Woman: नारी ही नारी की शत्रु क्यूँ है?

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नारी शक्ति स्वरूपा और पूजनीय है. व्यक्ति समाज की इकाई है और समाज लोगों से बनता है जिसमें स्त्री-पुरूष सभी सम्मिलित हैं. इतिहास ग़वाह है कि नारी को शक्ति का रूप माना गया है. नारी दुर्गा, काली और सरस्वती स्वरूप में पूजनीय रही है.

मुगलों की संस्कृति है नारी का शोषण 

मुग़लकाल से नारी-शोषण की शुरूआत हुई. फलस्वरूप तब से अब तक उसकी अस्मिता पूर्ण रूप से सुरक्षित नही है जिसके जि़म्मेदार पुरूष वर्ग के कुछ कुत्सित मानसिकता वाले लोग हैं. एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है ठीक ऐसे ही कुछ बुरी प्रवृति के लोगों के कारण ऊँगली पूरे पुरूष वर्ग पर उठाई जाती है जो न्यायसंगत नही. यही कारण है कि समाज की हमदर्दी पूरी तरह से महिलाओं के साथ रही है. इस प्रकार की निम्न स्तर मानसिकता के चलते आज के दौर में महिलाएँ भले ही शिक्षित व आधुनिक हो गई हैं पर उनका अस्तित्व पूर्ण रूप से सुरक्षित नही.

स्वयं के विकास में बाधा उत्पन्न करती नारी

आज नारी भले ही पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं पर कुछ बंधन अब भी सिर्फ स्त्रियों पर ही लागू होते हैं अब भी पुरुषों पर नही. ये तो हुई बात नारी अस्तित्व की जिस पर समाज के कुछ लालची ठेकेदारों ने अपनी गंदी नजरें गड़ा रखी है. पर मैं आपको ये बताना चाहती हूँ कि नारी भी नारी की शत्रु हो सकती है. मर्दों पर तो हम दोषारोपण कर देते हैं परन्तु महिलाएँ स्वयं भी अपनी उन्नति, स्वतंत्रता और विकास के मार्ग में रोड़ा है. आपको आश्चर्य हो रहा होगा परन्तु ये सत्य है.

शिक्षित होना ब्रॉड माइन्डेड होने का सर्टिफिकेट नहीं

जहाँ एक ओर होल्कर वंश की अहिल्या बाई ने नारियों के मानसिक और बौद्धिक विकास तथा आत्म निर्भरता के लिये शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया ताकि वे शिक्षित होने के साथ निर्भीक और स्वाभिमान के साथ जी सकें. समय के साथ बदलाव आया और आज की नारी शिक्षित ,आत्म निर्भर ,आधुनिक और स्वतंत्र तो हो गई पर विचारों की शुद्धता पर जो अंकुश लगा रखा है उस परत को हटाना भूल गई.
एक तरफ तो वह अपने सम्मान, अधिकार,सेल्फ डिपेंडेंसी और आज़ादी की बात करती है तो दूसरी ओर वह सिर्फ एकाधिकार, एकाधिपत्य जैसे स्वार्थ पूर्ण विचारों का परित्याग नही कर पाई है.

अल्प विकसित मानसिकता व स्पर्धा

कोई आपसे बेहतर कैसे हो सकता है यह सोच ही उसकी स्वार्थी और पिछड़ी मानसिकता को भी दर्शाती है. मनोविज्ञान द्वारा इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि प्रत्येक मानव चाहे वह स्त्री हो या पुरूष में इर्ष्या, राग-द्वेष, स्पर्धा जैसी मूल प्रवृतियाँ पाई जाती हैं. परन्तु यह भी सिद्ध हो चुका है कि इर्ष्या का भाव नारी स्वभाव में सर्वाधिक पाया जाता है. वैसे पुरुषों में भी ये जलन भावना विद्यमान होती है परन्तु पठन-पाठन तथा जीविका चलाने हेतु कार्यों में संलग्न पुरूष इस पर इतना सोच नही पाता क्योंकि समय का अभाव उसे ऐसा करने नही देता .यही वजह है उसे घर की स्त्रियों के आपसी मतभेदों की जानकारी नही होती या होती भी है तो वह ऐसी निरर्थक बातों को महत्व नही देते जो सही भी है. वहीं नारी चाहे वर्किंग हो या गृहणी इनमें सदैव अपनी गुणवता को लेकर अभिमान और अपनी ही महिला मित्र को लेकर उसकी गुणवता को न स्वीकारना(inferiority complex), निन्दा का व्यवहार अक्सर देखा जाता है. अपनी ही सहेली या सहकर्मी की प्रशंसा न सुन पाना, उसकी उन्नति ,रूप,प्रतिभा और पहनावे से जलन होना सर्वथा अनुचित है.
तभी प्रसिद्ध मनोवैज्ञनिक फ्रायड ने दावा किया है कि, “विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षण तथा समान जाति के प्रति द्वेष ही मानव का स्वभाव है।”
प्राय: यह भी देखा गया है कि पिता को पुत्री से तथा माता को पुत्र से अधिक स्नेह होता है.
नारी कई रिश्तों में नारी के साथ हर क्षण होती है चाहे वह रिश्ता माँ-बेटी का हों, सास-बहू का, देवरानी-जेठानी, बहनें या फिर सहेलियों का हों. इन सभी रिश्तों में आपसी मतभेद होने के कई कारण हो सकते हैं, कुत्सित विचार, अल्प विकसित मानसिकता,उचित शिक्षा का अभावऔर सामाजिक मान्यताएँ जो “आग में घी” डालने का कार्य करती हैं.

