इज़राइल का वजूद : खाड़ी में चुनौती

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वर्तमान इजराइल की स्थापना के बाद से आज तक इजराइल का अस्तित्व के लिए संघर्ष का इतिहास विजय का इतिहास है..

पाँच-पाँच शक्ति सम्पन्न इस्लामिक राज्यों से एक नवजात राष्ट्र के बेमेल युद्ध का इतिहास है इज़राइल के अस्तित्व का इतिहास. एक सुबह में तीन-तीन देशों की वायुसेना को समूल नष्ट कर के छह दिनों के अंदर अपने क्षेत्रफल से चार गुनी बड़ी जमीन पर अधिकार कर लेने के अप्रतिम शौर्य का इतिहास. अपने खिलाड़ियों की हत्या का बदला लेने के लिए दुनिया के कोने कोने में छुपे दुश्मनों को घर में घुस के मारने की कहानियाँ. यहूदी जाति की अदम्य जिजीविषा की गाथा…

इजराइल के सैन्य कौशल और शौर्य की कहानियाँ हम सब जानते हैं. पर सैन्य पटल से परे भी इजराइल के चरित्र का लौह-तत्व दिखाई देता है, उनकी सिविलियन जिंदगी में.

एक किसान अपनी पूरी फसल नहीं खा जाता…थोड़ा सा जरूर वह अगली फसल की बीज के लिए बचा लेता है. जब इजराइल अपनी अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा था, 1948 में…तब दुनिया में किसी को उम्मीद नहीं थी कि इजराइल इस संघर्ष से जीवित निकल पायेगा. तब इस्राएलियों ने सबसे पहले अपने बच्चों को बचाने का फैसला किया. हर परिवार में से माता-पिता में से एक को बच्चों के साथ पीछे सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया गया और दूसरा सामने मोर्चे पर रह गया. अक्सर माताएँ बच्चों के साथ गईं, और पिता फौज के साथ रुक गया. पर कुछ माताएँ जो अधिक सक्षम समझी गईं, उन्होंने अपने पतियों को बच्चों की सुरक्षा के लिए छोड़ कर खुद मोर्चा संभाला.

जैसे एक मधुमक्खी अपने छत्ते से अलग अपने लिए एक स्वतंत्र और स्वकेन्द्रित जीवन की कल्पना नहीं कर सकती, वैसे ही एक इसरायली के जीवन में समाज और देश के लिए ही जीने का, आत्मोत्सर्ग का भाव प्रबल है. और युद्ध के समय यह भाव स्वतः ही आ जाता है, पर इजराइल की जनजीवन में अपेक्षाकृत शांतिकाल में भी यही भाव प्रमुख होता है. और इस भाव की अभिव्यक्ति होती है, इसरायली कीबुत्ज़ में.

कीबुत्ज़ एक तरह के कम्यून हैं, जिनमें अनेक परिवार एक साथ एक सामूहिक जीवन बिताते हैं…हर कोई अपनी क्षमता और कौशल के अनुरूप कार्य करता है और अपनी आवश्यकता के अनुरूप पाता है. उसी में से कोई श्रमिक, कोई कारीगर, कोई शिक्षक, कोई डॉक्टर होता है. सबके बच्चे भी एक साथ पलते हैं. अक्सर, कौन सा बच्चा किसका है, इसका विभेद भी नहीं होता. उत्पादन की दृष्टि से भी ये स्वावलंबी हैं. ये कीबुत्ज़ फार्म चलाते हैं, कारखाने भी चलाते हैं. इजराइल की कुल प्राकृतिक और जनसम्पदा का दस प्रतिशत से भी कम प्रयोग करके भी ये कीबुत्ज़ वहाँ की कुल कृषि उत्पादन का 80% और औद्योगिक उत्पादन का 50% पैदा करते हैं. ये वहाँ की अर्थव्यवस्था की ही नहीं, सामाजिक व्यवस्था की भी रीढ़ हैं.

शांतिकाल में एक असैनिक जनसंख्या के लिए अनुशासन और समर्पण की ऐसी मिसाल कहीं नहीं मिलती. हम इजराइल की सैन्य गाथा से चमत्कृत होते हैं, पर मेरी दृष्टि में यह उपलब्धि उनकी सैन्य उप्लब्धियों पर भारी पड़ती है. बल्कि यह कहें, इजराइल की सैन्य संस्कृति के मूल में उनकी यह समाज व्यवस्था ही है. इजराइल सामरिक दृष्टि से इसलिए सशक्त है, क्योंकि सामाजिक दृष्टि से भी सबल है. उनमें सामुहिकता की भावना प्रबल है. वे ऐसा समाज हैं, इसलिए ऐसी फौज हैं.

पर 1948 के पहले यहूदियों का पिछले 2000 सालों का इतिहास उनके पराजय और पराभव का ही इतिहास रहा है. अपनी जमीन हार कर, अपना देश छोड़ कर ये यहूदी अपनी रोजी रोटी, अपने व्यवसाय में ही व्यस्त थे. ये अपना परिवार चला रहे थे, अपना बिज़नेस चला रहे थे, बैंकों और फैक्टरियों के मालिक थे…यहूदियों को पैसे के अलावा और कुछ देखने की आदत नहीं थी. उनकी जो भी उप्लब्धियाँ थीं, आत्मकेंद्रित थीं. जिस देश में भी रहे, उस समाज से जुड़ कर, समर्पित होकर नहीं रहे. पूरा विश्व उन्हें परजीवी के ही रूप में देखता था. जहाँ भी रहे, यहूदियों ने पैसा अथाह कमाया…पर घृणा उससे ज्यादा कमाई.

और एक दिन यह संचित अर्जित घृणा उनके अस्तित्व पर संकट बन कर आई. स्पील्बर्ग की फ़िल्म “श्चिण्डलर्स लिस्ट” के अंत में जब अमेरिकी सैनिक ऑस्कर श्चिण्डलर के कैम्प से यहूदियों को आजाद करते हैं तो सार्जेंट उन्हें बोलता है…You all are free to go…But where will you go? You can’t go to east…They hate you there. If I were you, I won’t go to west either…

तो जब इस्राएलियों के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बची, तो वे जेरुशलम की तरफ मुड़े. अब इजराइल और इजराइल का सपना ही उनका अपना था. उनका अपना देश उनकी आंखों में, उनके दिल में ही बसा था. उस देश को अपने दिल से उतार कर जमीन पर बसाने के लिए खून की कीमत एक छोटी कीमत थी. पर यहूदियों ने जो सबक हिटलर के साये में, कंसंट्रेशन कैम्प्स में, गैस चैंबरों में सीखा…वह हम चाहें तो इजराइल के इतिहास से भी सीख सकते हैं.

(राजीव मिश्र)

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