प्रिया और मंदार -एक प्रेम कहानी

मेरा दिल धड़कन रहा है ज़ोरों से और ये हम कहा,  आ गए हैं जहाँ बस रुक्मिणी और तुम्हारी पसंद के फूल खिले हैं?

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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
यह गीता श्लोक ध्वनि-तरंगों सा मंदार के कानों में गूँज रहा था लगातार. उसे स्वयं ये भ्रम था कि वह जागा है या सोया.  पलकें इतनी बोझिल व भारी थी कि चाहकर भी मन्दार आँखें खोल नहीं पा रहा था.  उसका हृदय छटपटा रहा था परन्तु तेज़ श्वाँसों की आवाजाही के इतर उसके वश में कुछ भी नहीं था.
गूँज रहा था वही श्लोक वायुमंडल में ” नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ……..
तभी उसे कुछ आभास हुआ….. एक धुँधली-सी आकृति श्वेत वस्त्र धारण किये हुए…. वह समझ रहा था कि कोई जाना-पहचाना है पर…. पर उसका नाम मन्दार होंठों पर नही ला पा रहा था…. धीरे-धीरे वह आकृति आँखों के आगे और भी धूमिल होती गई… अरे नही!.. सुनो!
रुको प्लीज़!
मंदार ने कहा
उसका गला सूख रहा था.
“मैं पहचानता हूँ तुम कौन हो.. बस नाम होंठों पर है.. कह नही पा रहा.. प्लीज रुको… मुझे याद आ जायेगा…रूको ना…. प्लीज़… प..प.. प.. प्रि….य..या
हाँ प्रिया…. प्रिया हो तुम… है ना!”
देखा कैसे झट से पहचान लिया तुम्हें…. हा हा हा
पर तुम ठीक से सामने क्यूँ नही  आ रही और…  और मुझसे बिना मिले वापस क्यूँ लौट रही हो?
रुको मैं कॉफी बनाता हूँ दोनों साथ बैठकर पीयेगें….
रूकना हाँ,  जाना नहीं… बस दो मिनट
तभी वह साया दीपक की लौ की भाँति फड़फड़ाने लगा तेज़… बहुत तेज़… इतना कि लगा कमरे में सूरज उतर आया हो.
ओह!  मंदार ने अपने बाँये हाथ की हथेली को आँखों पर रख लिया.  उसकी आँखें चौंधिया गई थी.
उफ्फ ! कैसी स्वर्णमयी आभा… मंदार बुदबुदाया
तभी एक खिलखिलाती हँसी हवा में गूँजी और मंदार को लगा कि वह किसी उपवन में आ गया है जहाँ खिले हैं सैकड़ों कल्पतरू.
इतने सारे देवतरू?
“हाँ मंदार…”  प्रिया का स्वर उभरा
ओह प्रिया!  कहाँ थी तुम इतने दिनों तक?
आज आई हो तो जाने की शीघ्रता…..
कहाँ भाग रही हो?  रुको ना प्रिया…
और ये तुमने कैसे वस्त्र धारण कर रखे हैं?
सुंदर लग रही हो पर श्वेत वस्त्र में थोड़ी अलग दिख रही हो.
प्रिया मंदार की बातें सुन मुस्कुरा रही थी.
लो अब मुस्कुराने लगी…. कुछ कहो ना
आज इतनी चुप क्यूँ हो?
मेरा दिल धड़कन रहा है ज़ोरों से और ये हम कहा,  आ गए हैं जहाँ बस रुक्मिणी और तुम्हारी पसंद के फूल खिले हैं?
बोलो ना प्रिया… कुछ तो बोलो….
कुछ क्षण का मौन …
तेज़ चलती द्रुतगामी पवन के अलावा दोनों के मध्य कोई संवाद नही था.
मंदार ! … तभी प्रिया ने कहा
तुमसे मिलने आई हूँ…
हाँ प्रिया बहुत प्रसन्न हूँ मैं तुमको देखकर
“पर आखरी बार मंदार!
मंदार चौंक गया… हे भगवान!
आखरी बार?  ऐसा क्यूँ कह रही हो प्रिया?
हाँ जानता हूँ,  तुम मुझसे रूठी हो कि इतने दिनों तुमसे बात क्यूँ नही की पर तुम तो जानती हो ना कि मेरा प्रोफेशन कैसा है?  ऐसा नही कहते आखरी बार… समझी?
कुछ देर बाद…. “नहीं मंदार मुझे लौटना होगा
कभी वापस न आने के लिये.”
“ओह प्रिया! क्या बचपन है ये.. कहाँ जा रही हो मुझसे रूठकर….. मैं..मैं तुम्हारे बिना कैसे रह पाऊँगा प्रिया? तुम जानती हो ना…. फिर ये बचपना क्यूँ?”
मैं तुम्हें जाने नही दूँगा समझी तुम
प्रिया मुस्कुराने लगी…..”आज तुम कर रहे हो बच्चों वाली ज़िद मंदार”
अब यहाँ रहना मेरे वश में नही… क्यूँकि…
क्यूँकि क्या प्रिया?
क्यूँकि अब मैं इस संसार का हिस्सा नहीँ
एक आत्मा हूँ
क्या?  मंदार का मुँह खुला का खुला रह गया.
आँखें भय व आशंका से ग्रस्त अपलक प्रिया को निहार रही थी.
तभी उसने स्वयं को संभालते हुए कहा कि ” प्रिया ये कौन सी कहानी सुना रही हो अब,  कोई नई कहानी लिखी है क्या? “
“नही मंदार ये सच है”
मैं इस नश्वर देह को त्याग चुकी हूँ
ओह..  ! प्रिया… या.. या….
हाँ मंदार, तुमसे मिले बिना मैं यहाँ से जा नहीं सकती थी.  मेरी आत्मा को मोक्ष नही मिलेगा क्योंकि मेरी मेरी आत्मा का संबंध तुमसे जुड़ा है.
