United Nations : कुछ नहीं छोड़ा मोदी ने जो कहना जरूरी था UN के मंच पर

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सबको लपेट दिया नरेंद्र मोदी ने -आतंकी सरकार अफगानिस्तान की, सरमायेदार भी आतंकी देश, फिर आतंक के लिए ही तो उपयोग होगा तालिबानी देश.
आज के UNO में दिए के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत प्रभावी ढंग से जता दिया कि लोकतंत्र क्या होता है और उससे परिणाम मिलते हैं.
पीएम मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान को ले कर वहां की तालिबानी सरकार और उसके सरमायेदारों पाकिस्तान एवं चीन को स्पष्ट संदेश दिए कि उस देश के हालात को अपने स्वार्थ के लिए भुनाने की कोशिश न करें.
चीन की दक्षिण चीन सागर में उसकी दादागिरी के प्रति भी मोदी ने साफ़ संदेश दिया और चेतावनी दी कि समुद्र का दोहन न किया जाये.
प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे बड़े आरोप तो संयुक्त राष्ट्रसंघ पर लगाये उसकी आज की प्रासंगिकता को ले कर और ऐसा करना बहुत जरूरी था.
हर विषय पर जैसे सवाल उठ रहे हैं UNO पर, उन्हें देख कर उसे अब आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है.
वैसे UNO ने अफगानिस्तान की सरकार को राष्ट्रसंघ के मंच पर बोलने से मना कर दिया है लेकिन ये उम्मीद करना बेमानी होगा कि अफगानिस्तान की धरती का उपयोग दूसरे देशों पर आतंकी हमलों के लिए नहीं होगा.
पाकिस्तान और चीन तो खुल कर धमकी दे रहे हैं कि यदि वैश्विक स्तर पर तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी गई तो 9/11 से भी बड़े आतंकी हमले हो सकते हैं.
ये बात कल भी इमरान खान ने कही है लेकिन तालिबान ने उसे खुद को एक कठपुतली कह दिया और ये भी कह दिया कि आप हमारी सरकार में दखल न दें.
चीन और पाकिस्तान, दोनों मुल्क कहने को तालिबान सरकार को समझा रहे हैं कि विश्व के देशो से मित्रता करो पर धमकी का मतलब ये ही है कि विश्व नहीं माना तो तालिबान की अमेरिका पर आतंकी हमले करने में मदद करेंगे.
मेरा एक अनुमान है जो गलत भी हो सकता है कि तालिबान ने देख लिया है अमेरिका वर्षों तक इराक में हमले करके बैठा रहा और अफगानिस्तान में 20 वर्ष बैठा रहा लादेन की तलाश के बहाने मगर पाकिस्तान अमेरिका से पैसा ले कर मौज करता रहा.
इसलिए अबकी बार तालिबान यदि अमेरिका पर आतंकी हमला करने की कोशिश करेगा तो वो उसके लिए पाकिस्तान के आतंकियों को आगे करेगा जिससे अमेरिका के क्रोध का प्रकोप फिर पाकिस्तान झेले -और अमेरिका की तालिबान इस काम में मदद करेगा.
ये अंतर्राष्ट्रीय राजनीति है, इसमें कोई किसी का स्थाई मित्र शत्रु नहीं होता.

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