Nepal में प्रधानमन्त्री Oli की कुर्सी डोली

नेपाल में सरकार के विसर्जन की प्रारंभि तो छः माह पूर्व 20 दिसंबर 2020 से ही हो गई थी, अब आया है समय विपक्ष की राजनीतिक पूर्णाहुति का..

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प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली की सिफारिश पर राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने संसद भंग करने और 30.मई तथा 10 अप्रैल को नए आम चुनाव करने की घोषणा कर दी|इस प्रकार संसद भंग करने के निर्णय से राजनीतिक संकट तभी से शुरू हो गया|एनसीपी के प्रमुख प्रचंड की अगुवाई में बड़ी संख्या में लोग विरोध में उतरे|
फरवरी 2021 में प्रधानमंत्री ओली को फिर से सदन बहाल करने का आदेश दिया गया| राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने संसद के निचले सदन को भंग कर नवंबर माह में 12 और 19 नवंबर को दोबारा चुनाव करने की घोषणा जारी कर दी|
पर कहते हैं ना खुद की जेब फटी हो तो सिक्के उछलकर बाहर निकल ही आते हैं| दरअसल प्रधानमंत्री ओली की अपनी ही पार्टी में विरोधी गतिविधियों के चलते वे विश्वास मत हार गये|उनके अपने ही लोगों ने उन्हें बहुमत हासिल करने में सहयोग नही दिया|उनके विरोध में 124 और पक्ष में 93 वोट ही पड़े|जबकि बहुमत साबित करने के लिये 136 सांसदों के समर्थन की ज़रूरत होती है|
ओली ने दावा किया था कि उनके पास 149 सांसदों का समर्थन है और वही नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर ‘देउवा’ के पास 153 सांसदों का समर्थन है ऐसा कहा जा रहा था|जो कुल मिलाकर 302 की संख्या होती है, जबकि संसद में सांसदों की संख्या 257 ही है| है ना मज़े की बात|
राजनैतिक संकट के बादल मंडराते देख राष्ट्रपति विद्या देवी ने संसद भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी प्रधानमंत्री ओली को संसद की 257 सीटों में से 121 सीटें प्राप्त हैं|उनकी सत्तारूढ़ पार्टी सीपीएन-यूएमएल नेपाल संसद की सबसे बड़ी पार्टी है|
के पी ओली को बहुमत सिद्ध करने के लिये 30 दिनों का समय दिया गया है|गौरतलब है कि नेपाल की चीन के साथ बढ़ती अंतरंगता और भारत के प्रति उदासीनता से जनता प्रसन्न नही है|भारत के हृदय में अब भी नेपाल के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर है|वो उसे अपना जिगरी पड़ोसी मित्र मानता है|भाारत की जंग चीन से है जो नेपाल को अपने फायदे के लिये बरगला रहा है|
खैर मध्यावघि चुनाव नवंबर में होने हैं|विपक्षी दलों में जनता समाजवादी पार्टी,नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-माओवादी केंद्र(प्रमुख प्रचंड) सराकार को बहुमत देने के पक्ष में नही दिख रही|जिसके पीछे उनकी असंवैधानिक राजनीतिक निर्णयों से असंतुष्टता और रोष है|अब इन छ: महीनों में देश को सुचारू रूप से चलाने हेतु किसकी अस्थायी सरकार बनेगी ये भी एक प्रश्नचिन्ह है|सीपीएन पार्टी के माओवादी केंद्र के अध्यक्ष प्रचंड और नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर ‘देउवा’ विपक्षी दलों के समर्थन से अपनी सरकार बनाने के प्रयास में हैं और संसद भंग होने के विरोध में भी|
हाल ही के समाचार सूत्रों से यह पता लगा है कि शेर बहादुर देउवा ने काठमांडू बूढ़ा नीलकण्ठ मेँ विशेष पदाधिकारियों के साथ मीटिंग बुलाई|जिसमें केंद्र सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के विषय पर चर्चा हुई कि ऐसे महामारी ‘कोरोना’ के दौर में मध्यावधि चुनाव करना संक्रमण को और बढ़ाने का खुला निमंत्रण देना होगा|
ऐसे में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली क्या अपनी सत्ता बरकरार रख पायेगें?जबकि मैकियावेली के सिद्धांत पर अमल करने वाले चीनी समर्थक खड्ग प्रसाद ओली के तीन वर्ष का प्रधानमंत्री काल का विगत 21 मई को तब अचानक अंत हो गया जब राष्ट्रपति ने संसद भंग कर आगामी मध्यावधि चुनाव कराने का एेलान कर दिया|
जनता में भी धीमें शब्दों में सुगबुगाहट है कि वे सरकार के इन असंवैधानिक निर्णयों से खुश नही| आम जनता में ये चाहना भी पल रही है कि पहले की तरह राजतंत्र आ जाये जैसा कि राजा वीरेन्द्र के समय में था|जब चहुं ओर शांति का साम्राज्य था| बहरहाल नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव ही मुख्य मुद्दा है अभी|

-्अंजू डोकानिया (काठमांडू ब्यूरो प्रमुख, न्यूज़ इन्डिया ग्लोबल)

2 COMMENTS

  1. बधाई की पात्र हो अंजू पत्रकारिता में भी कोई जवाब नही , आशा है भविष्य में भी सुंदर आलेख पढ़ने को मिलेंगे

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