शिवसेना देखती रह जाएगी और शरद पवार सीएम पद ले उड़ेंगे!

अब महाराष्ट्र के रण में शिवसेना की पलटी को देखकर बीजेपी सबक सिखाने के लिए एनसीपी से समर्थन ले भी सकती है तो समर्थन दे भी सकती है. हो सकता हो कि पर्दे के पीछे इसकी पटकथा पूरी तरह तैयार हो चुकी हो और जब तक शिवसेना को होश आए तब तक महाराष्ट्र में सरकार बन चुकी हो

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अगर 56 विधायकों के दम पर शिवसेना अध्यक्ष उद्धव अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री का दावा पेश कर सकते हैं तो फिर 54 सीटें जीतने वाली एनसीपी के सुप्रीमो शरद पवार मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकते? ये सवाल इसलिए क्योंकि महाराष्ट्र के सियासी संकट में जिस तरह से हर घंटे में समीकरण बदल रहे हैं उसे देखकर लगता है कि असंभव कुछ भी नहीं. वैसे भी राजनीति में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होतीं. किसने सोचा था कि कि सीएम की कुर्सी के लिए शिवसेना बीजेपी से 30 साल पुराना रिश्ता तोड़ लेगी?

महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की मिलीजुली सरकार बनाने की संभावनाओं के बीच ही राज्यपाल शासन लग चुका है. लेकिन सरकार बनाने की संभावनाओं पर विराम नहीं लगा है क्योंकि कवायद जारी है. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने शिवसेना का इतिहास बदलते हुए कांग्रेस के साथ सत्ता को लेकर सौदेबाज़ी की.

पिछले महीने ही शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के खिलाफ चुनाव लड़कर 56 सीटें हासिल की थीं. लेकिन राजनीति के खेल मे सत्ता का लोभ तीनों पार्टियों पर ऐसा हावी हुआ कि अब तीनों ही एक-दूसरे के साथ सौदेबाज़ी कर रही हैं. इस सौदेबाजी के तय होने के बाद इसे कॉमन मिनिमम प्रोग्राम या फिर 50-50 फॉर्मूले का नाम दिया दे दिया जाएगा. इस खेल को बीजेपी दूर से देख रही है. इस खेल में शिवसेना फ्रंट पर खेलती दिख रही है. वहीं इस खेल में कांग्रेस बेहद सधे हुए और सतर्कता से एक-एक कदम फूंक-फूंक कर बढ़ा रही है. लेकिन पूरी सियासी हलचल में एनसीपी की गतिविधियों को देखकर साबित होता है कि मराठा क्षत्रप शरद पवार चुनाव बाद के खेल में भी सबसे बड़े खिलाड़ी साबित हुए हैं.

शरद पवार फिलहाल एक साथ दो पार्टियां चलाते हुए दिखाई दे रहे हैं. इसकी बड़ी वजह ये है कि एक तरफ तो मीडिया के सामने पवार आ कर ये कहते हैं कि उन्हें जनता ने विपक्ष में बैठने का आदेश दिया है और वो सरकार नहीं बनाएंगे. तो दूसरी तरफ वो शिवसेना को समर्थन का पर्दे के पीछे से ऐसा लालच दे रहे हैं कि शिवसेना बिना समर्थन पत्र लिए ही शर्तें मानने को बेकरार दिखाई दे रही है. इसकी पहली बड़ी झलक तब दिखी जब उसने एनसीपी के कहने पर एनडीए से नाता तोड़ लिया और शिवसेना के मंत्री ने इस्तीफे का ऐलान कर दिया.

राजनीति के शतरंज में बड़ी तेजी से ढाई घर चलने की कोशिश में शिवसेना ने एनसीपी से समर्थन-पत्र लिए बगैर ही शर्तों के सामने सरेंडर कर दिया. ये शरद पवार की राजनीति की बानगी भर है. जो शिवसेना चुनाव से पहले पानी पी-पी कर कांग्रेस और एनसीपी को कोसती थी वही शिवसेना आज सरकार बनाने के लिए एनसीपी का भरोसा जीतने की जुगत मे जुटी हुई है.

इसके ठीक उलट शरद पवार ये कहते हैं कि उनकी शिवसेना के साथ समर्थन को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई.

जबकि शिवसेना बार बार ये शोर मचाती रही कि उसके पास बहुमत का 175 का आंकड़ा मौजूद है.

राज्यपाल से मिलने से पहले तक एनसीपी ही कांग्रेस से बात करती रही जबकि शिवसेना के समर्थन में कांग्रेस समय लेती रही और आखिर में राज्यपाल को राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करनी पड़ गई.

साफ है कि शरद पवार शिवसेना को समर्थन देने के लिए मन नहीं बना सके हैं.

बल्कि शरद पवार कहीं शिवसेना से समर्थन लेकर खुद ही मुख्यमंत्री न बन जाएं.

बहुत मुमकिन है कि शिवसेना को सबक सिखाने के लिए बीजेपी एनसीपी को बाहर से समर्थन दे सकती है. ठीक उसी तरह जिस तरह शिवसेना ने कांग्रेस से समर्थन मांगा.

कांग्रेस का हर विधानसभा चुनाव में केवल एक ही लक्ष्य है कि किसी भी तरह से बीजेपी को सत्ता में आने से रोकना. इसके लिए कांग्रेस ने पहले कर्नाटक में जेडीएस को समर्थन देकर बीजेपी की सरकार नहीं बनने दी. इसी तरह अब महाराष्ट्र में कांग्रेस की कोशिश रहेगी कि बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए शिवसेना को समर्थन देना. चूंकि यहां विचारधारा के टकराव की वजह से कांग्रेस की भविष्य की सियासत पर असर पड़ सकता है. बताया कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने केरल में कांग्रेस के भविष्य को देखते हुए शिवसेना को समर्थन देने का विरोध किया.

अब कांग्रेस और एनसीपी के बीच न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति तो बन गई है. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या शिवसेना इस कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की शर्तों को कबूल कर पाएगी.

सत्ता किसी भी कीमत पर चाहने वाली शिवसेना को क्या कांग्रेस-एनसीपी पहले सरकार और शिवसेना बनाने का मौका देंगे?

 अगर तीनों के बीच किसी तरह ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर सहमति बन भी गई तो क्या शिवसेना को पहला मौका मिलेगा? बहुत मुमकिन है कि ये मौका शरद पवार के हाथ ही लगे.

वैसे भी अब महाराष्ट्र के रण में शिवसेना की पलटी को देखकर बीजेपी सबक सिखाने के लिए एनसीपी से समर्थन ले भी सकती है तो समर्थन दे भी सकती है. हो सकता हो कि पर्दे के पीछे इसकी पटकथा पूरी तरह तैयार हो चुकी हो और जब तक शिवसेना को होश आए तब तक महाराष्ट्र में सरकार बन चुकी हो. ये भी मुमकिन है कि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में पवार साहब जानबूझकर ऐसी शर्तें रखें जिन्हें शिवसेना मंजूर न कर सके और उसके बहाने  पवार सरकार बनाने के गेम में बीजेपी के साथ 50-50 का फॉर्मूला सेट कर  लें.

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