China Vs Japan: क्या कारण है जानी दुश्मनी का चीन-जापान के बीच?

अतीत भविष्य का जन्मदाता होता है..और जब दो देशों का इतिहास ही रक्तरंजित हो तो भावी संबन्धों में शांति का अस्तित्व कल्पना ही हो सकती है, वास्तविकता नहीं..

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चीन और जापान  की शत्रुता वर्षों से चली आ रही है. इस शत्रुता के पीछे खूनी इतिहास है.  वर्ष 1937  में चीन के नानजिंग शहर पर जापानी  सैनानियों ने हमला बोल दिया. इस जंग में जापानी सैनिकों ने लूट-पाट के अतिरिक्त ,हत्या  और महिलाओं का बलात्कार किया.  युद्ध 1937 के दिसंबर से 1938 मार्च माह तक चलता रहा.

जापान ने किया था नानजिंग नरसंहार 

उस वक्त के इतिहासकारों और संगठनों के अनुसार  लगभग अढ़ाई  से तीन लाख की संख्या में नरसंहार हुआ जिसने महिलाओं और बच्चों की संख्या  अधिक थी.  बड़ी निर्दयता से जापानी  सैनिकों  ने चीनी महिलाओं और बच्चों को मौत के घाट  उतारा.  इस क्रूरता  को शब्दों  में बयाँ  कर पाना मुश्किल  है.  सब कुछ इतना निर्मम और भयावह  था कि चीन के शिक्षण-संस्थानों  में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों  में इस बर्बरता  का पूरा कच्चा-चिट्ठा है जो चीन के हर नाग़रिक  के ये भूलना नही देता कि उनके भूतकाल की ऐतिहासिक  ज़मीन  निर्दोष लोगों  के खून से रंगी हुई है.
हालांकि जापान इस बात को नकारता रहा है कि उसने इतना बड़ा नरसंहार  किया चीन में.  चीन ने एक संग्रहालय  भी इसी नरसंहार को ध्यान में रखते हुए बनवाया ताकि चीनी प्रवासियों के ज़ेहन में यह दर्दनाक  घटना ताज़ा रहे. जबकि जुलाई 1982 साल में जापान के शिक्षा मंत्री ने एक टेक्स्ट बुक प्रकाशित  करनाई जिसमें दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान की छवि को अच्छा  रखने का प्रयास  किया गया.

भीषण नरसंहार पाठ्य-पुस्तकों में शामिल

चीन ने इतने भयावह नरसंहार को पाठ्य-क्रम में इसलिये शामिल  किया ताकि वर्तमान जन समुदाय और आने वाली पीढ़ियाँ ये जानें कि उनके देश ने कितना बड़ा दुख झेला है. चीन की कट्टरवादिता का अंदाज़ा  इसी से लगा  सकते हैं कि  वह अपने देशवासियों को वर्ष 1839 के पूर्व अफ़ीम युद्ध से दूसरे विश्व युद्ध तक सहे जुल्मों का स्मरण कराता रहा है. चीन  उस अपमान की आग को अब भी  भूला नही है जो जापान और पश्चिम के उपनिवेशवादियों ने उसके हृदय में लगाई थी.

दोनो देशों की कट्टर दुश्मनी है बड़ी पुरानी 

नब्बे साल पहले हुई इस दुश्मनी  की शुरुआत. वो साल था 1931 जब जापान ने चीन के मंचूरिया पर  बारूदी हमले किए. जापानी सेना चीनी सैनिकों  पर भारी पड़ी.  वे उनका मुकाबला  न कर सके. इधर जापान  एक-एक सभी चीनी इलाकों  पर घेराबंदी  करता रहा और उधर चीन राष्ट्रवाद  को मुख्य  लक्ष्य  बना कम्यूनिज़्म  और राष्ट्रवादी  गृह-युद्ध में उलझ कर रह गया.
वैसे चीन को राष्ट्रवादिता के लिए प्रेरित और जागरूक  करने में द्वितीय विश्वयुद्ध की भी अहम भूमिका रही है. जानकारी  के मुताबिक 1949 से 1976 के मध्य जब माओ का दौर था तब नानज़िंग  हत्या-काण्ड के प्रति उदासीनता  दिखी. इसी कारणवश  चीन में कम्युनिस्टों और राष्ट्रवादियों के बीच गृहयुद्ध का आगाज़  हुआ.
राष्ट्रवादी  नेता च्यां-काई  शेक ने नानजिंग  को राजधानी  बनाने की सूचना  जारी कर दी परिणामस्वरूप वर्ष 1931 में जापान  ने मंचूरिया  पर अपने जीत का परचम  फहरा दिया. दोनो राष्ट्रों के बीच इस शत्रुता  की कहानी वर्ष 1937 में भी चलती  रही जिसने इतने समय  में रौद्र  रूप ले लिया और नानज़िंग  में लाशों के ढेर  लग गए. द्वितीय  विश्व युद्ध  के पश्चात ही इस पर विराम लगा.