कितने दिनों से तुमने मुझसे बात भी नहीं  की.
इतने व्यस्त रहे तुम कि अपनी प्रिया का हाल तक जानने का प्रयास  नही किया तुमने.
शिकायत नहीं  ये प्रेम है मंदार
तुम्हारी समस्या समझती रही
माना प्रेम का देवालय हृदय में विराजमान है पर प्रेम पुष्प को भी खाद और पानी की आवश्यकता होती है मंदार . केवल हृदय प्रेम से प्रेम की सार्थकता नही होती.  उसे जीवन में उतारना और साथ जीना भी उतना ही आवश्यक है.
प्रिया ने आगे कहा… इस बार मैं कुछ ऐसी उलझी कि तुमको संदेश भी न भेज पाई  और हमेशा की तरह तुम उलझे रहे अपने काम में क्योंकि मैं तो तुम्हारे हृदय में हूँ ही.
पर इस बीच मेरा एक्सीडेंट हो गया मंदार
हाइवे पर एक ट्रक ने मेरी कार को टक्कर मार दी और कार के परखच्चे उड़ गये.  एक्सीडेंट से ठीक पहले सोचा था कि तुम न सही इस बार भी मैं ही याद कर लेती हूँ,  फोन करने ही वाली थी तुम्हें कि ये हादसा हो गया.
चाहत अधूरी ही रह गई
ओह प्रिया…… ऐसा नही हो सकता… तुम… तुम ऐसे नहीं  जा सकती मुझे छोड़कर.
देह जा चुकी है मंदार परन्तु आत्मा सत्य है और वो तुमसे सदैव जुड़ी रहेगी.
तुम मेरे नाराज़ होने पर जब भी मनाते थे मुझे तो कहते थे ना कि” प्रेम को हृदय का विषय है.. इसे हृदय से महसूस करो.”
तुम्हारी  हर बात मानी है मैने,,, इसे भी माना
परन्तु जब आत्मा देह धारण करती है तो इसके भी कुछ कर्तव्य होते हैं ना मंदार
तुम उलझे रहे उस जीवन की व्यस्तता में जो एक दिन छूटने वाला ही है और ये निश्चित  है.
इसलिये ये आवश्यक  है कि स्वयं से जुड़े हर रिश्ते को समय और साथ देने की ज़िम्मेदारी भी हमारी है.
मैं नहीं  हूँ इस संसार में पर “मैं हूँ तुम्हारी धमनियों में,  तुम्हारे हृदय में, तुम्हारी आती-जाती श्वाँसों में.. और सदैव रहूंगी…  ये आत्मा का कर्तव्य  व सार्थकता है मंदार. अब शिकायत नही करूंगी कि तुम मुझे कभी स्वयं याद नही करते,  कभी संदेश पहले नही भेजते मुझे..  क्यूँकि अब मैं सचमुच तुम्हारे हृदय में हूँ  मंदार और बहुत खुश हूँ  कि अब सचमुच तुमसे अलग नहीं  मैं.
प्रिया की एक-एक बात मंदार के हृदय में उतर रही थी.  वह हतप्रभ-सा बस प्रिया की ओर देखे जा रहा था जो शांत भाव से उसके सामने खड़ी मुस्कुरा  रही थी.
तभी प्रिया ने कहा “चलती हूँ मंदार,  अपना ख्याल रखना”
नही प्रिया मैं तुमको जाने की अनुमति नही दूँगा.
तुम चली जाओगी तो कौन मिश्री सी आवाज़ में सुबह-सवेरे मेरे कानों में सुप्रभात कहेगा. ..कौन मुझे सब याद दिलायेगा जो मैं अक्सर भूल जाता हूँ..   कौन रूठेगा मुझसे,  किसे मनाऊँगा मैं प्रिया…किससे प्रेम अनुहार, मनुहार करूंगा.. नही मिलेगी इजाज़त तुमको.. यही रहना होगा मेरे पास
यही देह का कर्म है मंदार, जो तुम अब कह रहे हो,, यही मैं तुम्हें  समझाती रही थी .
खैर, अब भी रहूंगी साथ तुम्हारे साया बनकर तुम्हारी आत्मा का अभिन्न  हिस्सा  बन कर सदैव
अब चलूँगी मंदार….
प्रिया रुको एक बार मुझे तुमको गले लगाना है
मंदार आगे बढ़ा ज्यों ही प्रिया की ओर प्रिया प्रकाश-पुंज हो गई… समा गई एक ज्योत मंदार के हृदय में
मंदार की आँखें बंद हो गई…हवाओं में वही श्लोक तरंगित हो रहा था “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥”
मंदार की आँखें अश्रुपूरित थीं…. तभी मोबाइल की घण्टी बजी और मंदार  की आँखें खुल गई. उसे आभास हुआ कि उसकी आँखें और चेहरा पूरी तरह भीगा है…. हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़कन कहा था… काँपते हाथों से फोन उठाया.
उधर से सुनिधा की आवाज़ आई…. ” मंदार.. मंदार एक बुरी खबर है दो दिन पहले प्रिया का एक्सीडेंट हो गया… जी इज़ नो मोर”
मंदार के हाथ से फोन छूट गया……
हलो…   हलो…….हलो….मंदार..  मंदार
तुम सचमुच आई थी प्रिया, मंदार ने अपने हृदय पर हाथ रखा,  उसे महसूस हुआ कि उसकी प्रिया अब सचमुच हर क्षण उसके साथ है…

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