Corona हो या Black Fungus: यज्ञ है उपचार, बचाइए घर-परिवार!!

घर-परिवार की सुरक्षा का ब्रह्मास्त्र है भारत की आध्यात्मिक विरासत का सारथी यज्ञ..यज्ञ कीजिये और परिवार ही नहीं समाज की भी रक्षा कीजिये !!

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जड़ों की तरफ लौट कर ही अस्तित्व की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है. योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और यज्ञ चिकित्सा- भारत-विरोधी मानसिकता वाले यदि विश्वास न करें तो अपनी जाँच करवा लें – पूर्ण स्वतंत्रता है.
जब भारतीय योग और चिकित्सा के ध्वजवाहक स्वामी रामदेव पर ‘लोग’ उंगलियां उठा सकते हैं तो ऐसे लोग भारत की विरासत के हर महान अंश के प्रति पूर्वाग्रही और विरोधी हो सकते हैं. इसलिए ऐसे लोगों को अपनी आत्मा की शान्ति के लिये पूरा प्रयत्न करना चाहिए और इसके लिए उनको पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए .
कोरोना को धन्यवाद है उसने ग्रैंड यू टर्न की परिकल्पना को साकार कर दिया है. भारत के महानगर भौतिकवादियों का अड्डा बनते जा रहे थे अब ये इंडिया वाले लोग भी भारत की परम्परा के आग्रही बन रहे हैं. कहते हैं मरता क्या न करता.. प्राण बचाने के लिए आज प्राणायाम शुरू कर दिया है लोगों ने. जब जान पर बनी तो गिलोय अश्वगंधा और तुलसी की महिमा समझ में आई, जब कोरोना ने लट्ठ ले कर दौड़ाया तो योग याद आया, आयुर्वेद समझ आया और अब तो यज्ञ भी भला-भला लगने लगा है समझदारों को.

कोरोना ने हमें समझाया है कि हमारी जड़ों में ही हमारी सुरक्षा है. जड़ों से जुड़े रहोगे तो उखड़ने से बचे रहोगे वरना अब भविष्य में कोरोना जैसे तूफ़ान बहुत से आने वाले हैं. भारत की समृद्ध आध्यात्मिक और चिकित्सकीय विरासत भारत के लिए वरदान की भांति प्राणदायी सिद्ध हो रही है. योगासन, प्राणायाम, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के पश्चात अब प्रकाश में आई है यज्ञ चिकित्सा भी. ये सभी भारतीय आयुर्विज्ञान के ही अंग हैं जो परंपरा से भारतीय जीवन शैली में अस्तित्वमान हैं.

दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि हम हिन्दुओं को ही अपनी आध्यात्मकि जीवन पद्धति का पूर्ण ज्ञान नहीं है और कमाल तो ये भी है कि जितना भी ज्ञान है वह अधूरा है अर्थात उसके पीछे के महत्व से अधिकतर लोग अपरिचित ही हैं. सनातनी जीवनशैली ही धर्म का अभिन्न अंग है अथवा ऐसे कहें कि सनातन धर्म का अभिन्न अंग हमारी सनातनी जीवनशैली है. हमारे जीवन में ही धर्म रचा-बसा है. हमारे व्रत-त्यौहार और पूजा-पाठ सब कोरे कर्मकांड नहीं है -इनके पीछे एक व्यवस्थित विज्ञान कार्य करता है जो कि आधुनिक भौतिक विज्ञान से भी परे का विषय है. हमारे पूजा-पाठ के कर्मकांडों में अंतर्निहित मर्म से ज्ञानीजन ही परिचित हैं, आमजन अबोध और अज्ञानी बने हुए हैं – किन्तु उन्हें न इस अज्ञान का दुःख है, न जानने की उत्सुकता. कारण स्पष्ट है, वे धर्म को सुख में औपचारिकता और दुःख में आवश्यकता बना कर चलाते हैं वो भी बाहर-बाहर से ही. धर्मकार्य में हृदय में आस्था और ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव अत्यंत आवश्यक है.

चाहे वह शंखनाद हो, चाहे भजन-कीर्तन हो, चाहे ताली बजाना हो, घी के दिए से आरती करना हो, चाहे हवन हो अथवा पूजन हो – हर धार्मिक क्रिया के पीछे एक धार्मिक विज्ञान कार्य करता है जो आमजनों के सामान्य ज्ञान से परे है. अभी हम केवल हवन की बात करते हैं. आज निश्चित ही हवन की उपादेयता सर्वोच्च स्तर पर समझ में आ रही है क्योंकि यह प्राणिमात्र के प्राण बचाने का सर्वोत्तम साधन के रूप में प्रकाश में आया है.

