जितना ऐतिहासिक है उतना ही खतरनाक भी ये Israel और Palestine का युद्ध

भारत-पाकिस्तान के बीच की जंग तो दुनिया के लिये कभी इतनी डरावनी नहीं बनी जितनी इज़राइल और फिलीस्तीन के बीच की जंग बन रही है..

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हिस्ट्री रिपीट्स इटसेल्फ..इतिहास अपने आप को दोहराता है| मध्यपूर्व में लगातार ऐसा देखा जा रहा है।
विश्व के भौगोलिक धरातल पर इस मुहावरे की बहुत सी मिसालें मिलती हैं. कई देश ऐसे हैं जहाँ आपसी भिड़ंत का कारण कभी राजनीतिक मुद्दे तो कभी धार्मिक विवाद ,गुटबाजी, सत्ता लालसा, और कभी किसी देश की अर्थ-व्यवस्था का पतन भी इसकी वजह रहा है| कुछ नाम आसानी से गिनाये जा सकते हैं, यथा – सीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, लीबिया, यूक्रेन, इराक, नाइजीरीया और अब इज़रायल और फिलीस्तीन का युद्ध| जो अभी दुनिया के लिये एक चिंता का विषय बना हुआ है|
इस महामारी के दौर में इस जंग ने मानव हृदय में डर और चिंता पैदा कर दी है|
क्या आवश्यक था अभी इस नाज़ुक वक्त में प्रतिरोध करना? उसे युद्ध का रूप देना| जबकि पूरा संसार अभी कोरोना नामक एक वैश्विक महामारी से जूझ रहा है| हर हृदय भय और अनहोनी के एहसास से जूझ रहा है| जीवन-यापन के लिये धनार्जन की चिंता अभी घर-घर की कहानी है| उस पर प्राकृतिक आपदाएँ प्रलय मचा रही हैं| ये क्या कम है?उस पर इज़रायल और फिलिस्तीन वासियों के बीच युद्ध छिड़ जाना अतिश्योक्ति है| पर ये सब किछ अक्स्मात ही नही हुआ| इसके पीछे बहुत पुराना इतिहास छुपा है|
ये जानने के लिये कि अभी की परिस्थितियों में ऐसा क्यूँ हुआ- चलिये, हम इसके अतीत में चलते हैं|
एशिया के पश्चिमी छोर पर बसा एक छोटा-सा देश है फिलिस्तीन| यह पाँच शहरों का एक सुंदर समूह है-गाज़ा, एस्केलॉन, ऐशडोड, गाथ और एक्रॉन| करीबन तीन हज़ार वर्ष पहले फिलिस्तिया पर फिलिस्ताइन्स का कंट्रोल था| फिलिस्ताइन शायद वहाँ शरणार्थी थे|  इसलिये अपने अस्तित्व को कायम रखने की उनकी ज़द्दोज़हद ने संघर्ष का रूप ले लिया| प्राचीन सोर्सेज़ में कुछ युद्धों का ज़िक्र भी है|
आपने एक मुहावरा सुना होगा-“डेविड वर्सेज़ गोलायथ”| इस मुहावरे का मूल भी संघर्ष ही है|
एक बार फिलिस्ताइन और इज़रायलियों के बीच युद्ध छिड़ गया| फिलिस्ताइन्स का नेतृत्व गोलायथ और इज़रायलियों का नेतृत्व डेविड कर रहे थे| डेविड ने गुलेल की मदद से गोलीयथ को मार दिया और आगे चलकर “किंग ऑफ इज़रायल” बन बैठा|
यही शुरूआत थी युद्ध,हिंसा और संघर्ष की| फिलिस्तीन पर कई समूहों का शासन रहा| जो समय के साथ बदलते रहे असीरियनिस,बेबिलोनियन्स,पर्शियन्स,ग्रीक,रोमनिस,अरब,इज़िप्टियन्स और प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात अंग्रेजों का फिलिस्तीन पर एकाधिपत्य शासन प्रारम्भ हुआ| सन् 1922 में मित्र देशों ने भी फिलिस्तीनी भू-भाग पर यहूदी देश की स्थापना की ब्रिटिश वायदे को मंज़ूरी दे दी| इसके बाद बड़ी संख्या में यहूदी इमिग्रेंट्स फिलिस्तीन आने लगे|
