Teachers’ Agitation in UP:  शिक्षामित्रों का इंकलाब – इन्साफ बन गया ख्वाब !

0
42

 

एक तसवीर उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में आज देखी जा रही है जिसे मीडिया की कोई कवरेज नहीं मिल रही है. मीडिया की क्या देश के किसी भी समर्थ वर्ग की कोई मदद इस तसवीर को हासिल नहीं है. इस तसवीर में जिसे आपने नहीं देखा और जिसे आज आप इस लेख में देखेंगे, सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों शिक्षामित्र आज आपसे रूबरू होंगे. आप उनके चेहरों पर उनके संघर्ष की दास्तान पढ़ सकेंगे हमारे शब्दों के माध्यम से. इन्साफ की लड़ाई लड़ते हुए इन शिक्षामित्रों को समर्पित है ये एक छोटा सा लेख.

 जैसा ऊपर कहा गया, आप में से बहुतों को नहीं पता होगा कि देश के सबसे महत्वपूर्ण प्रदेश उत्तरप्रदेश में भी एक ऐसा आन्दोलन चल रहा है जो बरसों से चला आ रहा है लेकिन अब तक अपने मुकाम पर नहीं पहुंचा. हजारों हजारों लोग उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में इस आन्दोलन के जरिये इन्साफ की मांग कर रहे हैं लेकिन उनकी आवाज सत्ता के गलियारों के बाहर ही दम तोड़ देती है.

 बच्चे देश का भविष्य होते हैं और आज के बच्चे कल के हिन्दुस्तान की किस्मत लिखते हैं. इन बच्चों को जो समाज से शिक्षा मिलती है वो देश के कल की नींव रखती है. कल देश का इतिहास लिखने इन बच्चों को शिक्षा का उपहार देते हैं शिक्षक और इस तरह शैक्षिक ज्ञान के साथ देश के भावी कर्णधारों की एक पूरी पीढ़ी को तैयार हो जाती है. देश के प्रति भी अपना अमूल्य योगदान देने वालों की एक पहचान और है जिसे हम जानते हैं शिक्षामित्र के नाम से.

आइये जान लेते कि हम जिनकी बात कर रहे हैं वो कौन लोग हैं. जी हां, हम जिन शिक्षा मित्रों की कहानी बयान कर रहे हैं उसे आगे बढ़ाने से पहले हम आपको बताते हैं कि कौन होता है शिक्षा मित्र याने कि शिक्षा मित्र का अर्थ क्या होता है.

 देश के स्कूलों में टीचर्स की कमी को दूर करने के लिये 2001 में केंद्र सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान शुरू किया था. इस योजना के अनुसार सरकारी स्कूल वाले गांवों के शिक्षित नौजवानों को वहां शिक्षामित्र बना कर नियुक्त किया जाने लगा. जिन शिक्षामित्रों को कभी बीजेपी की केन्द्र सरकार ने वजूद दिया था, आज उसी बीजेपी की उत्तरप्रदेश सरकार उनकी इन्साफ की लड़ाई में उनके साथ नहीं खड़ी है. उत्तरप्रदेश में चल रहे शिक्षामित्रों के आन्दोलन को अभ्यर्थी शिक्षक आन्दोलन भी  कहा जा सकता है और प्रशिक्षु शिक्षक आन्दोलन भी जहां एक मन्च पर सभी शिक्षा मित्र अपने लिये इन्साफ की लड़ाई लड़ रहे हैं. सवाल ये है कि जो शिक्षक देश के भविष्य की नींव रखते हैं वही आज दाने-दाने को मोहताज हैं.

उत्तरप्रदेश की राजधानी में पिछले साढ़े चार सालों से आस लगा कर बैठे हैं कि शायद प्रदेश की सरकार को उन पर तरस आ जाये और उन्हें वो मिल जाये जो उनका हक है. इनकी मांग सिर्फ इतनी है कि यदि प्रदेश की एक सरकार ने उनको शिक्षक बनाया है तो दूसरी सरकार में उनकी नौकरी क्यों छीन ली गई?

