Taliban : खून में भीगा हुआ सफर-ए-तालीबान (भाग-2)

पिछले अंक में आपने पढ़ा था किस तरह हुई थी तालिबान की शुरुआत और किस तरह उसने की थी अफगानिस्तान पर पहली फतह, तालिबानी खूनी कहानी पढ़िये आगे..

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तालीबान की खूनी दास्तान जारी है. पिछले अंक में आपने पढ़ा था किस तरह हुई थी तालिबान की शुरुआत और उसने की थी अफगानिस्तान पर पहली फतह. उसके बाद 1996 से 2001 तक पूरे पांच साल चली तालिबानियों की अफगानिस्तानी सरकार. इस दौरान तालिबानियों ने दो ऐतिहासिक विशाल बुद्ध मूर्तियाँ बारूद से उड़ा दीं और भारत के विमान को अपहरण करके कांधार ले गये. लेकिन उसके बाद कारस्तानी कुछ ऐसी की तालिबान ने कि अमेरिका का कोप टूट पड़ा उन पर कहर बन कर. पढ़िये यहाँ आगे..

ट्विन टावर पर हमला

अपनी गर्ममिजाज़ी के लिये जाना जाने वाला तालिबान फिर एक बार हुआ बदनाम. अफगानिस्तान में मौजूद सभी दूसरे बड़े उग्रवादी संगठनों ने 1996 के अफगानिस्तान फतह के बाद तालिबान को मुजाहदीनों का बेताज का बादशाह मान लिया था. बहुत से उग्रवादी तालिबानी गुट में समा गये थे और बाकियों ने उससे गठजोड़ कर लिया था. इन्हीं गठजोड़ वाले चरमपंथी गुटों में एक था अलकायदा जिसकी जड़ें ईराक और सीरिया से थीं. अमेरिका की दादागिरी से नाराज़ तालिबान के साथी चरमपंथी संगठन अलकायदा ने एक बड़ी योजना को अंजाम देते हुए 11 सितंबर 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर बड़ा हमला कर दिया.

इस तरह किया नाइन इलेवन

11 सितंबर के इस आत्मघाती हमले को अन्जाम देने के लिये अल कायदा आतंकवादियों ने चार वाणिज्यिक यात्री जेट वायुयानों का अपहरण कर लिया.  इनमें से दो विमानों को उन्होंने न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर ट्विन टावर्स से टकरा दिया जिससे विमानों पर सवार सभी लोग तथा इन दोनो ऊंची बिल्डिंगों में काम करने वाले बहुत से लोग मारे गए. दो घंटे के अंदर ये दोनो इमारतें ढह गईं और आसपास की कुछ इमारतों को भी नुकसान पहुंचा. अपहरणकर्ताओं ने तीसरे विमान को वाशिंगटन डीसी के बाहर  वर्जीनिया में पेंटागन की इमारत से टकरा दिया। अपहरणकर्ताओं का चौथा विमान अपने यात्रियों समेत पेंसिल्वेनिया में शैंक्सविले के पास एक खेत में जा गिरा. इन चारों विमानों के भीतर कोई भी जिन्दा नहीं बच पाया. और उनको मिलाकर इन हमलों में कुल तीन हजार लोगों की जानें गईं जिनमें अमेरिका सहित आठ देशों के लोग शामिल थे.

 अमेरिका बनाम तालिबान   

आगबबूला अमेरिका इसका बदला लेने पर आमादा हो गया और 20 सितंबर को जॉर्ज डब्लू बुश ने अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबानी शासन को ग़लत करार देते हुए उनसे अलक़ायदा के सभी कमान्डरों को सौंपने या परिणाम भुगतने की धमकी दे डाली. तालिबान के न मानने पर 7 October 2001 को अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला बोल दिया और ब्रिटेन,कनाडा जैसे मित्र-राष्ट्रों के साथ ऑपरेशन एनड्योरिंग फ़्रीडम की शुरुआत कर दी. अमेरिकी सेना ने तालिबान को सता से बेदख़ल कर दिया और गिन-गिन कर उसके कमांडरों को अपना निशाना बनाया. मुल्ला उमर और लादेन ने भागकर पाकिस्तान में शरण ली और दूसरे तालिबानी अफगानिस्तान की पहाड़ी गुफाओं में जा छुपे. ये ऑपरेशन लगातार 13 सालों तक चला.

अमेरिका रहा नाकाम

आज की तस्वीर काफी बदल गई है हालात की भी और तालिबान की भी. साल 2001 से शुरू करके अमेरिका ने तेरह साल तालिबान के खिलाफ जंग लड़ी. 2014 में इस जंग में एक ऐसा मोड़ आया जिसने एक तरह से तालिबान की अमेरिकी फतह के फरमान पर दस्तखत कर दिये. अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो सेनाओं को खबर मिली कि मुल्ला उमर पाकिस्तान में छुपा हुआ है. ये खबर सच नहीं थी क्योंकि मुल्ला उमर एक साल पहले ही एक बीमारी का शिकार हो कर दम तोड़ चुका था. और फिर साल 2014 में इस खबर की भी तस्दीक हो गई और नाटो सेनाओं ने अपने दुश्मन नंबर वन की मौत का जम कर जश्न मनाया. मगर जंग खत्म हो जाने का खयाल उनकी बहुत बड़ी गलतफहमी थी क्योंकि तालिबान की जंग अब भी चल रही थी. बस फर्क इतना हुआ कि अब तालिबानी लड़ाकों की जंग का तौर-तरीका बदल गया था.

