पूछता है देश : अब आगे तालीबानी आग में कौन-कौन झुलसेगा?

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अफगानिस्तान में जो हो रहा है, वो आज नहीं तो कल होना ही था – 20 वर्ष में अफगान सेना निकम्मी साबित हुई – अब आगे तालिबान की आग में कौन कौन झुलसेगा, समय बताएगा.
अमेरिका ने 9 / 11 के हमले के बाद 7 अक्टूबर, 2001 से अफ़ग़ानिस्तान पर हमले शुरू किये और धीरे धीरे तालिबान को खदेड़ दिया गया.
पाकिस्तान उस समय भी तालिबान के साथ था और आज भी है मगर अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने पाकिस्तान की तालिबान से लड़ने के लिए मदद ली जिसके बदले में पाकिस्तान उसे निचोड़ता रहा.
अमेरिका से पैसा ले कर पाकिस्तान या तो भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ाता रहा या हक्कानी नेटवर्क और तालिबान को मजबूत करता रहा -और बिन लादेन को अपने मुल्क में छुपाये भी रहा.
फरवरी, 2020 में डोनाल्ड ट्रम्प ने एक समझौता तालिबान के साथ किया जो जल्दी ही फेल भी हो गया मगर उसी में अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से मई, 2021 तक वापसी की समय सीमा तय कर दी गई थी जो अगस्त 2021 तक बढ़ गई.
लेकिन अमरीकी फौजो की वापसी शुरू होने पर तालिबान ने अपना काम शुरू कर दिया अफगानिस्तान पर कब्जे का जो अब पूरा हो गया है.
20 साल से अफगानिस्तान की जिस फ़ौज को अमेरिका ने उत्तम दर्जे के हथियार दिए, ट्रेनिंग दी, वो फ़ौज  निकम्मी साबित हुई जो तालिबान के सामने घुटने टेकती गई.
और कुछ दिनों में तालिबानी सरकार का गठन हो जायेगा अफगानिस्तान में और संभवतः भारत द्वारा किया गया निर्माण भी ध्वस्त कर दिया जायेगा.
तालिबान की आग में कौन कौन लपेटे में आएगा, ये समय बताएगा लेकिन एक चेतावनी मैं पाकिस्तान को देनी जरूरी समझता हूँ कि आज वो जिस तालिबान के साथ खड़ा है, कल को उसी तालिबान के साथ मिलकर पाकिस्तान के आतंकी गुट लश्करे तैयबा, जैश ए मुहम्मद, अल कायदा, हक्कानी नेटवर्क और हरकत-उल-मुजाहिद्दीन कहीं उसी पर (पाकिस्तान) कब्ज़ा ना कर लें जैसे अभी अफगानिस्तान में किया है.
अफगानिस्तान के लोगों को सीरिया की तरह अबकी बार यूरोपियन देश शरण न दें –उन्हें शरण देने के लिए इस्लामिक देशों को आगे आना चाहिए.
संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों को तालिबानी सरकार से दूरी बना कर रखनी चाहिए और कोई देश उनकी सरकार को मान्यता ना दे.
चीन ने तालिबान को मदद दी है शायद वो इसलिए कि तालिबानी चीन में नहीं घुसेंगे उइघुर लोगों के क्षेत्र में उनकी मदद के लिए, मगर इस सम्भावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता.

 

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