Taliban : खून में भीगा हुआ सफर-ए-तालीबान (भाग-1)

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आज दुनिया के सामने एक नया परिदृश्य प्रस्तुत हुआ है जो जितना हैरतअंगेज है उतना ही डरावना भी है. दुनिया के देखते ही देखते एक प्रजातांत्रिक देश में तख्ता पलट हो गया है. सब देखते रह गए और कोई भी कुछ न कर सका. विश्व के दरोगा बनने वाले देश भी मूक साक्षी बने रहे और अफगानिस्तान में देश की जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को घसीट के बाहर कर दिया गया. कहने को तो ये सीधी भाषा में तख्ता-पलट कहा जा सकता है किन्तु मूल रूप से ये अहिंसा पर हिंसा की विजय है जिसमें देश के भीतर मौजूद उन ताकतों ने सरकार को उखाड़ फेंका जिन्हें सारी दुनिया में तालिबान के नाम से जाना जाता है.

ये है जिहादी आतंकवाद

तालिबान को किसी पहचान की जरूरत नहीं है. उनका नाम ही उनकी पहचान है. तालिबान एक चरमपंथी संगठन है जिसका नाम अफगानिस्तान की धरती पर अपनी धमाकेदार मौजूदगी बयान करता है. दुनिया में जितने देश हैं उससे कहीं अधिक आतंकवादी संगठन हैं. २०५ देशों में 250 से ज्यादा आतंकवादी शक्तियां अपनी मौजूदगी से अपनी पहचान बना चुकी हैं. ये सभी संगठन खुद को चरमपंथी संगठन मानते हैं किन्तु इनके बागी, हिंसक और जिहादी तौर तरीकों के कारण इनको आतंकवादी संगठन का दर्जा मिला है.

ढाई सौ से ज्यादा हैं ये संगठन

दुनिया में मौजूद ऐसे 250 संगठनों मे भी सबसे ऊपर हैं पांच आतंकी संगठन जिनमे हैं – आईएसआईएस, अलकायदा, बोको हरम, इस्लामिक स्टेट ऑफ़ ईराक एंड लेवेंट और तालिबान. अपने-अपने दौर में इनमे से सभी आतंकी संगठनों ने दुनिया के इतिहास में अपने खूनी कारनामो से सुर्खियां लूटीं है. लेकिन आज की तारीख में दुनिया में मौजूद ढाई सौ से ज्यादा आतंकी संगठनों में सबसे ऊपर उभर कर आया है तालिबान जिसने पूरे एक देश पर कब्जा जमा कर दुनिया भर में मौजूद दूसरे आतंकियों के लिए प्रेरणा का कार्य किया है. इस आतंकी कारनामे ने दूसरे ऐसे संगठनों के सामने ये सबूत दे दिया है कि उनका रास्ता बड़ी कामयाबी के आसमान को भी छू सकता है. तालीबान के इसी खूनी सफर को पेश करते हुए हमें नजर डालनी होगी साल 1994 पर और जाना होगा सत्ताइस साल पीछे.

तालीबान की खूनी शुरुआत

तालिबान की कहानी शुरू होती है आज से सत्ताईस साल पहले साल 1994 में जब आधिकारिक तौर पर तालिबान का नाम पहली बार सामने आया. उसके बाद जब एक बार नाम सामने आया तो बार बार ये नाम सामने आया और इसकी गूँज अफगानिस्तान की सरहदों से बाहर रूस, चीन और अमेरिका तक पहुंची. शायद तालिबान बनाने वालों ने ये नहीं सोचा था कि एक दिन उनकी जद में पूरा अफगानिस्तान होगा. लेकिन ऐसा हुआ और एक बार नहीं दो-दो बार हो गया. दोनों बार ही दुनिया देखती रह गई और तालिबान न केवल उठ कर खड़ा हुआ बल्कि डट कर खड़ा भी रहा. और आज हालात ये हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान को नकार कर कोई नहीं चल सकता, यहां तक कि अमेरिका भी नहीं.