ये आन्दोलन दरअसल शिक्षकों का आन्दोलन है जो जिसे बेसिक शिक्षा विभाग के अभ्यर्थियों का आंदोलन भी कहा जा सकता हैं जिसमें शामिल हैं प्रदेश के शिक्षामित्र, बीटीसी टीचर्स और बीएड टीचर्स. इन शिक्षकों की लड़ाई मूल रूप से उनकी नियुक्तियों को लेकर है. मामला है कुल एकलाख सैंतीस हजार शिक्षकों का जो कि 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने योग्यता में कमी के आधार पर इनकी नियुक्ति निरस्त कर दी थी. अदालत ने योगी सरकार को इनके एडजस्टमेन्ट का स्वैच्छिक विकल्प भी दे दिया जिसका पालन उचित ढंग से नहीं हुआ. पहले सरकार ने 2018 में बारी बारी से 68500 शिक्षकों की भर्ती औक फिर 69000 हजार शिक्षकों की भर्ती निकाली. सरकार ने कहा कि नौकरी से बाहर हुए शिक्षामित्रों के लिये इसकी परीक्षा में उत्तीर्णांक 45 प्रतिशत अंकों का रहेगा. लेकिन परीक्षा के बाद सरकार अपनी बात से पलट गई और उसने कहा कि उत्तीर्णांक 60 से 65 प्रतिशत का ही रहेगा. इस सरकारी धोखे के खिलाफ शिक्षामित्र आवाज उठा रहे हैं.

 एक बार नहीं दो दो बार शिक्षामित्रों को भर्तियों में बेवकूफ बनाया गया और उनकी अपनी नौकरी उनसे छीन लेने के बाद उन्हें नहीं दी गई. सवाल ये है कि नौकरी नहीं देनी थी तो भर्तियों का ढोंग क्यों किया, नौकरी वापस देने का वादा करके वादा खिलाफी क्यों की गई? और अगर सरकार अपने वादे से पलट गई तो वह उसके पीछे उसकी मन्शा क्या है?

 कुल एक लाख चौवन हजार शिक्षामित्र इस समय आन्दोलन कर रहे हैं जिसमें से एक लाख सैंतीस हजार के साथ नौकरी का धोखा किया गया तो बाकी सत्रह हजार शिक्षामित्रों का वेतन चालीस हजार से कम करके दस हजार कर दिया गया. ये शिक्षक अब अपने साथ हुई नाइन्साफी को लेकर पिछले चार साल से सत्ता के राजपथ पर अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन आज तक नाकाम ही रहे हैं. आन्दोलन में शामिल शिक्षकों की संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा की है यदि इनके परिवारों को भी जोड़ लें तो इस धोखाधड़ी के पीड़ितों की संख्या आठ लाख तक हो  जाती है. एक प्रदेश में आठ लाख लोग पीड़ित हों और सरकार के कान में जूं भी न रेंगे तो इसे आप क्या कहेंगे?

 अभी आपने जाना कि असली मुद्दे तीन हैं जिनमें शिक्षकों के साथ हुई वादाखिलाफी, भर्ती के दौरान नियमों का उल्लंघन और शिक्षामित्रों की सैलरी चौथाई कर देने की बात शिक्षामित्र कह रहे हैं. यहां अब ये भी बताना जरूरी हो जाता है कि क्या आरोप है इन शिक्षामित्रों का किस तरह की गड़बड़ियां हुई हैं भर्तियों में?

एक लाख सैंतीस हजार शिक्षामित्र आज यूपी में सड़कों पर उतरे हुए हैं और अपनी छीन ली गई नौकरी वापस पाने की चाह में अमावस की काली रात में भी उम्मीदों की रौशनी जलाये बैठे हैं. पीड़ित अभ्यर्थियों का आरोप है कि शिक्षक भर्ती में आरक्षण नियमों का पालन नही हुआ. अभ्यर्थियों के अनुसार भर्ती में ओबीसी वर्ग को नियमानुसार 27 फीसदी आरक्षण नही दिया गया. एससी वर्ग को भी 21 फीसदी आरक्षण न मिलने का आरोप भी अभ्यर्थियों ने लगाया है. इन आंदोलनकारियों का कहना है कि टीचरों के सेलेक्शन में आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों के अधिकारों का उल्लंघन किया गया है. 2020 में प्रकाशित शिक्षक चयन सूचि में आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आवंटित सीटें, अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को दे दी गईं थीं.

