Azad Hind Fauj के निर्माता सुभाष चंद्र बोस थे भारत की स्वाधीनता के महानायक

बोस हैं देश के नौजवानों के नायक जिन्होंने भारत माता को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए मातृभूमि से बाहर जा कर सेना का निर्माण किया..

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सुभाष चन्द्र बोस का नाम भारत में किसी परिचय का मोहताज नहीं है. न ही पुरानी पीढ़ी न नई पीढ़ी सुभाष से अपरिचित है. सभी जानते हैं कि उद्दाम राष्ट्रप्रेमी सुभाष ने माँ भारती की स्वतंत्रता के लिये सेना तैयार कर ली थी और दुनिया की महाशक्ति जर्मनी का हिटलर ने सुभाष बाबू से हाथ मिला कर गर्वित अनुभव किया था.

देशभक्तों के देशभक्त थे सुभाष

भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में सुभाष चंद्र बोस का योगदान अप्रतिम है. राष्ट्रवाद कहें या राष्ट्रभक्ति, सुभाष उद्धत राष्ट्रप्रेम के प्रतीक थे. उनके जैसे परम राष्ट्रप्रेमी राष्ट्र को सदा सर्वोपरि रखते हैं. राष्ट्र की स्वंत्रता उनके जीवन का ध्येय थी. रखा कम ही हुए हैं. देश के उन महानायकों में से हैं और हमेशा रहेंगे, स्वतंत्रता के संघर्ष में अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले महानायक सुभाष चंद्र बोस को महात्मा गाँधी ने देशभक्तों का देशभक्त कहा था.

खून से मिलती है आज़ादी

आज़ादी के लिए खून देना पड़ता है, हाथ जोड़ कर भीख मांगने से तो थप्पड़ ही मिलता है – इस तथ्य को सत्य सिद्ध किया सुभाष बाबू ने. उन्होंने दुनिया भर में फैले हुए देशभक्त भारतीयों का आवाहन किया और उनसे मातृभूमि को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए योगदान देने की अपील की. उनका दिया नारा सारी दुनिया में सुप्रसिद्ध हुआ – ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा!’

उड़िया थे सुभाष चंद्र बोस

सुभाष चंद्र बोस परिवार से बंगाली और घर से उड़िया थे. उनका जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था. असाधारण प्रतिभाशाली बोस ने 1918 में प्रथम श्रेणी के अंकों के साथ दर्शनशास्त्र में बीए किया. पूरा किया. 1930 के दशक में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ज्वाइन कर ली और उसके युवा, कट्टरपंथी विंग के नेता बन गए.

पिता का स्वप्न पूरा किया

सुभाष चंद्र बोस के पिता की बहुत इच्छा थी कि उनका पुत्र आईसीएस बनें. सुभाष ने अपने पिता की इच्छा को अपना ध्येय बनाया और आईसीएस बन कर उनकी इच्छा पूर्ण की. 1920 की आईसीएस परीक्षा में वे प्राविण्य सूचि में रहे और चौथा स्थान प्राप्त किया. किन्तु सुभाष को ब्रिटिशर्स कदापि पसंद नहीं थे और उनकी मातृभूमि को परतंत्र बनाने वाले अंग्रेजों के अधीन काम करना उनके लिए सम्भव नहीं था. इसलिए. एक साल के भीतर ही 1921 में उन्होंने पद से त्यागपत्र दे दिया.

फिर बनाई आजाद हिंद फौज

इस बात की कल्पना करना भी दुष्कर है जिसको सत्य कर दिखाया सुभाष बोस ने. दूसरे विश्व युद्ध के प्रारम्भ में सुभाष चंद्र बोस ने सोवियत संघ, नाजी जर्मनी और इंपीरियल जापान सहित कई देशों की यात्रा की और वहां के नेताओं से मिले. मूल रूप से सुभाष बाबू की इन यात्राओं का उद्देश्य सभी देशों के साथ आपसी गठबंधन को सशक्त करना था और साथ ही भारत में ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने की तैयारी थी. Azad Hind Fauj में  लगभग 85000 सैनिक सम्मिलित थे. सुभाष बाबू के देशभक्तों की इस फौज में एक महिला यूनिट भी थी, जिसकी कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन थी. इस फौज में बर्मा और मलाया में स्थित भारतीय भारतीय स्वयंसेवक भी आकर भर्ती हुए थे.

(अर्चना त्रिपाठी)

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