‘वैदिक’-विचार : कानून में अंग्रेजी की गुलामी

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भारत के मुख्य न्यायाधीश नथालपति वेंकट रमन ने कल वह बात कह दी, जो कभी डाॅ. राममनोहर लोहिया कहा करते थे। जो बात न्यायमूर्ति रमन ने कही है, मेरी स्मृति में ऐसी बात आज तक भारत के किसी न्यायाधीश ने नहीं कही।
रमनजी ने एक स्मारक भाषण देते हुए बोला कि भारत की न्याय व्यवस्था को औपनिवेशिक और विदेशी शिकंजे से मुक्त किया जाना चाहिए। यह शिकंजा क्या है? यह शिकंजा है- अंग्रेजी की गुलामी का! हमारे देश को आजाद हुए 74 साल हो गए लेकिन आज तक देश में एक भी कानून हिंदी या किसी भारतीय भाषा में नहीं बना। हमारी संसद हो या विधानसभाएं- सर्वत्र कानून अंग्रेजी में बनते हैं।
अंग्रेजी में जो कानून बनते हैं, उन्हें हमारे सांसद और विधायक ही नहीं समझ पाते तो आम जनता उन्हें कैसे समझेगी? हम यह मानकर चलते हैं कि हमारी संसद में बैठकर सांसद और मंत्री कानून बनाते हैं लेकिन असलियत क्या है ? इन कानूनों के असली पिता तो नौकरशाह होते हैं, जो इन्हें लिखकर तैयार करते हैं।
इन कानूनों को समझने और समझाने का काम हमारे वकील और जज करते हैं। इनके हाथ में जाकर कानून जादू-टोना बन जाता है। अदालत में वादी और प्रतिवादी बगलें झांकते हैं और वकीलों और जजों की गटर-पटर चलती रहती है। किसी मुजरिम को फांसी हो जाती है और उसे पता ही नहीं चलता है कि वकीलों ने उसके पक्ष या विपक्ष में क्या तर्क दिए हैं और न्यायाधीश के फैसले का आधार क्या है।
इसी बात पर न्यायमूर्ति रमन ने जोर दिया है। इस न्याय-प्रक्रिया में वादी और प्रतिवादी की जमकर ठगी होती है और न्याय-प्रक्रिया में बड़ी देरी हो जाती है। कई मामले 20-20, 30-30 साल तक अदालतों में लटके रहते हैं। न्याय के नाम पर अन्याय होता रहता है।
इस दिमागी गुलामी का नशा इतना गहरा हो जाता है कि भारत के मामलों को तय करने के लिए वकील और जज लोग अमेरिका और इंग्लैंड के अदालती उदाहरण पेश करने लगते हैं। अंग्रेजी के शब्द-जाल में फंसकर ये मुकदमे इतने लंबे खिंच जाते हैं कि देश में इस समय लगभग चार करोड़ मुकदमे बरसों से अधर में लटके हुए हैं। न्याय के नाम पर चल रही इस अन्यायी व्यवस्था को आखिर कौन बदलेगा?
यह काम वकीलों और जजों के बस का नहीं है। यह तो नेताओं को करना पड़ेगा लेकिन हमारे नेताओं की हालत हमारे जजों और वकीलों से भी बदतर है। हमारे नेता, सभी पार्टियों के, या तो अधपढ़ (अनपढ़ नहीं) हैं या हीनता ग्रंथि से ग्रस्त हैं। उनके पास न तो मौलिक दृष्टि है और न ही साहस कि वे गुलामी की इस व्यवस्था में कोई मौलिक परिवर्तन कर सकें।
हाँ, यदि कुछ नौकरशाह चाहें तो उन्हें और देश को इस गुलामी से वे जरुर मुक्त करवा सकते हैं।

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