बदला अन्दाजे जंग

अब तक अक्सर आमने-सामने की जंग हुआ करती थी लेकिन अब तालिबान के बचे-खुचे कमांडरों ने जंग का तरीका बदल डाला. इस तरह 2014 से आगे 2021 तक तालिबानी जंग का ढंग वही हो गया जो 1980 के दशक में सोवियत सेनाओं के खिलाफ हुआ करता था. अब तालिबान ने शुरू कर दिया था गुरिल्ला युद्ध जो उन्होंने इसी अमेरिकी सेना से सीखा था जिसके खिलाफ अब उनकी बंदूकें बोल रही थीं.  और इसका असर ये हुआ कि तालिबान को पिछले बीस सालों में खत्म करने में नाकाम रहा अमेरिका आखिरकार अपने हाथ खड़े कर देने के लिये मजबूर हो गया. और इसी के साथ ही अमेरिका ने कर दिया अफगानिस्तान से अपनी वापसी का ऐलान. इतिहास निरपेक्ष होता है और सच बोलना पसंद करता है. इस वापसी के साथ इतिहास के पन्नों में वियतनाम वार की तरह दर्ज हो गई अमेरिका की दूसरी हार अफगानिस्तान में.

अफगानिस्तान पर दूसरा तालिबानी कब्ज़ा

तालिबानी लड़ाके एक बार कामयाब हो चुके थे और अफगानिस्तानी सत्ता का स्वाद चख चुके थे. बीस साल पहले का वो स्वाद अब तक उन्होंने अपनी जुबान पर जिन्दा रखा था. मगर मसला सिर्फ सत्ता हासिल करने का नहीं था, मसला ये भी था कि तालिबान को अपना खोया हुआ धमाकेदार वजूद बहुत प्यारा था जिसे वो हर हाल में हासिल कर लेना चाहता था. दुनिया में तालिबान के नाम की गूंज बहुत मुलायम हो गई थी और ये बात तालिबानी मिज़ाज़ को सख्त नापसंद आई. इसके बाद लगातार तालिबानी हमलों के साथ कोशिशों पर कोशिशें हुईं जो आखिरकार कामयाब हो गईं.
पुराने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के फैसले से सहमति जताते हुए नये राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि अफगानिस्तान में अरबों डॉलर लुटा कर अमेरिका को कुछ भी हासिल नहीं हुआ. और उन्होंने मार्च 2020 के अमेरिकी फैसले को पक्का करते हुए 31 अगस्त 2021 तक अपनी सेनाओं को वापस बुला लेने का ऐलान कर दिया. बस इधर ऐलान हुआ और उधर शुरू हुई तैयारी जीत वाली जंग की. तालिबान ने अपनी बंदूकों में लोहा भर लिया और अंगड़ाई ले कर खड़े हो गए.

एकतरफा जंग जीत ली तालिबान ने

इस बार तालिबानी जोश तालिबान ने अपने दोनो दुश्मनों को कमतर नहीं आंका और पूरी तैयारी बाकायदा की गई. फिर तय की गई एक पक्की और बेदाग तारीख जिस दिन सब कुछ वैसा हो सके जैसा तालिबान ने चाहा है. इसके बाद पक्की तारीख पर तालिबानी लड़ाकों ने कूच कर दिया और एक साथ के बजाये, एक के बाद एक धावे बोले गए. दुनिया की निगाहों से बच कर अमेरिका ने अंदरूनी संधि कर ली थी इसलिए तालिबानी लड़ाकों ने अमेरिकन सेना और अमेरिकन एम्बेसी को छुआ भी नहीं.

फौज ने टेक दिये घुटने

इधर आरामतलबी के शिकार अफगानी सरकार के फौजी भी भांप चुके थे कि इस बार अमेरिका की मशीनगनें खामोश रहेंगी और उनको अपनी हिफाजत खुद करनी होगी. सत्ताईस सालों में गुरिल्ला युद्ध के विशेषज्ञ हो चुके तालिबानियों का खौफ उनके सर पर तारी हो चुका था और इस खौफ ने ही उनको मजबूर कर दिया कि वे अपने राष्ट्रपति के आत्मसमर्पण के पहले ही आत्मसमर्पण कर दें. यही हुआ  बड़े आराम से सात दिनों के भीतर तालिबानी लड़ाके अफगानिस्तान के 34 राज्यों को जीतते हुए  कंधार से काबुल तक भी पहुँच गए और उसके बाद दुनिया ने सुना कि अब अफगानिस्तान तालिबान का है.

 तालिबानी हुकूमत की शुरुआत

अफगानिस्तान में तालिबान की दूसरी पारी की शुरुआत उसी तरह धमाकेदार रही जिस तरह दूसरी पारी में उनकी अफगानिस्तान पर जीत जानदार थी. अफगानिस्तान सरकार के खिलाफ इस एकतरफा जंग के दौरान एक नई बात सामने आई और वो ये थी कि तालिबान अब केवल किसान और चरवाहों का समूह भर नहीं रह गया था, जो अब तक हथियार चुरा कर हथियार चलाया करता था, अब तालिबान का आधुनिक रूप रंग उनकी सोच में भी नयापन लेकर वजूद में आया है. अब तालिबानी लड़ाके आधुनिक युद्ध के प्रशिक्षण से लैस हैं और उनके पास दुनिया के तमाम आधुनिकतम हथियार भी मौजूद हैं. इसके साथ ही तालिबानी लड़ाका अब अपने पारंपरिक गुरिल्ला वारफेयर से निकल कर काफी आगे आ चुका हैं और वो आधुनिक ढंग के युद्ध के तौरतरीकों में पारंगत हो रहा है. अब आप उनको कबीलाई लड़ाका समझेंगे, जो अमेरिका ने समझा था, तो ये आपकी भारी भूल होगी.

(क्रमशः)

 

Taliban : खून में भीगा हुआ सफर-ए-तालीबान (भाग-1)

 

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