Taliban : खून में भीगा हुआ सफर-ए-तालीबान (भाग-3)

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अफ़ग़ानिस्तान की सरकार पर काबिज है तालिबान और तालिबान पर काबिज हैं पांच सरदार जो हैं इतने असरदार कि तालिबान के सत्तर हज़ार लड़ाके इनके एक इशारे पर जान कुर्बान करने को हर वक्त तैयार रहते हैं. ये पांच सरदार आज अचानक आ कर तालिबान के सर पर नहीं बैठ गए बल्कि इनकी जड़ें तालिबान में बरसों पुरानी है. सत्ताईस साल से चले आ रहे तालिबान संघर्ष में इन सभी का योगदान है और काफी बड़ा योगदान है. इनके चेहरों की बात करें तो इनके चेहरे इनके नाम से पहचाने जाते हैं और इनका नाम ही तालिबान के हर काम के लिए काफी है.

राष्ट्रपति भवन में रहेगा कौन?

फिलहाल अफगानिस्तान का राष्ट्रपति भवन किसके नाम होगा ये तय किया जाना बाकी है और इसी के साथ तालिबानी नेता अफगानिस्तान की दूसरी पार्टियों के नेताओं से भी सरकार में शामिल होने की दावत दे रहे हैं. इससे पहले कि अफगानिस्तान की नई सरकार कायम हो ये जानना ज़रूरी है कि कौन हैं वो तालिबान के असरदार सरदार जो इस सरकार में सबसे ऊपर काबिज होने वाले हैं.

मुल्ला अब्दुल गनी बारादर

नए अफगानिस्तान के हाकिम और हुक्मरान तय करने वाले पांच सबसे बड़े तालिबानी कमांडरों में पहला नाम है मुल्ला अब्दुल गनी बरादर का है. मुल्ला अब्दुल गनी बारादर सभी तालिबानी नेताओं में सबसे पुराना चेहरा है. मुल्ला बारादर तालिबान के सर्वोच्च ऐतिहासिक कमांडर मुल्ला उमर का दामाद है जिसने तालिबान की नींव रखने में मुल्ला उमर का हर कदम पर साथ दिया था. मुल्ला उमर के साथ कंधार में एक मदरसे की शुरुआत करके 1994 में इन दोनों तालिबानी कमांडरों ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर यहीं तालिबान की नींव रखी. तालिबानी लड़ाके मुल्ला बारादर के इसलिए भी अहसानमंद हैं क्योंकि उसने अमेरिकी बम बोर्डिंग के बीच मुल्ला उमर को अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर अफगानिस्तान से निकालने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी.

बन सकता है अगला राष्ट्रपति

समझौते की इबारत लिखी जिसने आज अफगानिस्तान में तालिबान की जीत का इतिहास लिख दिया है. पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का करीबी मुल्ला बारादर तालिबान के लिए तमाम नीतिगत फ़ैसलों के साथ-साथ अपने संगठन के लिए भी तमाम ‘डूज़ और डोंट्स’ को तय करता है. चेहरे-मोहरे से बहुत शांत लगने वाला 53 साल के मुल्ला बारादर का लड़ाका-इतिहास इतना पुराना है कि अठारह साल की उम्र से ही उसने 1986 से अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ अफगान मुजाहिदीन के तौर पर लड़ाई लड़ी थी और अपने तालिबानी करियर की शुरुआत कर दी थी. दोहा में बैठ कर देश में अशरफ गनी सरकार के खिलाफ जंग चलाने वाला मुल्ला बारादर अफगानिस्तान में तालिबान की पहली सरकार के दौरान देश का उप-रक्षा मंत्री भी रहा था.

हिब्तुल्लाह अखुंदजादा

औपचारिक तौर पर आज तालिबान की कमान हिब्तुल्लाह अखुंदजादा के पास है. वो तालिबान का सुप्रीम नेता है जो साल 2016 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए तत्कालीन तालिबानी सुप्रीम कमांडर मुल्ला मंसूर अख्तर के बाद तालिबान के सबसे बड़े सरदार की गद्दी कमान संभाली. इस एक वक्त के छोटे मजहबी नेता ने तालिबान की सत्ता हासिल करते ही कमाल की लीडरशिप का मुजाहिरा किया और सभी बिखरे हुए तालिबानी लड़ाकों को एक कर दिया. उसकी बात का तालिबानी लड़ाकों पर इतना असर है कि मुल्ला उमर की मौत के बाद बिखर रहा तालिबान फिर से एकजुट हो गया और सबने अखुन्जादा को अपना सरदार मान लिया.और ये अखुन्जादा की ही कूटनीतिक सफलता थी कि उसने धीरे-धीरे करके अफगान सेना के बहुत से कमांडरों को अपने साथ मिला लिया.

तकरीरें भी सुनाता है अखून्जादा

अपनी अपील से तालिबानी लड़ाकों के दिल में जगह बनाने वाले अखूनजादा का अदब ओ एहतराम इतना है कि तालिबान चीफ बनने के बाद अल कायदा प्रमुख अयमान अल जवाहिरी ने उसके सामने सर झुकाया. अखूनजदा ने जवाहिरी की सरपरस्ती और वफादारी हासिल की और बदले में उसको ‘वफादारों का अमीर’ कह कर उसकी इज्जत आफज़ाई की. इस तरह अखूनजादा और भी आदमकद हो गया और अपनी ऊंची शख्सियत के साथ तालिबान के राजनीतिक, धार्मिक और लड़ाई के मामलों पर आख़िरी फैसले करने लगा. आज भी अलग-अलग त्योहारों के मौकों पर तालिबानी लोग उसकी  मजहबी तकरीरें पूरी श्रद्धा के साथ सुनते हैं.