सन् 1882 में फिलिस्तीन के भीतर एक बड़ा यहूदी इलाका बसा ‘रिशोन ले ज़ियोन’| बस इसके बाद से ही यहूदी फिलिस्तीनी भू-भाग पर अपना देश बनाने के लिये अपना समर्थन जुटाने लगे| इस पर फिलिस्तीनियों का विरोध करना स्वाभाविक था| ज़ाहिर है हिंसा बढ़ी| येेरूशलम स्थित टेम्पल माउंट पर कब्ज़ा करने की यहूदी तैयारियाँ करने लगे| इस अफवाह के चलते हेब्रॉन शहर में 60 से ज़्यादा यहूदियों को कत्ल कर दिया गया|
तनाव और हिंसा का दौर जारी रहा| सन् 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने एक रेजॉल्यूशन नंबर 181 का प्रस्ताव रखा| जिसमें फिलिस्तीन के बँटवारे की बात थी| फिलिस्तीन ने इसे ठुकरा दिया|
फिलिस्तीनी के प्रतिरोध को दबाने के लिये यहूदी संगठनों की हिंसा भी बढ़ती गई|
तो इज़रायल और फिलिस्तीन का इतिहास ऐसी ही हिंसाओं से भरा पड़ा है| जो इज़रायल के गठन से पहले से ही जारी है| इज़रायल के बनने के बाद भी ये हिंसा बदस्तूर जारी है,बल्कि ये आक्रोश और भी बढ़ता गया,उग्र होता गया और इसी उग्रता का अगला अध्याय बना आतंकी संगठन “हमास” जिसने सीमा पार इजराइल में खूनखराबा करने आतंकी गतिविधियाँ चलाने का जिम्मा लिया |
हमास का पूरा नाम है “हरकत अल-मुकावमा अल-इस्लामिया” अथार्त “इस्लामिक रिज़िस्टन्स मूवमेंट”| रिज़िस्टन्स का अर्थ है प्रतिरोध यानि फाईट बैक करना| अरबी में हमास का मतलब “उत्साह” होता है|
हमास का गठन मुस्लिम ब्रदरहुड वाले फिलिस्तीनी ब्रांच के मौलाना शेख अहमद यास्मीन ने सन् 1987 में किया था| ये फिलिस्तीनी सुन्नी मुसलमानों की एक सशस्त्र संस्था है जो राष्ट्रीय प्राधिकरण की मुख्य पार्टी है| इसी वर्ष फिलिस्तीन में शुरू हुआ ‘इंतिफादा’| ये अरबी भाषा का ही एक शब्द है जिसका अर्थ है झकझोरना…हिला देना|
इस इंतिफादा मूवमेंट का मकसद ही था इज़रायल से आज़ादी हासिल करना और वेस्ट बैंक,गाज़ा,पूर्वी जेरूसलम को इज़रायली कब्ज़े से मुक्त करवाना और इज़रायल के क्षेत्र में इस्लामिक राज्य स्थापित करना| इस तथ्य की पुष्टि इज़रायल और फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन ने 1988 में की थी|
अंतराराष्ट्रीय पक्षों ने इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच विवाद सुलझाने का भरसक प्रयास किया| सन् 1993 में एक ‘ओस्लो एग्रीमेंट’ भी बना | जिस पर इज़रायल के प्रधानमंत्री यितज़ाक राबिन और फिलिस्तीनी लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन के लीडर अराफात PLO ने हस्ताक्षर किये| परन्तु फिलिस्तीन के समूचे भू-भाग को स्वतंत्र कराने की माँग का जोश धीरे-धीरे मद्धिम पड़ता गया और PLO को समझ आ गया कि इज़रायल को समूचा बाहर निकाल पाना मुमकिन नहीं| इस एग्रीमेंट के समझौते के पाँच महीने पश्चात हमास ने अपना पहला ‘सुसाइड अटैक’ किया| ये पहले इंतिफादा की शुरूआत थी|  जिससे आगे चलकर हमास की एक अलग पहचान बनी और वह फिलिस्तीनी रेजिस्टेंस का सबसे बड़ा चेहरा बन गया|
सन् 1994 में गाज़ा और वेस्ट बैंक के अडमिनिस्ट्रेशन के लिये PA यानि फिलिस्तीनियन ऑथोरिटि का गठन हुआ| हमास के आत्मघाती हमले दिन ब दिन बढ़ने लगे| कभी बस,कभी कार और बाज़ारों मेंं सुसाईड अटैक होने लगे|
