लेबनान की दासतान सिखाती है बहुत कुछ

0
274

70 के दशक में लेबनान अरब का एक ऐसा मुल्क था । जिसे अरब का स्वर्ग कहा जाता था । और इसकी राजधानी बेरूत को अरब का पेरिस। लेबनान एक प्रगतिशील, सहनशील एवं बहु-सांस्कृितिक समाज था, बिलकुल वैसे ही जैसे भारत है।

लेबनान में दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटीज़ थीं । जहाँ पूरे अरब से बच्चे पढ़ने आते थे । और फिर वहीं रह जाते थे, काम करते थे, मेहनत करते थे। लेबनान की बैंकिंग दुनिया की श्रेष्ठ बैंकिंग व्यवस्थाओं में शुमार थी। तेल न होने के बावजूद लेबनान एक शानदार आर्थिक शक्ति संपन्न राष्ट्र था।

लेबनान का समाज कैसा था ।  इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है ।  कि 60 के दशक में बहुचर्चित हिंदी फिल्म *An Evening in Paris* दरअसल Paris में नहीं बल्कि लेबनान में shoot की गई थी।

60 के दशक के उत्तरार्ध में वहाँ जेहादी ताकतों ने सिर उठाना शुरू किया। 70 में जब जॉर्डन में अशांति हुई , तो लेबनान ने फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए दरवाज़े खोल दिए. उनसे कहा -आइये, स्वागत है! 1980 आते-आते लेबनान की ठीक वही हालत हो गयी जो आज सीरिया की है।

लेबनान की क्रिश्चियन आबादी को शरणार्थी बनकर घुसे जिहादियों ने ठीक उसी तरह मारा जैसे सीरिया के ISIS ने मारा। पूरे के पूरे शहर में पूरी क्रिश्चियन आबादी को क़त्ल कर दिया गया। देश और दुनिया से उनको कोई बचाने कोई नहीं आया।

किसी समाज का एक छोटा-सा हिस्सा भी उन्मादी जिहादी हो जाए । तो फिर शेष शांतिप्रिय समाज का कोई महत्त्व नहीं रहता। वो असंबद्ध हो जाते हैं। लेबनान की कहानी ज़्यादा पुरानी नहीं सिर्फ 25-30 साल पुरानी है।

लेबनान के इतिहास से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है। और कोई सीखे न सीखे भारत को लेबनान के इतिहास से सीखने की ज़रूरत है। *रोहिंग्याओं, बाँग्लादेशी घुसपैठियों* और *सीमान्त प्रदेशों* में पल रहे जेहादियों से सतर्क रहने की ज़रूरत है।

देश को ऐसी ताकतों के विरूद्ध एकजुट होना होगा जो जेहादियों की समर्थक हैं और उनको समर्थन दे रही  पार्टियों, संस्थाओ औऱ इनसे जुड़े लोगों का बहिष्कार करना होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here