फागुन का मौसम और होली की यादें

सोशल मीडिया पर होली की याद चली तो ऐसी चली कि आपके सामने आ गई..

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फागुन आते ही बाल ,युवा, वृद्ध सभी के मन पर फगुनाहट छा जाती है। मन होली की तरंग में मलंग हुआ जाता है।मुहल्ले के चौराहों पर सजी होलिका के बीच किसी के घर की चिक झलक मार रही है तो किसी के घर का बेंत का मूढा मुस्कुराकर कह रहा है,”बचा न पाए हमें,उड़ाने वाले ले उड़े “। जिसकी चीज़ गई वो भी एक बारगी दांत पीसकर कर मुस्कुरा देता है,”जाओ छोड़ा तुम्हें” (उन्हें भी पता है इस जुगाड़ू गैंग में उनके छुट्टन भी शामिल थे)।
होली की टोलियों में उड़ते गुलाल के बीच नाचते,गाते युवा,छत की दीवार से उझकते बड़के भैया जो पड़ोसिन कुसुमा को रंगने के मंसूबे बांधे बैठे हैं,चटपटी भाभी जी की बौछार से बचते हुए उन्हें रंगने की तमन्ना लिए चाचाजी गुम से होते जारहे हैं।महानगरीय संस्कृति के निश्चित परिधि में बंधे  फ्लैटों में न तो बड़े आंगन है न खुली छतें जहां बड़े-बड़े टबों में रंग का पूरा लिफ़ाफ़ा उड़ेल दिया जाता था।
‘टच मी नॉट ‘की संस्कृति में सोसायटी के प्रांगण में फिल्मी कलाकारों की तरह  युवा वृन्द बड़ी नफ़ासत से हल्का सा टीका लगवा लेते हैं।होली जीवित है तो मुहल्लों में,छोटे शहरों ,कस्बों में,जहां आज भी गुझिया, पापड़  के थाल सजते हैं,शिव आसव से गले तर होते हैं और चुलबुली सालियाँ, सलहजें जीजाजी को रंगने की तिकड़म में लगी रहती हैं। इन्हीं यादों के बीच याद आती है एक घटना।
बात उन दिनों की है जब हम मीरा बाई मार्ग पर रहते थे।हमारे घर के सामने एक नया परिवार आकर बसा था,जिसमें हर उम्र की कन्याएं थीं।हमारे घर पर भी चाचा, भाई,फुफेरे भाई काफ़ी लोग थे ।होली आने से पहले ही उसकी लंबी चौड़ी तैयारियां शुरू हो जातीं।सामने वाले परिवार की कन्याएं हमारे यहां आकर होली खेलने को काफ़ी उत्सुक थीं उधर चाचा, भाई वग़ैरह भी उन लोगों को रंगने के मंसूबे बांधे हुए थे।
इस चक्कर में दो टोलियां घर के लड़कों के बिना निकल गईं थीं पर बरसाने की गोपियाँ गोकुल तक आ ही नहीं पा रहीं थीं।टब में घुला रंग एक दूसरे को रंगने में ही व्यर्थ हुआ जा रहा था।अचानक देखा दूर से राधा अपनी बहनों के साथ हाथ में पक्का रंग दबाए दबे पांव आरही है।हमारा घर थोड़ा ऊंचाई पर था जिसकी एक बाहरी दीवार से लटक कर रंग डाला जा सकता था।उन लोगों को देखते ही जल्दी-जल्दी रंग की ढुंढाई मची पर कुछ खोजने से भी नहीं मिल रहा था।
चाचा ने आव देखा न ताव  चैलपार्क इंक की बड़ी बोतल उठा ली और दीवार से लटक कर नीचे से आती बड़ी बहन को स्याही से रंग दिया।जब तक वो सँभलती बोतल खाली हो चुकी थी। पर उनकी नाराज़गी भी तो देखिए,”ये कोई बात नहीं होती,ज़रा सामने तो आइए, हम भी आपको अच्छी तरह रंगें ।” हँसी के फव्वारों के बीच तब तक सारी मंडली को रंग से सराबोर कर दिया गया था।
