्दारी नहीं है?
जो युवा अपना कीमती समय देश के लिए न देकर पैसे की चाह में उन देशों को दे रहे हैं जिन्होंने भारत का दोहन किया और हमें इस स्तर तक चोटिल किया कि हमारा इतिहास अब मूल रूप से परिवर्तित हो गया है। पढ़ाई लिखाई हम भारत में करें और अपना ज्ञान और क्षमताएं हम विदेशों में बेच दें, यह कहां तक न्यायसंगत है?
ज़रा सोचिये, क्या हमें हमारा अहम कचोटता नहीं कि हमने अपने देश के लिए कुछ भी नहीं किया अपना देश बुरा लगता है तो फिर यहां जन्म ही क्यों लिया वही लेते विदेश में। भेड़ चाल के तहत हम अपना स्वाभिमान भी दांव पर लगा रहे हैं क्या हमारा जन्म इसीलिए हुआ अगर आज भारत पिछड़ा हुआ है तो इसीलिए क्योंकि हमने अपने देश की खातिर कुछ नहीं किया। और जो करना चाहता है उसे मौका नहीं मिल रहा मेरा मानना तो यह है देश अगर प्राथमिकता है तो आप यही रहिए अपना अमूल्य समय भूखे रहकर भी देश को दीजिए ना कि पैसे की खातिर आप बिकाऊ सामान बन जाए।
माइक्रोसॉफ्ट जैसे कंपनियों में 50% से ज्यादा भारतीय है । विदेशो में डॉक्टर भारतीय हैं। इस स्थिति के पीछे कौन ज़िम्मेदार है, सवाल ये है.अगर विदेशो में काम कर रहे हैं कुछ तो फायदा सरकार और देश को भी होगा?
बात सही है कि आपको फ़ायदा है, सिर्फ विदेशी मुद्रा का जिसके माध्यम से व्यापार और मुद्रा का हस्तांतरण होता है। लेकिन ये स्थिति भेड़चाल की है और इसका कारण है जनसंख्या ज्यादा है रोजगार है नही, जो छोटे रोजगार थे उनपर बंगला देशी और राहिंग्या मुसलमानों ने कब्जा कर लिया है।
डिग्रियां हासिल करने के बाद भी उन होनहार बच्चों को जॉब तक नही मिलती। जॉब मिलती है आरक्षण वालो को।
काबिल को नकार दिया जाता है। और इस का फायदा विदेशी कंपनियां उठती है। उनको होनहार काम करने वाले मिल जाते है।
सच तो ये है कि भारतीय ब्रेन का लोहा तो जापान भी मानता है और कहता है ” बिहार इज़ फैक्टरी ऑफ इंजीनियर्स।”

(सुनीता मेहता)

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