Independence Day Editorial: एक बार मातृभूमि के लिये मरने का अवसर दे दो, भगवान !

2
99
एक जनम तो दे दो मुझको राष्ट्र पे मर मिट जाने को..गर्व के साथ जनम ले लूँ अभिमान के साथ गुजर जाने को..एक जनम तो दे दो मुझको राष्ट्र पे मर मिट जाने को..
यदि इस जीवन में ये अभिलाषा पूर्ण न हुई तो ईश्वर से अगले जन्म में इस सर्वोच्च उपलब्धि की प्रार्थना की है ताकि जीवन भी सफल हो जाए देश के लिए मर जाने के बाद..
भारत में शहादत नहीं कही गई है यह, देश के लिए मरने को वीरगति की उपमा दी गई है. वीरगति केवल वीरों के बस की बात होती है, आम मनुष्यों के लिए नहीं. यह वो स्थिति है जिसमें इतना अभिमान है कि मरने वाला मर के भी नहीं मरता, अमर हो जाता है. उसके साथ ही अमर हो जाते हैं उसके परिजन जिन्हें गर्व की दृष्टि से देखा जाता है.
वास्तव में जो छूट जाते हैं पीछे उनकी पीड़ा विशद होती है. इस पीड़ा की कल्पना आसान नहीं. जो अब तक था परिवार का अंग जो अब था रोज़ हमारे साथ – अब वो नहीं है और अब वो आएगा भी नहीं – इस बात की कल्पना ही इतनी पीड़ा दे देती है कि वास्तव में जीवन में इस स्थिति का सामना करना पड़े तो बहुत ही विकट होगी वह स्थिति. आप ये सोचते रह जाएंगे – जो हुआ है वो अच्छा हुआ है या अच्छा नहीं हुआ ?
देश पर प्राण निछावर करने वाले को देश सलाम करता है, देशवासी हृदय में प्रणाम करते हैं. देश की सेना राष्ट्र ध्वज में लिटाती है वीरगति प्राप्त माँ भारती के वरद पुत्र को. अंतिम शयन शान से होता है और यह शयन सम्मान की वह गति है जिसका आनंद वही जान सकता है जो शयन करता है अपने तिरंगे के भीतर. निर्निमेष नेत्रों से देखते हैं उसे उसके परिवारजन जो कुछ भी कह पाने में असमर्थ होते हैं. और इस बलिदानी के अंतिम संस्कार के समय वहां उपस्थित हर व्यक्ति कृतज्ञ होता है उस परिवार का जिसका अब तक का अभिन्न अंग अब देश के नाम कर चुका है अपनी जान!
एक सन्नाटा सा पसर जाता है घर में. कोई कुछ कहे तो आखिर क्या कहे. जाने वाले की याद आती है मगर वो नहीं आता. ह्रदय अभिमान से तृप्त होता है कि हमारे परिवार का लाल माँ भारती के काम आया किन्तु उसकी कमी मूक कर देती है सभी को. ये भी सोचते हैं सब कि क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि विजय का सन्देश ले कर जीवित वापस आता उनका लाड़ला, तिरंगे में लिपट कर नहीं ! और ये भी सोचा जाता कि ऐसे ही जाना था तो क्या अभी ही जाना था, क्या आगे फिर कभी नहीं जाया जा सकता था?
इस गौरव-मृत्यु का आनंद लेने का सौभाग्य प्राप्त करना एक स्वप्न जैसा है मेरे लिए. इस जन्म में यदि ईश्वर इस स्वप्न को साकार करेंगे तो यही जन्म सफल हो जाएगा उस मृत्यु की भांति ही. ऐसा होना है यदि यह पता चल जाए तो हर क्षण हर्ष और आल्हाद का एक युग बन जाए – और हृदय व्याकुल हो कर प्रतीक्षा करे उस क्षण की जिस समय अपने राष्ट्र के लिए अपने प्राणों के उत्सर्ग का अवसर प्राप्त हो. ये सौभाग्य से बढ़ कर उपलब्धि है और ये उपलब्धि सबसे बड़ा सौभाग्य है मेरे लिए.
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि यदि किंचित भी प्रेम है मेरे हृदय में अपने राष्ट्र के लिए, तो इस जन्म में ही मुझे वह अवसर प्रदान कर देना कि देश के नाम हो गए मेरे निष्प्राण शरीर को देख कर मेरी आत्मा की आँखों में भी अपार हर्ष के अश्रु उमड़ आएं. और यदि मेरी प्रार्थना मेरे प्रभु सुन लें तो उनसे यही मांगूंगा कि ये नहीं तो अगला जन्म अवश्य दे देना कि उसमे अपनी मृत्यु का उत्सव मना सकूं मैं..और अपनी भारत माँ से कह सकूँ – तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें!

– सुमन पारिजात (ग्रुप एडीटर, न्यूज़ इन्डिया ग्लोबल)

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here