परख की कलम से: क्या अब टकरायेंगे भारत और Israel के हित?

इजरायल में जो सत्ता परिवर्तन हुआ वो स्वार्थी नेताओ की करामात है। जब स्वार्थ देशभक्ति से ऊपर हो जाता है तो यही होता है..

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समय आ गया है जब भारत और इजरायल का एक बड़ा हित टकराने वाला है।
इजरायल में जो सत्ता परिवर्तन हुआ वो स्वार्थी नेताओ की करामात है। जब स्वार्थ देशभक्ति से ऊपर हो जाता है तो यही होता है। दरसल इजरायल में पहले वोटिंग होती है जिस पार्टी को जितना प्रतिशत मिलता है उतने प्रतिशत सीट उस पार्टी को दी जाती है।
इस कारण इजरायल में कभी कोई पार्टी बहुमत में नही आ पाती। नेतन्याहू की पार्टी सबसे बड़ी है जिसे मात्र 30 सीटे मिली थी जबकि बहुमत का आंकड़ा 61 है। बहरहाल अब सत्ता परिवर्तन हो चुका है, नफ़्ताली प्रधानमंत्री है और नेतन्याहू से भी कट्टर यहूदी है।
नफ़्ताली पहले सेना में थे 1999 में लेबनॉन में हुए नरसंहार में उनका भी हाथ था। बड़ी बात यह है कि इतने बड़े दक्षिणपंथी को वहाँ की एक मुस्लिम पार्टी का समर्थन मिला हुआ है। सोच कर देखे की योगी को ओवैसी समर्थन दे तो?
खैर, भारत का हित इसमे है कि अमेरिका और ईरान के संबंध सुधर जाए। यदि अमेरिका ने ईरान से प्रतिबंध हटा दिए तो तेल की कीमतों में भयानक गिरावट आएगी। हो सकता है कीमते क्रेश कर जाए, इसका सीधा असर सोने पर पड़ेगा और वह बहुत सस्ता हो जाएगा।
यह तो भारत का हित हुआ मगर इजरायल कभी नही चाहेगा कि अमेरिका और ईरान में शांति स्थापित हो, क्योकि ईरान का एक ही दुश्मन है इजरायल। जिस दिन प्रतिबंध हटा संभव है ईरान फिर से परमाणु बम की टेस्टिंग शुरू कर दे और इजरायल पर संकट मंडरा जाए।
यहाँ ईरान की बात करे तो इनकी हालत कुछ ऐसी है कि 60% आबादी के पास खाने को कुछ नही है। ईरान में खुलकर पत्रकारिता नही हो सकती इसलिए आंकड़े सामने नही आ रहे है। जो ब्रेड का पैकेट भारत मे 25 रुपये का है वो अब ईरान के कई इलाकों में 500 क्रॉस कर चुका है।
मगर ईरान ने ठान रखी है बर्बाद हो जाएगा लेकिन परमाणु बम तो बनाकर ही मानेगा।
ज्ञातव्य हो नफ़्ताली को एक इस्लामिक संगठन का समर्थन है हो सकता है वे अमेरिका, फ्रांस या भारत के विरुद्ध बयान दे।
जब ऐसा होगा तो कांग्रेस और मुसलमान बड़े खुश होंगे और मोदीजी की विदेश नीति पर तंज कसेंगे। उस समय हिंदूवादियों की परिपक्वता और मानसिक विकास ही इस देश को परिभाषित करेगी।
यदि इसके बाद भी हम मोदीजी पर उंगली उठाते है तो यकीन मानिए हम 1192, 1526 और 1818 के ही लायक है।
इस समस्या का एक ही उपाय है हिंदूवादी भौगोलिक राजनीति को समझे ताकि किसी का ब्रेनवाश ना हो सके।
इसके अतिरिक्त आज पेशवा बालाजी बाजीराव की पुण्यतिथि है। ये वही पेशवा है जिनके शासन में 500 वर्षो से इस्लामिक जंजीरो में कैद पांडवो की नगरी दिल्ली को मुक्ति मिल गयी थी और लाल किले पर मराठो ने हिन्दू स्वराज्य का भगवा फहराया था।
महान पेशवा को पुण्यतिथि पर शत शत नमन। उनके विषय मे जानकारी मेरे टेलीग्राम चैनल पर इस पोस्ट के नीचे मिल जाएगी।
(परख सक्सेना)

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