चीन का कट्टरवादी कम्यूनिज़्म

नानजिंग में जो नरसंहार हुआ और लाखों लोग मारे गए  उन्हें श्रद्धांजलि देने  के लिए  उनकी याद में चीन ने 2014 साल से हर वर्ष 13 दिसंबर को छुट्टी रखने का ऐलान किया. चीन ने जापान को यह संदेश भी दिया की वह  इस अमानवीय कृत्य (नानज़िंग  नरसंहार) के लिये माफी माँगे शिंज़ो आबे का नानजिंग स्मृति भवन में आकर माफी माँगना बनता है . परन्तु जापान ने ऐसा नही किया.  UNESCO ने जब नानजिंग नरसंहार से संबंधित डॉक्यूमेंट्स को रिकॉर्ड  की तरह  रखने  की बात कही  तो तिनक  कर जापान ने इस निर्णय  पर भी आपत्ति जताई  और UNESCO को फंड देने  से  इन्कार कर दिया.

नागरिकों  के बीच सकारात्मक सोच का पुल नही

यही वजह है कि जापान और चीन  इन दोनों देशों के नागरिकों के बीच एक-दूसरे को लेकर कोई विशेष   सकारात्मक  सोच नही.  जापानी नागरिक जहाँ 11 फीसदी वहीं चीनी नागरिक 14 फीसदी ही एक-दूसरे के समर्थन में हैं. बता दें कि चीन और जापान के बीच समस्या राजनीतिक ही नही नागरिक  व भौगोलिक  स्तर पर भी है.  दो छोटे द्वीपों को लेकर भी दोनों में तनातनी है. सेनकाकु द्वीप (जापान)  और दूसरा द्वीप दिओयु (चीन) है. इन दोनों द्वीपों  के विवाद  के चलते जापान और चीन ने अपनी जलसेनाओं  का  कड़ा पहरा कर दिया है. दोनों देश किसी भी मुद्दे  पर जब आते हैं तो एक-दूसरे के इतिहास  की ऐसी की तैसी  कर डालते हैं.

संबंध बेहतर करने की पहल नहीं

ऐसा भी नही है कि इन दोनों देशों के कर्णधारों ने आपस में संबंध सुधारने की पहल नही की. साल 1972 में जापानी प्रधानमंत्री काकुई तानका चीन गए थे तब उनकी ये कोशिश रही थी कि कड़वी यादें भुलाकर चीन से मधुर संबंध बनाए जाए.इधर चीन के महा नायक माओ ने भी दिल खोलकर जापानी प्रधानमंत्री तानका का स्वागत किया. माओ का यह भी मानना था कि यदि जापान चीन पर लगातार धावा नही बोलता तो चीन में कम्युनिस्ट क्रांति का आ पाना मुमकिन नही हो पाता.

रूस और चीन हैं जापान के शत्रु

चीन में आज भी कम्युनिस्ट पार्टी का ही राज है. हाल ही में चीन ने “चीनी पीपल्स वॉर” की 76वीं वर्षगाँठ मनाई और ये सुनिश्चित किया की वह एक स्वतंत्र कम्यूनिस्ट देश है. जो परतंत्रता के सदा से विरूद्ध रहा है. लगातार जापान का आघात झेल रहे हैं चीन और रूस . जहाँ ईस्ट चाइना सी को लेकर दोनों देशों के मध्य विवाद जारी है वहीं साउथ चाइना सी पर भी ताइवान, अमरीका और मलेशिया जापान के साथ हैं.

भारत के चीन – जापान से संबन्ध

भारत का भी चीन  के साथ 36 का आँकड़ा  है वही जापान से रिश्तों में  बेहतरी  भी है. इसीलिए ड्रैगन चिढ़ा हुआ है और समय-समय पर फुँफकारता रहता है .  जापान ने भारत को हर संभव सहयोग देने का वादा किया है.  जहाँ उत्तर कोरिया  और जापान की आपस में नही बनती वही उत्तर कोरिया और चीन के मध्य मधुर संबंध है. जहाँ भारत और जापान  परम  मित्र  हैं वहीं चीन के जापान और भारत  से रिश्ते मज़बूत  नही.

 

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