हमास का वजूद और भी ज़्यादा मजबूत हुआ नई सदी में और वह सेकेंड इंतिफादा में पहले से कहीं ज़्यादा हिंसक हो गया| क्यूँकि इस सेकेंड इंतिफादा का लीडर था हमास| उसने जमकर सुसाईड धमाके और बम ब्लास्ट किये| प्रति उत्तर में इज़रायल भी क्यूँ पीछे रहता| दोनों पक्षों ने एक -दूसरे की नाग़रिक आबादी को निशाना बनाया|
2006 में PA की सीटों के लिये चुनाव हुए और अराफात के निधन तथा उनकी जगह नये चेहरे महमूद अब्बास (PA) के ले लेने से हमास को बहुमत मिल गया|
अब हमास को इज़रायल विरोधी देशों से फनडिंग भी मिलने लगी|
जिसे हमास हथियार खरीदने और मिसाईल जमा करने में लगाता था| फिलिस्तीन की आधी आबादी भीषण गरीबी में थी पर वह उनके विकास में एक फूटी कौड़ी तक खर्च नहीं करता था|
इधर इज़रायल भी फनडिंग से भ्रष्ट हुए PA के साथ मिलकर हमास पर दबाव डालने लगा और हमले करने लगा|
कुल मिलाकर दोनों ही अपने-अपने जन-धन का भारी नुकसान करने में लगे थे|
अमेरिका को अफगानिस्तान से निकलना था तो तालिबान को साथ में बिठाकर वार्ता की| उसके साथ डील की| इसी तरह फिलिस्तीन का हल निकालना है तो हमास को भी वार्ता की मेज़ पर लाना होगा| मई 2017 में हमास ने एक डॉक्यूमेंट भी जारी किया था जिसमें उसने समझौते की बात की थी| परिस्थिति की गंभीरता को समझ कर समझौते की सोचना बुद्धिमानी है मगर बात नही बनी|
अब इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच खूनी संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है जिसकी कीमत भोले और मासूम लोग चुका रहे हैं| जहाँ दुनिया शांति की अपील कर रही है ये दोनों देश एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं|
हाल ही में जहाँ इज़रायली सेना ने गाज़ा पट्टी इलाकों में हवाई हमले किये जबकि फिलिस्तीनी संगठन हमास ने इज़रायली इलाकों में रॉकेट दागे| सैकड़ों लोगों की जानें चली गई| युद्ध के हालात बन गये|
इज़रायल ने सीमाओं पर सैन्य तैनाती बढ़ा दी तथा रिज़र्व में रहने वाले पाँच हज़ार सैनिकों को रक्षा मंत्री बैनी गेजेंट्स ने तत्काल तैनाती का आदेश दिया| हालात बहुत ही गंभीर हो गये थे|
इस संघर्ष की शुरूआत तब हुई जब इज़रायल के एक नेशनलिस्ट यहूदी ने एक मार्च निकालने का फैसला लिया| ये मार्च सन्1967 में इज़रायल द्वारा येरूशलम के कई हिस्सों पर कब्ज़ा जमाने की खुशी में निकाला जाना था| जो अभी तक भी इज़रायल के कब्ज़े में ही है| परिणामस्वरूप मार्च से ही हिंसा शुरू हो गई| खबर के अनुसार येरूशलम की पवित्र मस्जिद ‘अल-अक्सा’ मस्जिद के बाहर फिलस्तिनीयों ने पवित्र दीवार के पास लो़गों और जवानों पर पत्थरबाज़ियाँ की| इज़रायली सुरक्षाबलों ने रबर बुलेट का इस्तेमाल किया| इज़रायली सुरक्षाबलों के साथ फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों की काफी देर तक झड़प होती रही|
फिलिस्तीन प्रदर्शनकारियों के अनुसार ‘रमज़ान’ के पवित्र महीने में मस्जिद की दीवारों पर ‘स्टन ग्रेनेड’ भी दागे गये| ये मस्जिद येरूशलम में मुस्लिमों की तीसरी सबसे पवित्र मस्जिद है और यहूदियों का टेम्पल माउंट भी यही करीब है| इस वजह से दोनों संप्रदाय इस जगह पर अपना-अपना दावा करते हैं|