मुल्ला मुहम्मद याकूब

मुल्ला मुहम्मद याकूब मुल्ला उमर का बेटा है और उमर में कम होने की वजह से ही 2016 में तालिबान का सर्वोच्च  कमांडर नहीं बन सका. लेकिन तालिबान की अंदरूनी सियासत में उसकी ऊंचाई किसी भी ऊंचे ओहदेदार से किसी तरह कम आज भी नहीं है. तालिबान में 35 साल के मुल्ला याकूब की सबसे बड़ी योग्यता ये है कि वह मुल्ला उमर का बेटा है. यही वजह है कि ऊंची हैसियत के साथ तालिबान में मुल्ला याकूब संगठन की तमाम सैन्य गतिविधियों का सिरमौर है. दूसरे शब्दों में कहें तो वह तालिबान का आर्मी कमांडर भी कहा जा सकता है.

 बहुत जालिम है याकूब

खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़  अफगानिस्तान में तालिबान के हर ऑपरेशन को मुल्ला मोहम्मद याकूब ही अंजाम देता है और उसकी इजाजत से ही तालिबानी लड़ाकों का अगला ऐक्शन तय होता है. माना ये भी जाता है कि तालिबान की जागीर का अगर कोई असली वारिस है तो वो मुल्ला याकूब ही है. और आने वाले दिनों में मुल्ला याकूब तालिबान के सर्वोच्च कमांडर की भूमिका में भी नज़र आ सकता है. एक ख़ास बात और इस नाम को खौफनाक बनाती है और वो ये कि मुल्ला याकूब बहुत ज्यादा बेरहम है इसलिए उसकी देखा-देखी ही तालिबानी लड़ाके बेगुनाह और बेबस लोगों पर बरसों से जुल्म ढाते आये हैं.

सिराजुद्दीन हक्कानी

सिराजुद्दीन हक्कानी कुख्यात हक्कानी नेटवर्क का सर्वेसर्वा है. हक्कानी नेटवर्क शुरू किया था सिराजुद्दीन के पिता जलालुद्दीन हक्कानी ने. जलालुद्दीन हक्कानी तालिबान के टॉप कमांडरों में से एक रहा है. अब उसका वारिस सिराजुद्दीन हक्कानी नेटवर्क ऑपरेट कर रहा है. हक्कानी नेटवर्क तालिबान का एक सहयोगी संगठन है जो पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर तालिबान की फाइनेन्शियल और मिलिटरी प्रॉपर्टी की देखरेख करता है. हक्कानी नेटवर्क के माध्यम से सिराजुद्दीन हक्कानी  तालिबान के लिए संसाधनों का इंतज़ाम करने की भी ज़िम्मेदारी सम्हालता है.

पैसे का जिम्मा है हक्कानी नेटवर्क का

पाकिस्तान जिस तरह तालिबान की मदद कर रहा है उसी तरह हक्कानी नेटवर्क की भी भरपूर सहायता करता है. ये सहायता कितनी अहम है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हक्कानी नेटवर्क के आतंकियों को पाकिस्तान की फ़ौज ही ट्रेनिंग देती है. 48 साल के सिराजुद्दीन हक्कानी पर अमेरिका ने एक करोड़ अमेरिकी डॉलर्स यानी करीब 70 करोड़ रुपये का इनाम रखा है. फिदायीन हमलों के विशेषज्ञ माने जाने वाला सिराजुद्दीन आतंकियों को ऐसे हमलों के लिए तैयार करने से लेकर उन्हें एक्जीक्यूट करने तक का जिम्मा सम्हालता है. इनके अलावा कई अफगानी अफ़सरों के कत्ल विदेशी नागरिकों को अगवा करके उनसे फिरौती वसूलने के आरोपों ने भी अमेरिका के लिये उसका मोस्ट वान्टेड कद बढ़ाया है.

शेर मोहम्मद स्तानिकजई

शेर मोहम्मद को तालिबान का नेता चेहरा माना जा सकता है. संगठन में भी उसका बड़ा ओहदा और बड़ा रसूख है और संगठन का एक ऐसा चेहरा है जिसे अक्सर तालिबान की ओर से होनेवाली बातचीत में शामिल देखा जाता है. तालिबान के लिये शेर मोहम्मद पच्चीस साल से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहा है. साल 2001 में तालिबान के पतन के दौरान शेर मोहम्मद ने अफगानिस्तान से निकल कर और दोहा में ज़िन्दगी शुरू की.

बन सकता है विदेश मन्त्री

कट्टर धार्मिक नेता की पहचान वाले शेर मोहम्मद को तालिबान ने दोहा में मौजूद अपने राजनीतिक कार्यालय का सीईओ बना दिया था जिसके बाद उसने अमेरिका के साथ हुए शांति समझौते के दौरान तालिबान का प्रतिनिधित्व किया. कई देशों में शेर मोहम्मद तालिबान के पैरोकार के रूप में बातचीत के लिये मौजूद रहा. काफी पढ़ा-लिखा माने जाने वाला शेर मोहम्मद के बारे में बताया जाता है कि उसने 70 के दशक में अफगान सैनिकों के साथ देहरादून में इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) से ट्रेनिंग ली थी. पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी शेर बहादुर का खास कनेक्शन है. उम्मीद की जा रही है कि नई तालिबानी सरकार में शेर मोहम्मद को विदेश मंत्री बनाया जा सकता है.

 

 

Taliban : खून में भीगा हुआ सफर-ए-तालीबान (भाग-2)

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