परख की कलम से: सिर्फ महाराणा प्रताप के लिये मानसिंह को गद्दार ठहराना उचित नही !

इतिहास को पढ़ें तो पता चलता है कि हमें अपनी कई ऐतिहासिक भूलों को सुधारने की आवश्यकता है..

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किसी जमाने मे आमेर (जयपुर) अकबर के विरुद्ध शंखनाद करने वाला सबसे पहला राज्य था, अफगानी ताकतों से भारत की रक्षा इसने की, काशी विश्वनाथ मंदिर का मूल उद्धारक भी यही परिवार है तो आखिर क्यों इन्हें एक गद्दार माना जाता है?
एक समय के लिये यदि महाराणा प्रताप वाला किस्सा भुला दे तो निष्पक्ष निष्कर्ष आसान हो सकता है। जयपुर राजपरिवार राजा कुश के वंशज है, इसलिए कछवाहा कहे जाते है। 10वी सदी में इन्होंने आमेर बसाया जो आगे चलकर जयपुर कहलाया।
1556 में अकबर बादशाह बन चुका था, आमेर के राजा भारमल एक्टिव हो चुके थे। अकबर कठपुतली था और उसका सेनापति बैरम खां हिन्दुओ पर कहर ढा रहा था उस समय राजा भारमल ने अजमेर के रास्ते पर कब्जा कर लिया और दरगाह जाने वालो को लूटना शुरू कर दिया तब जाकर हिन्दुओ के प्रति होने वाले अत्याचार थम गए।
1560 में बैरम खां को मार दिया गया और 18 साल का अकबर स्वतंत्र बादशाह बना। उस समय भी राजा भारमल ने सभी राजपूतो को मुगलो के विरुद्ध एकजुट करने का असफल प्रयास किया और जानते है उनका विरोध किसने किया??? चित्तौड़ के राणा उदयसिंह ने जो कि महाराणा प्रताप के पिता थे। राणा उदयसिंह का मानना था कि राजपूत आक्रमण के बजाय रक्षा पर जोर दे।
बहरहाल आमेर ही दिल्ली से सबसे निकट था और सबसे ज्यादा खतरा उसे ही था, अंततः राजा भारमल ने अपनी एक पारसी दासी हीरकुंवर को गोद लिया और उसे जोधा नाम दिया तथा जोधा का रिश्ता अकबर के लिये भेज दिया। जोधा अकबर का विवाह हो गया और अब जयपुर चारो ओर से सुरक्षित हो गया। कहा जाता है इसी विवाह के बाद आमेर में संपन्नता फैल गयी क्योकि अब उस पर आक्रमण करने वाला कोई नही था।
राजपूतों को एक करने का सपना देखने वाला राज्य दुर्भाग्य वश अब अकबर की छत्रछाया में खुद को सुरक्षित कर चुका था। 1568 में अकबर ने चित्तौड़ को जमकर लूटा, 1574 में राणा उदयसिंह और राजा भारमल दोनो की मृत्यु हो गयी। चित्तौड़ में महाराणा प्रताप राजा बने तो आमेर में भगवंत दास।
किसी विवाह समारोह में महाराणा प्रताप ने घृणा वश राजा भगवंत दास के साथ बैठने से मना कर दिया। जिससे भगवंत दास का बेटा मानसिंह भड़क गया, यही कारण था कि जब 1576 में अकबर ने दोबारा मेवाड़ के खिलाफ बिगुल बजाया तो मानसिंह ने उसे रोक दिया और स्वयं महाराणा प्रताप से लड़ने चल दिया।
मानसिंह ने महाराणा प्रताप को हराकर कछवाहों के अपमान का बदला ले लिया। मानसिंह का गुस्सा इतना तीव्र था कि जब भी अकबर ने महाराणा प्रताप को संधि के लिये पत्र भेजे तब तब मानसिंह ने दीवान ए खास में उसका विरोध किया। हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप ने मुगलो को कई युद्धों में हराया मगर जहाँ जहाँ आमेर की सेना थी वहाँ वे असफल रहे।
ठीक है अब आप कह सकते है कि मानसिंह गलत थे लेकिन यदि आप आमेर की जगह खुद को रखे और आंकलन करे कि आप पूरे राजपूताना में दिल्ली से सबसे नजदीक है आपकी अपनी कौम आपका विरोध कर रही है तब आप प्रजा के हित मे क्या करेंगे?
अकबर ने दीन ए इलाही धर्म शुरू किया था जिसे एक मात्र हिन्दू बीरबल ने अपनाया था। मानसिंह नही चाहते थे कि अन्य हिन्दू भी इसे अपनाए अंततः उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर को पुनः बनवाया जो कि मुहम्मद गौरी ने तोड़ दिया था। मानसिंह ने हिन्दू कलाकृतियों का बारंबार उत्थान करवाया। मानसिंह के कारण यह वो दौर था जब मुसलमान इस्लाम से दूर जाने लगे थे और हिन्दू अपने धर्म से जुड़ रहे थे।
सिर्फ महाराणा प्रताप के लिये मानसिंह को गद्दार ठहराना उचित नही होगा। बहरहाल आमेर की दास्तां यही नही रुकी अभी तो इन्हें मराठो के विरुद्ध भी कार्रवाई करनी थी। यह वंश छत्रपति शिवाजी महाराज के विरुद्ध भी बड़ा सफल रहा। यह सब अगले लेखों में वर्णित करना उचित होगा।

(परख सक्सेना)

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