अफगानिस्तान पर पहली फतह

ये दौर था साल 1994 का जब यहाँ राष्ट्रपति की कुर्सी पर नजीबुल्लाह मौजूद थे और उनके राष्ट्रपति भवन से बाहर सारे अफगानिस्तान में मौजूद थे 7 बड़े मुजाहिदीन गुट जिनका बस एक ही मकसद था कि हर हाल में नजीबुल्लाह को कुर्सी से उखाड़ फेंकना है. उन्हें अपने इस मकसद में कामयाबी भी मिली और दो तारीखें इस दौरान अफगानिस्तान से दुनिया के सामने आईं. एक थी 17 अप्रेल 1992 और दूसरी थी 27 सितंबर 1996. सत्रह अप्रेल 1992 को अफगानिस्तान में सोवियत संघ के समर्थन से चलने वाली नजीबुल्ला सरकार भी सोवियत संघ की तरह ढह गई और तालिबान ने अफगानिस्तान पर अनौपचारिक कब्जा कर लिया.

राष्ट्रपति का बेरहम कत्ल

अपदस्थ राष्ट्रपति नजीबुल्ला ने अपनी पत्नी तथा बच्चों को तो भारत भेज दिया था किन्तु खुद बाहर निकलने में नाकाम रहे. उसके बाद नजीबुल्लाह साढ़े चार साल तक राजधानी काबुल के यूनाइटेड स्टेट्स के ऑफिस में छुपे रहे किन्तु यहाँ पहली बार उन्हें यूनाइटेड नेशंस से धोखा मिला जो उनके लिये आखिरी साबित हुआ 27 सितंबर की रात तीन बजे डेढ़ सौ के करीब तालिबानी सैनिक बड़े आराम से काबुल स्थित यूएन के दफ्तर में घुस आये और उन्होंने नजीबुल्लाह को खींच कर उनके कमरे से बाहर निकाला. नजीबुल्लाह रो रहे थे और अपनी जान की भीख मांग रहे थे पर किसी ने उनकी एक न सुनी. उनको बाहर सड़क पर ला कर बुरी तरह से पीटा गया. तालिबान की नफरत तब नजर आई जब उन्होंने उनके गुप्तांगों को काट लिया गया और सिर में गोली मार कर पहले क्रेन पर लटका दिया और फिर राजमहल के नज़दीक के लैंप पोस्ट पर टांग दिया गया. सुबह लोगों ने देखा कि लटके हुए राष्ट्रपति के मृत शरीर की आंखें सूजी हुई थीं और उनके मुंह में ज़बरदस्ती खूब सारी सिगरेटें ठुसी हुई थी.

तालीबान का पहला कमांडर मुल्ला उमर 

पहले जो राज था बाद में खुल कर सामने आ गया और वो ये था 1979 में अफगानिस्तान से रूसी सेना को बाहर करने के लिए अमेरिका ने वहां के मुजाहिदीन से हाथ मिला लिया था उसके बाद उसने चीन, सऊदी अरब तथा पाकिस्तान के साथ मिल कर मुजाहिदीनों को हथियारों की सप्लाई शुरू कर दी. अमेरिकन गुप्तचर एजेंसी सीआइए ने पाकिस्तान की आईएसआई से मिल कर उनको रूसी सेना से लड़ने के लिए ट्रेनिंग देना भी शुरू कर दिया. विदेशी मदद से मुजाहिदीन ताकतवर होते चले गए और नौ साल तक नाकाम जंग लड़ने के बाद रूसी सेनाओं को अफगानिस्तान से जाना पड़ा. सात मुजाहिदीन गुटों में जो सबसे पहले उबर कर आया था वही तालीबान था. अरबी शब्द तालिब का मतलब होता है छात्र. अपने धर्म को लेकर कट्टरपन्थी ही नहीं बल्कि चरमपन्थी हो गये अफगानी बागियों ने मिलकर तालीबान नामका विद्रोही गुट खड़ा किया जिसमें कंधार के रहने वाले 34 साल के मुल्ला मोहम्मद उमर को अपना नेता चुना. मिजाज़ से ही खुंखार मुल्ला उमर 1983 से 1991 के बीच रूसी सेना से लड़ते हुए चार बार घायल हुआ था उसी दौरान जंग में उसकी दायी आँख भी फूट गयी थी.