कुछ सूत्रों के अनुसार के अनुसार पूर्वी येरूशलम के शेखज़र्राह से फिलिस्तीनी परिवारों को हटाने की योजना सामने आने से तनाव और भी बढ़ गया और फिलस्तीनीयों तथा यहूदी सुरक्षाबलों के बीच झड़पें शुरू हो गई|
इसी बीच चरमपंथी हमास ने इस बहाने की आड़ में येरूशलम पर कई रॉकेट दाग दिये| जवाब में इज़रायल के प्रधानमंत्री नित न्याहू ने भी कहा कि इजरायल इसका मुँह तोड़ जवाब देगा और इज़रायल ने भी हमास के ठिकानों गाज़ा पर हमले किये हैं| ये हमले दोनों ओर से अब भी जारी हैं|
कई इस्लामिक देशों ने एकजुट होकर इज़रायल के खिलाफ मार्च निकाले और शांति की अपील की है | वहीं संयुक्त राष्ट्र सु़रक्षा परिषद और अमेरिका ने भी पूर्वी येरूशलम पर हुए हमले की परिचर्चा की है| अभी तक कोई बयान जारी नही हुआ है परन्तु इज़रायल से संयम बरतने की विनती की गई है| इज़रायल एक कर्मठ और स्वाभिमानी,स्वनिर्मित देश है| इसलिये उसे किसी का भय नही| पर साहसी और अभिमानी होने में ज़मीन-आसमान का अंतर है| भाईचारे की नीति को इज़रायल अपनी ऊँची-ऊँची महत्वकाँक्षाओं के नीचे दबा रहा है…कुचल रहा है…रौंद रहा है| उधर हमास भी अपने स्वाधिकारों के लिये लड़ते-लड़ते आतंक और ग़लत गतिविधियों पर उतर आया है| दोनों की आँखों पर हठ की पट्टी चढ़ी है|
हमास और इज़रायल में जो ये जंग छिड़ गई है| दोनों ही हमला कर रहे हैं| जान और माल का नुकसान दोनों तरफ हो रहा है| परन्तु गाज़ा को इज़रायल के मुकाबले ज़्यादा नुकसान हो रहा है| हर तरफ लाशों के ढेर बिछ रहे हैं| मानवता फूट-फूट कर आँसू बहा रही है| ऐसा तो नही है कि हमास को हमला करने से पहले इस बात का आभास नहीं हुआ होगा कि परिणाम क्या होगा?एक तरफ बाहरी चुनौतियाँ दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग किए जाने के चलते हमास के कंट्रोल वाला गाज़ा भी अब बुरी स्थिति में है|
इस समस्या का क्या हल है?
जहाँ हमास ने 2017 में समझौते के लिये स्वयं को टोन डाउन किया था| वहीं इज़रायल को भी चाहिये कि वो फिलस्तीनी इलाके खाली करे,अवैध यहूदी सेटलमेंट्स पर अपने पैर पीछे खींचे| ये दर्शाना बंद करना होगा कि वो अंतरराष्ट्रीय कानूनों और जवाबदेही से परे है| जे यूनिवर्सली सत्य है उसे मान लेना ही अक्लमंदी है| सिर्फ जोश ही काफी नही होता| विवेक इस्तेमाल करना भी आवश्यक है| जो नही किया गया|
फिलिस्तीन को भी हिंसा और हमले न करने की गारंटी और आश्वासन देना ही होगा| वर्ना हिंसा का ये दौर चलता ही रहेगा|  कत्लेआम होते रहेगें,मासूमों की बलि चढ़ती ही रहेगी|  मौत का नंगा नाच अपने भयावह रूप में क्या इसी तरह चलता रहेगा?

(अंजू डोकानिया)

 

2 COMMENTS

  1. Sabse aham mudda ye hai Ki Kya ye yudh sirf Israel aur Philippines Ke bich hi simit jayega? Kahi aisa na ho Ki ye yudh vikral roop le le.

  2. वाह, आज का तड़कता भड़कता मुद्दा, सच ही है नुकसान जान माल का ज़्यादा होता है और इस प्रकार के युद्ध से देश पिछड़ता भी बहुत है।पीछे हटना कोई नहीं चाहता इसलिए इनसे उम्मीद क्या करें।सर्वहित सुखाय सब भूल गये हैं

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