सबसे बड़ी बात इस आन्दोलन की ये है कि इसमें अब तक पांच हजार जानें जा चुकी हैं. अपने हक के लिये पिछले चार साल से चल रहे इस संघर्ष में पांच हजार लोगों ने मौत को गले लगा लिया है और इस संख्या से कहीं बहुत ज्यादा शिक्षक आज डिप्रेशन के शिकार हैं और मानसिक यंत्रणा से पैदा हुई मानसिक बीमारियां झेल रहे हैं.

जब तक सड़क पर खून नहीं बहता इंकलाब रंग नहीं लाता. मगर शिक्षकों की इस इंकलाबी जंग में अब तक पांच हजार लोगों का खून बह चुका है जो कहने को तो खून है पर सियासी लोगों के लिये पानी है क्योंकि उनके लिये इन लोगों का होना न होना ही अपनेआप में बेमानी है. ये पांच हजार लोग जो मारे जा चुके हैं इनकी बाकायदा एक सूचि तैयार की गई है जो देश के उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में लाने के लिये ही बनाई गई थी मगर लाशों के ढेर के आसपास फूल नहीं बरसते गिद्ध और सियार ही मन्डराया करते हैं. सवाल ये भी है कि क्या मौतों का ये सिलसिला थम जायेगा क्योंकि हजारों शिक्षामित्र आज बेहद निराश भी हैं और अवसादग्रस्त भी.

मांगने वाले ने मांग ली सारी दुनिया.. बस एक रोटी का सवाल है जीने के लिये! जो डूब रहा है उसके लिये एक एक सांस एक जिन्दगी से कम नहीं है. शिक्षामित्रों के वजूद की इस लड़ाई में पांच हजार लोग अब तक अपनी जान दे चुके हैं और अगर आगे भी यही आलम रहा तो न जाने कितनी जानें और जा सकती हैं. आइये देखते हैं क्या हैं मांगें इन शिक्षामित्रों की जिन्हें मानने में प्रदेश सरकार नाकाम नजर आती है.

 पांच हजार आत्महत्याओं के बाद भी इन शिक्षा मित्रों ने हार नहीं मानी है और ये जानते हुए भी कि जिन्दगी के अंधेरों में चमत्कार की रौशनी बहुत कम कौंधती हैं, ये शिक्षामित्र अपने आन्दोलन को  अंतहीन बना कर चलाये जा रहे हैं. इनकी मांग प्रदेश में मंत्री या अफसर बनने की नहीं है –इन्होंने तो बस मांगी है एक छोटे से वेतन वाली छोटी सी नौकरी जो यदि इनका हक है तो मिलना भी चाहिये.  आंदोलनकारी शिक्षामित्रों की मांग है कि अगर हिमांचल प्रदेश के संविदा कर्मी को प्रशिक्षित वेतनमान बख्शा जा सकता है तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं? आंदोलन में बलिदान हुए शिक्षामित्रों के परिवारों को अर्थिक मदद दी जानी चाहिये ताकि उनके बच्चों के मुह में रोटी का निवाला जा सके. इसी तरह कोरोना काल में ड्यूटी पर प्राण गवांये शिक्षामित्रों के परिवार को भी आर्थिक मदद मुहैया कराई जाये.

उम्मीद एक ऐसी रौशनी है जो अंधेरों में भी जगमगाती है. इन्साफ की लड़ाई लड़ रहे इन शिक्षामित्रों के पास भी यही उम्मीद की रौशनी है जो इनको रास्ता दिखा रही है. न्यूज़ इन्डिया ग्लोबल इनको शुभकामनायें देता है और उम्मीद करता है कि एक दिन इनको इनका हक जरूर मिल जायेगा.

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here