हवन में समिधा का दहन होता है. यह कोई साधारण हवन-सामग्री नहीं होती, इसमें – अगर, तगर, जटामासी, हाबेर (Hauber), नीम की छाल, तुलसी, गिलोय,सफेद चंदन, देवदारु, शीतलचीनी, कालमेघ, आज्ञघास, जावित्री, कड़वी वछ, नागरमोथा, सुगध बाला, कपूर तुलसी, जायफल, भुई आँवला, लौंग, दारूहल्दी, पलाश, उदुम्बर आदि का चूर्ण बना कर उसे गाय के देशी घी के साथ मिश्रित करके तैयार किया जाता है. यज्ञ के समय आम और पीपल की लकड़ी का उपयोग होता है. इसमें उपयोग में लाये जाने वाला देशी घी, कपूर तथा अक्षत भी वायुमन्डल की शुद्धता हेतु महत्वपूर्ण होते हैं. यज्ञ के माध्यम से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किये जाते रहे हैं. इससे शारीरिक व्याधियां तो दूर होती ही हैं, समस्त वातावरण की भी गहन शुद्धि होती है. यज्ञ का धुंआ जहां जहां तक जाता है वहां तक वातावरण में उपस्थित कीटाणु, विषाणु नष्ट हो जाते हैं और विषैली गैसों का हानिकारक प्रभाव समाप्त हो जाता है. सांस के माध्यम से अंदर जाने वाली यह यज्ञ की धूम्र सीधे हमारी रक्त-वाहिकाओं में उतर कर शोधन कार्य प्रारंभ कर देती है और इस तरह हमारे शरीर की नीरोगता में वृद्धि करती है और शारीरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को बलिष्ठ बनाती है.
विशेष रूप से कोरोना जैसे वायवीय रोगाणु का नाश करने के लिये सामान्य यज्ञ समिधा -अगर, तगर, जटामासी, हाऊबेर, नीम छाल, कड़वी बछ, तुलसी, गिलोय, कालमेघ, आंवला, भुई, जावित्री, जायफल, नागरमोथा, आज्ञाघास, कपूर, लौंग, देवदार, सफ़ेद चंदन, तुलसी, शीतल चीनी, दारुहल्दी आदि के चूर्ण-मिश्रण को घी में मिला कर बनाई जाती है. यह वह औषधियुक्त हवन सामग्री है जो कि मन्त्रों के साथ आहुति देने पर दुहरा प्रभाव दिखाती है. और इसका धूम्र घर से बाहर भी आसपास के घरों का वातावरण शुद्ध और निरोगी बनाता है. प्राचीन भारतीय समाज में गृहस्थ लोग अपने दिन का प्रारम्भ यज्ञ-हवन और अग्निहोत्र के साथ करते थे.

दिल्ली एनसीआर में स्थित इंदिरापुरम (अहिंसाखंड-2) की हमारी बहुमंजिला अट्टालिका जीसी सेंट्रम में भी आज यज्ञ का आयोजन किया गया. श्रीमती संगीता सक्सेना और उनके पति शलभ सक्सेना द्वारा आयोजित यह यज्ञ न केवल हमारे भवन के चारों तरफ के वातावरण की शुद्धि का कारण बना, अपितु आसपास के भवनों के लोगों के लिये प्रेरणा का विषय भी बना कि कोरोना का संहार करने का सर्वोत्तम धार्मिक माध्यम यज्ञ है जो हमारे पास सरलता से उपलब्ध है. इसके लिये हमे किसी डॉक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं है, न ही किसी फंगस स्पेशलिस्ट अथवा ऑक्सीजन सिलेंडर, कन्संट्रेटर या प्लाज्मा ढूंढने की कोई जरूरत है. यज्ञ कीजिये और अपने वातावरण के साथ शरीर को भी नीरोग रखिये.
हर्ष का विषय है कि यज्ञ अनुसंधान वैज्ञानिक अध्यात्म की एक शोध शाखा है. यदि आप इस विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहें तो ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान (हरिद्वार) से प्रकाशित पुस्तक ‘यज्ञ-चिकित्सा’ का अध्ययन कर सकते हैं.

(पारिजात त्रिपाठी)

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