परख की कलम से: हिन्दी को PM Modi अब फिर से स्थापित करेंगे

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जब हिन्दी के लिये वीर सावरकर, महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस एक तरफ खड़े थे जबकि सारे मुसलमान दूसरी तरफ।
आज जो हिन्दी प्रयोग में आ रही है वह मात्र 120 वर्ष पुरानी है जबकि वास्तविक हिन्दी कुछ 3500 वर्ष पहले संस्कृत से जन्म ले चुकी थी।
हिन्दी का जन्म भले ही महाभारत काल के बाद हुआ हो मगर फिर भी उसने कई हजार वर्षों के इतिहास को संजोए रखा।
हिन्दी का जब जन्म हुआ उस समय उसे घरेलू भाषाओं से संघर्ष करना पड़ा, हिन्दी को संस्कृत के सरल रूप में देखा जाता था। अतः हिन्दी ने राज्यो में भव्य प्रवेश किया।
7वी सदी तक हिन्दी अपने चरम पर पहुँच चुकी थी, राजपूत राजाओं ने इसे चर्मोत्कर्ष पर बैठा दिया। समस्या शुरू हुई 1192 से, जब तराइन के द्वितीय युद्ध मे पृथ्वीराज चौहान की हार हुई और मुसलमानो ने भारत मे पहला स्थायी कदम रखा।
मुगलों की एक परंपरा रही है कि वे यदि किसी देश को जीत लेते है तो सबसे पहले उस देश के धर्म, भाषा और संस्कृति को खत्म करते है ताकि उस देश के लोग अपना पुराना सब कुछ भूल जाये और मुगलों को ही अपना उद्धारक मानकर जेहाद और उनके हिसाब से ईमान पर चलने लगें। इसलिए हिन्दी हटाकर फ़ारसी लागू की गई।
मगर भारत बहुत बड़ा था, मुगल भाषायी नियंत्रण नही लगा सके, हिन्दी और फ़ारसी के मिश्रण से उर्दू बना दी गयी। अब हिन्दी एक समय की बात हो गयी। जब उत्तर भारत मे मराठा शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ तो हिन्दी पुनः स्थापित हुई।
मराठाओ के आने से हिन्दी भाषी क्षेत्रो में फिर से गुरुकुल आरंभ हुए और संस्कृत ने फिर से हिन्दी मे नई जान फूंक दी। समस्या दोबारा आयी जब 1818 में तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध हुआ और मराठाओ की पराजय हुई तथा भारत ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथ मे चला गया।
अंग्रेजो ने हिन्दी का दमन नही होने दिया मगर फिर से फ़ारसी को ही मुख्य भाषा बना दिया। सौभाग्य से हिन्दी तब तक पुनःजन्म ले चुकी थी, भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म हुआ जो कि बहुत अमीर परिवार से थे।
भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने अपनी सारी जमा पूंजी हिंदी के नवनिर्माण में लगा दी और गरीबी से मरे। भारतेंदु जी के इस बलिदान ने माखनलाल चतुर्वेदी, मुंशी प्रेमचंद और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसे दिग्गजो में जोश जगा दिया।
20वी सदी के आरंभ में ही हिन्दी मे लाखो कविताएं, पद्य, कहानी और नाटक लिखे गए। रही सही कसर दादा साहेब फाल्के ने पूरी कर दी, 1911 में बॉलीवुड का जन्म हुआ। फाल्के साहब ने राजा हरिश्चंद्र फ़िल्म बनाई और पूरी दुनिया को भारत का असल इतिहास बता दिया।
इसके बाद तो एक से एक हिन्दी गीतों और फिल्मों की श्रृंखला बन गयी। हिन्दी अब बोल चाल में उर्दू से कई गुना ऊपर थी, वीर सावरकर ने कहना शुरू कर दिया कि अंग्रेज हिन्दी को वरीयता दे। मुंबई में सावरकर जी ने इसके लिये आंदोलन कर दिया अतः अंग्रेजो ने इसे पाठ्यक्रम में लेना आरंभ किया।
हिन्दी विरोधी मुसलमान इससे नाराज हो गए और उन्होंने कई जगह दंगे किये मगर हिन्दी के लिये न केवल आर एस एस और हिन्दू महासभा मैदान में उतरी, बल्कि कांग्रेस भी उतर आयी। कमाल तब हो गया जब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने रेडियो पर कह दिया कि हिन्दी भारत की आवाज है और अंग्रेजो को उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।
इसमे उन हिन्दी विरोधी मुसलमानों को ये समझ में आ गया कि एक बार यदि हिन्दी राष्ट्रभाषा बनी तो कभी गजवा ए हिन्द के बारे में सोचा नही जा सकेगा क्योकि भारत के लोग इस्लाम के पहले से स्थित इतिहास से जुड़े रहेंगे। इस सोच से भी पाकिस्तान के निर्माण वाले सिद्धांत को बल मिला मगर कांग्रेस तब तक हिंदी की अभिभाषक बन चुकी थी।
1947 में देश आज़ाद हुआ और हिंदी को भारत की राष्ट्र तो नही मगर मुख्य भाषा बना दिया गया। आजादी के बाद हिन्दी बॉलीवुड और साहित्य के दम पर फिर उठ खड़ी हुई। मध्यप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा जैसे हिन्दी भाषी राज्यो ने कई प्रतियोगिता आयोजित करके लोगो को प्रोत्साहित किया।
हिन्दी ने दक्षिण में बहुत विरोध सहा मगर जैसे जैसे देश का औद्योगिकीकरण होता गया दक्षिण वालो का हिन्दी प्रेम अब बढ़ने लगा।
अब 2021 में नरेंद्र मोदी जी अंग्रेजी को वैकल्पिक बनाने को सोच रहे है यदि ऐसा हुआ तो हिन्दी अब उस ऊँचाई पर होगी जिसकी परिकल्पना भी आसान नही है। हिन्दी की प्रगति देखकर लगता है राष्ट्रवादियों के हित मे कुछ तो अच्छा हो रहा है.
(हम क्षमा चाहते हैं कि हिन्दी दिवस पर आधारित  इस लेख में भी शीर्षक में आंग्ल भाषा का प्रयोग करना पड़ा है. ऐसा हमें तकनीकी रूप से करना पड़ता है जो हमारे पाठकों के विस्तार और लेख की पहुंच के विस्तार हेतु आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है.)

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