इसके साथ ही होली का एक और किस्सा याद आता है।बृज क्षेत्र में होली का उत्साह देखते ही बनता है।हम लोग तब आगरा में थे।आगरा की बाह तहसील के पास ही हमारा पैतृक गांव हैं।जहां से एक विशेष बर्फी जिसे ‘माजूम’कहते थे आई थी।इसमें भांग मिली रहती थी पर उसका स्वाद इतना बढिया होता था कि खाए बिना रहा नहीं जाता था। अम्माँ ने हम लोगों से कहा कि एक टुकड़ा भले ही ले लो,ज़्यादा मत खाना”। पर दिल है कि मानता ही नहीं।इधर -उधर से आकर दो चार खा लीं। होली के बाद नहाने के बाद सोचा ख़ाली बैठे हैं ,बहन के इम्तिहान में जो मेज़पोश रखना है उसे काढ़ लेते हैं।
उस दिन ऐसा जोश चढ़ा कि आनन-फ़ानन में आधा मेज़पोश काढ़ लिया अचानक लगा कि अरे हमने तो हरी पत्तियों की जगह नीली पत्तियां बना डालीं।ग़लती का प्रतिकार करना ही था।तुरंत कैंची से उधेड़ा और अच्छी तरह परख कर हरा धागा लिया और फिर जुट गए।ऐसा जुझारू रवैया तो परीक्षा में भी नहीं दिखता था। दो घण्टे के अनथक परिश्रम के बाद काम खत्म हुआ। दूसरे दिन सोचा बड़े जोश से कहेंगे ,देखो हमने 4 माजूम खाईं फिर भी कुछ नहीं हुआ और पूरा मेज़पोश भी एक दिन में काढ़ डाला।
सुबह उठते ही मेज़पोश उठाया पर ये क्या? पूरे मेज़पोश पर नीली पत्तियों का जाल हमें जीभ बिरा रहा था और हम अम्माँ की नज़र बचा कर उधेड़ा-उधेड़ी में लगे थे।  दूर रखे डिब्बे में से माजूम उझकते हुए पूछ रही थी,”एक और चलेगी”? उन दिनों के साथ कॉलेज के वो दिन याद आते हैं जब होली आते ही पूरा परिसर रंग-बिरंगे पैम्फलेट से भर जाता था। नज़र पड़ते ही लोग पर्चे को लेकर कॉमन रूम में भागते कहीं उनका टाइटिल तो नहीं निकला?कुछ पढ़कर खुश होते कुछ के चेहरे भी उतरते,”अरे हमें इस लायक़ भी नहीं समझा?”
हमारी एक सहपाठी पर्चे उठाने में बहुत जल्दी करती।एक दिन उसने पैम्फलेट उठाए और तेज़ी से कॉमन रूम की ओर चल दी।हम लोगों का क्लास था।क्लास के बाद जब कॉमन रूम में पहुंचे तो देखा वो आंसू भरे शून्य में ताक रही है।सबने पूछा क्या हो गया,किसी ने  कुछ ग़लत टाइटिल दे दिया ? बहुत पूछने पर बोली “तुम लोग नहीं समझोगे ,क्या मैं इतनी बुरी हूँ कि कोई नोटिस ही न करे ।इन 8 पन्नों में कहीं मेरा नाम नहीं है। शिकायत तो वाजिब है। प्लान बनाया गया कि एक लड़की अपने भाई से कह कर उसके नाम को भी नोटिस करवा दे।
तारीफ़ की बात ये है कि इन टाइटिल में कभी कोई कटूक्ति,सस्ती फब्ती नहीं होती थी,बड़ा चुटीला व्यंग या मज़ाक ही होता था। लग रहा है माजूम फिर रंग दिखा रही है।यादों के पिटारे से  बहुत से मज़ेदार किस्से झांक रहे हैं।कहीं ऐसा न हो आज भी जोश में बहुत  ज़्यादा लिख जाएं। इस होली में जब दूरी ही मज़बूरी बन गई है ,आप सभी को दूर से ही होली का अबीर-गुलाल,स्नेहपूर्ण अभिनंदन और ढेर सारी शुभकामनाएं! आपके जीवन में ये रंग यूँ ही बरसते रहें!

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