वाराणसी से पीएम मोदी सांसद हैं. पीएम मोदी के खिलाफ लगातार हमले करने वाली कांग्रेस ने उनके खिलाफ बनारस से अब तक किसी भी उम्मीदवार के नाम का ऐलान नहीं किया है. प्रियंका गांधी ने एक बार फिर कहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष कहें तो मैं बनारस से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हूं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कांग्रेस अध्यक्ष फिर हां क्यों नहीं कह रहे हैं? 

कुछ दिन पहले जब राहुल गांधी से प्रियंका के बनारस से चुनाव लड़ने के बारे में सवाल किया गया था तो उन्होंने कहा था कि, ‘वो ना तो हां कर रहे हैं और ना ही मना कर रहे हैं.’ उन्होंने एक दफे ये भी कहा था कि, ‘मैं आपको सस्पेंस में ही रखना चाहूंगा और  सस्पेंस हमेशा बुरा नहीं होता है. ऐसे में अब उन अटकलों को फिर से हवा मिल गई है कि प्रियंका गांधी बनारस से पीएम मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकती हैं.’

प्रियंका ने बनारस का मिजाज़ भांपने के लिए ही प्रयागराज से बनारस की बोट यात्रा की थी. गंगा यात्रा से वो इलाके में चुनाव लड़ने की लहर पैदा कर गईं. भले ही प्रियंका अपना पहला राजनीतिक इम्तिहान चुनाव हार कर फेल कर जाएं लेकिन उनकी राजनीतिक संभावनाएं समाप्त नहीं होंगी. भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी भी एक बार तीन जगहों से चुनाव लड़े थे जिसमें एक जगह जीत और दो जगह हार नसीब हुई थी और एक में जमानत भी जब्त हुई थी. बाद में हिंदुस्तान की राजनीति ने अटल-युग भी देखा.

कांग्रेस के भीतर फिलहाल नेहरू-इंदिरा युग की वापसी को लेकर छटपटाहट है. उसके पास राजनीतिक विरासत है लेकिन वर्तमान में विजेता नहीं. विरोधियों को राहुल की राजनीति में जिद तो प्रियंका की राजनीति में प्रतिशोध की झलक दिखाई दे सकता है.

यूपी में जिस तरह से कांग्रेस के पास कुछ खोने के लिए नहीं है उसी तरह राजनीति में उतरीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के लिए भी राजनीति में फिलहाल गंवाने को कुछ भी नहीं है. यही वजह है कि यूपी की राजनीति में एक नया भूचाल लाने की कोशिश में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस बात का जल्द ऐलान कर सकते हैं कि बनारस से बहन प्रियंका पावरफुल पीएम मोदी को परास्त करने की गंगा मां की सौगंध खाएंगीं.

बनारस को लेकर सियासी हालात पूरी तरह से फिल्मी हो चुके हैं और कई दिनों से खिंचे चले आ रहे सस्पेंस पर से अब राहुल के पर्दा उठाने की बारी है. प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा भी ये इशारा कर चुके हैं कि प्रियंका गांधी चुनाव लड़ सकती हैं. सवाल सिर्फ इतना भर हो सकता है जिसको लेकर कांग्रेस के भीतर मंथन चल रहा है कि परिवार के तीन लोग चार सीटों पर चुनाव लड़ेंगे तो देशभर में चुनाव प्रचार का मैनेजमेंट व्यवहारिक तौर पर कितना मुकम्मल हो सकेगा.

बहरहाल, ये सिर्फ एक काल्पनिक सवाल हो सकता है क्योंकि वायनाड, अमेठी और रायबरेली की सीट पर कांग्रेस को उतनी मेहनत करने की जरूरत नहीं है. ऐसे में पूरा गांधी परिवार और कांग्रेस बनारस में मौजूद रह कर उसे सियासी भूचाल का एपिसेंटर बनाने का काम जरूर कर सकता है.

कांग्रेस की रणनीति के तहत अगर प्रियंका गांधी बनारस से चुनाव लड़ती हैं तो फिर उनके प्रचार के लिए बनारस में सोनिया, राहुल, और दूसरे कांग्रेसी नेताओं की मौजूदगी से पीएम मोदी पर दबाव बढ़ाने की कोशिश होगी ताकि पीएम मोदी बनारस की सीट पर ज्यादा से ज्यादा व्यस्त रहें और दूसरे राज्यों में उतना खुला प्रचार न कर सकें.

बहरहाल, वाराणसी में सियासत के कई रूप दिखेंगे. कभी बनारस के चुनाव में कांग्रेस का ‘बदला’ दिखेगा तो कभी प्रियंका के प्रचार में पति राबर्ट वॉड्रा के खिलाफ मोदी सरकार की कानूनी कार्रवाई को लेकर ‘प्रतिशोध’ भी दिखेगा. प्रियंका गांधी बनाम पीएम मोदी के चुनाव के नतीजे कुछ भी हों लेकिन इस मुकाबले के चलते पूर्वांचल की सीटों के समीकरणों में बीजेपी का गणित बिगाड़ने की कांग्रेसी कोशिश कहीं खाली ‘हाथ’ न रह जाएं.

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