अफगानिस्तान पर कब्जा

1994 में 50 हथियारबंद लड़ाकों का समर्थन लेकर मुल्ला उमर ने तालिबान खड़ा कर दिया था जो आज आसमानी हो गया है. उसका मानना था कि अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत दख़ल से इस्लाम ख़तरे में है. तालीबान के गठन के तुरंत बाद उसने स्पिन बुलदाक पर क़ब्ज़ा कर वहाँ की गुफाओं से छिपाए हुए सोवियत हथियार हासिल कर लिये. देखते ही देखते महीने भर में ही करीब बीस हजार लड़ाके तालिबान से जुड़ गये और कई मुजाहिद संगठनों ने आत्मसमर्पण कर दिया. यही वो वक्त था जब पाकिस्तान ने भी तालीबान को अपना समर्थन देना शुरू कर दिया. तालिबान ने 1994 से 1996 तक दो साल की खूनी गोरिल्ला लड़ाई को कामयाबी के साथ अन्जाम दिया और हजारों लोगों का खून बहाते हुए अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया. 27 सितम्बर 1996 को दो घटनायें हुईं एक तो नजीबुल्लाह की हत्या की गई और दूसरी ये कि तालीबान ने काबुल फतह कर लिया जिसके बाद अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी सत्ता की बाकायदा शुरूआत हो गयी. नई तालीबानी सरकार को पाकिस्तान के बाद सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने भी मान्यता दे दी. और इस दौर के अफगानिस्तान में मुल्ला उमर देश का सर्वोच्च धार्मिक नेता बन कर सामने आया. यह एक ऐसा कट्टरपंथी राजनीतिक आंदोलन था जिसने अफ़ग़ानिस्तान की सभ्यता को फिर से मध्य युग में पहुँचा दिया था.

भारतीय विमान का कंधार कांड

अफगानिस्तान पर काबिज होने के बाद तालीबानी लड़ाकों को राजनीतिक सत्ता का स्वाद तो मिला लेकिन उससे उनकी याददाश्त कमजोर नहीं हुई और मिजाज़ में भी कोई फर्क नहीं आय़ा. तालीबानी नेताओं को याद रहा कि हिन्दुस्तान ने उनकी सरकार को मान्यता नहीं दी है तो बदले में उन्होंने विमान कांड कर डाला और भारत को बताया कि तालीबान को कम आंक कर चलना समझदारी नहीं है. भारत के IC814 विमान का अपहरण करके तालिबानी उसे कंधार ले आये. इस तालीबान हरकत से हैरान भारत परेशान इसलिये भी था कि इस जहाज में मौजूद हिन्दुस्तानियों की जान उसके लिये बेशकीमती थी. अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने तालीबान की शर्तों को कुबूल किया और तालीबान के तीन उग्रवादी साथियों को जो भारतीय जेलों में कैद थे उनको अफगानिस्तान पहुंचाया जिसके बाद तालिबान ने भारतीय जहाज की रिहाई की.

बामियान बुद्धा मूर्ति कांड

तालीबान का गर्म-मिजाज़ न केवल लाल रंग से रंगा हुआ है, बल्कि उसने कभी खामोशी से बैठना भी नहीं सीखा है. 1994 से आगे लगातार तालीबान ने दुनिया को अपनी मौजूदगी से लापरवाह नहीं होने दिया. 1994 में बगावत करके आधा अफगानिस्तान अपने कब्जे में ले लिया तो 1996 में नजीबुल्लाह को मार कर पूरे अफगानिस्तान पर अपना नाम लिख दिया. उसके बाद 1999 में भारत के विमान का अपहरण किया तो दो साल बाद ही 2001 में बामियान बुद्धा मूर्ति कांड कर डाला.

 

(क्रमशः)

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