द्वेष का ज़िम्मेदार भेदभाव भी

माँ के रूप में पुत्र-पुत्री में पक्षपात की भावना रखना . बाल्यावस्था से ही बेटे को अपेक्षाकृत बेहतर सुवधिाएँ व स्वतंत्रता देना तथा बेटियों को उनके अधिकारों को नियंत्रण में रखना. एक कारण यह भी है कि इतने बंधन और दुर्व्यवहार के चलते उसका मौन अंदर ही अंदर क्रोध में परिवर्तित हो जाता है और फिर जब अवसर मिलता है उसका वह रोष प्रकट हो जाता है. वह स्वयं नारी हो कर नारी की शत्रु बन जाती है कभी सास के साथ बहू के रूप में, भाभी के साथ ननद, बहनें हों या फिर महिला सहकर्मियों के बीच ये स्पर्धा प्रारंभ हो जाती है.

संकीर्ण सोच

नारी स्वयं अपने ही क्षेत्र की नारियों से किस प्रकार बौद्धिक स्तर पर तुलनात्मक हो गई है जो उसके ईर्ष्यालु प्रवृति को दर्शाता है. एक ही वातावरण और व्यवसायिक प्रकृति में रह कर किस कदर प्रतिस्पर्धा कर रही है वो अशोभनीय तो है ही संकीर्ण भाव की ओर भी इशारा करता है.
“अपनी ही सहकर्मी या मित्र के अच्छे कार्य प्रदर्शन की प्रशंसा न कर उससे इर्ष्या भाव रखना तथा स्वयं की प्रगति हेतु अपने प्रयास को अभ्यास से बेहतर करने के स्थान पर अपनी महिला सहयोगी या मित्र के लिये अनैतिक व निम्न स्तर के विचार व्यक्त कर उसके चरित्र पर लांछन लगाना यह दिखाता है कि वह स्वयं एक महिला हो कर दूसरी महिला का सम्मान नही रख पाती. यह कहाँ तक उचित है?इसीलिये महिलाओं के लिये कुछ उपमाएँ प्रचलित भी हैं जैसे “गॉसिप क्वीन” , “बुद्धि घुटने में” , “पेट में बात न पचना” जिसे महिलाओं को अच्छे व्यवहार से ग़लत सिद्ध करना चाहिए ना कि इन कथनों को वे और सही साबित करें.

गलत धारणाएँ व कल्पना खतरनाक होते हैं

किसी के विषय में गलत धारणाएँ बना कर उसे नमक-मिर्च लगाकर परोसना उसके ईर्ष्यालु स्वभाव को इंगित करता है. क्या ये उचित है कि एक नारी दूसरी नारी की बात न समझ कर उसे आधारहीन तथ्यों पर जलील करे, उसका अपमान करे, बुरी बातें कहे ताकि उसका चरित्र तार-तार हो जाये. करूणा और स्नेह की प्रतिमूर्ति कहलाने वाली नारी का वास्तविक स्वरूप इतना डरावना नही हो सकता.
आए दिन खबरों में अब भी बहू को प्रताड़ना,वृद्ध सास-ससुर को घर से निकाल देना, बेटी को ब्याह कर उसे मुसीबत समझ कर पीछा छुड़ाना, आफिस, व व्यवसाय में अपनी महिला सहकर्मी से जलन व द्वेष भाव रखना, उसकी सफलता को सकारात्मक भाव के साथ न अपनाना, राह में रोड़े अटकाना क्या ग़लत और अन्याय नही?

बुरे चरित्रों का अनुसरण क्यूँ

क्या इस प्रकार एक स्त्री भी दूसरी स्त्री के सम्मान, अधिकार और अस्मिता का हनन नही करती?
क्या वो रावण से कम अपराधी है? दु:शासन से कम दुस्साहस नही उसका? रामायण और महाभारत में अच्छे चरित्रों का अकाल नही है. फिर ऐसे चरित्रों का अनुसरण कर उनका प्रभाव क्यूँ फैलाना?
किसी दूसरी महिला के चरित्र पर ऊँगली उठा कर झूठी अफवाह उड़ाना क्या उचित है? निराधार बातों को तूल देकर किसी के अस्तित्व पर सवाल उठाना बहुत सरल है पर क्या किसी का खोया सम्मान आपकी एक माफी से वापस लौट पायेगा? यह विचारणीय है जिसके बारे में महिलाएँ अक्सर नही सोचतेी. ये सिद्ध करने का प्रयास यहाँ नही किया जा रहा कि हर स्त्री ऐसी होती है परन्तु प्रतिशतन होती है जिसे आप या हम नकार भी नही सकते. यही कारण है कि नारी भी नारी की शत्रु हो सकती है यदि वह स्वयं महत्वाकांक्षी अत्यधिक हो और दूसरों की तरक्की से जलन की भावना रखती हो.

सबका साथ सबका विकास मूलमंत्र

“सिर्फ शिक्षित और आधुनिक होना आपके सुंदर व्यक्तित्व का सर्टिफिकेट या गारंटी नही हो सकती ”
आवश्यकता है बौद्धिक और मॉडर्न होने के साथ-साथ खुले व स्वतंत्रत विचारों की जो सभी को समान भाव से देखे और सहयोग भी दे. “सबका साथ सबका विकास” जैसे मूलमंत्र को अपना कर चले तो सारी समस्याओं का अंत निश्चित ही हो जायेगा

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