Indian Women: नकल पर आधारित नहीं होना चाहिये भारतीय नारी का सौन्दर्यबोध

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नारी की सुंदरता और पुष्प दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं. ऐसा इसलिये है क्योंकि पुरूष को कठोर और नारी को कोमलता का प्रतीक माना जाता है. ईश्वर ने नारी अस्तित्व की संरचना ही कुछ ऐसी की है कि वह कोमल हृदय स्वामिनी होने के साथ-साथ कोमलांगी भी है. एक पुष्प की भाँति कोमल होती है नारी और जब वह उन्हीं सुंदर फूलों का श्रृंगार करती है तो उसकी सुंदरता अनुपम कहलाती है या यूँ कहें कि उसकी सुंदरता में चार चाँद लग जाते हैं.
हमारे भारतवर्ष का प्राचीन इतिहास इसका साक्षी रहा है . हिंदू रानियाँ पुष्पों से अपनी केश-सज्जा किया करती थी. उनके सुंदर कुंतलों में फूल भी सुसज्जित होकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती. नारी-सौन्दर्य का बखान हमारे राष्ट्रीय कवि दिनकर, प्रसाद, रसखान,विद्यापति की रचनाओं में देखने को मिलता है. जयशंकर प्रसाद की इस रचना के नारी के कोमल सौन्दर्य का परिचय मिलेगा जिसमें सुंदर काव्य-शब्दों की शोभा देखते ही बनती है.
फूलों की कोमल पंखुडियाँ
बिखरें जिसके अभिनंदन में।
मकरंद मिलाती हों अपना
स्वागत के कुंकुम चंदन में।
तब के और अब के समय में ज़मीन-आसमान का अंतर आ गया है. पहले महिलाएँ प्राकृतिक चीज़ों का उपयोग करके अपने सौन्दर्य को निखारा करती थी वहीं आज की नारी कृत्रिम वस्तुओं पर अत्यधिक निर्भर रहती है.
मतवाली सुंदरता पग में
नूपुर सी लिपट मनाती हूँ।
लाली बन सरल कपोलों में
आँखों में अंजन सी लगती।
कुंचित अलकों सी घुंघराली
मन की मरोर बनकर जगती।
जहाँ प्राचीनकाल में सुंदरियाँ पुष्पों के साथ बिंदी,अंजन,लाली, कंगन, पायल, झुमके जैसे आभूषणों का वरण कर अपने रूप की आभा बिखेरती थी वहीं आज के युग की नारी इतनी आधुनिक हो गई है कि उसने इन सभी संसाधनों का परित्याग कर दिया है और साथ ही संस्कार, रीति-रिवाज़ों के नाम पर जानकारी और ज्ञान लेष मात्र भी नहीं. पारंपरिक तरीके से सुसज्जित बस अब वे किसी विशेष अवसर पर ही होती हैं. बाकी समय ये करना उनके लिए लज्जा का विषय होता है या बैकवर्ड होना कहलाता है.
इसका एक कारण पाश्चात्य परिधानों का हमारे कल्चर में प्रचलन बहुत आम हो गया है. अब हमारी बेटियाँ सलवार-कमीज़ या साड़ियाँ पहनना नही चाहती. किसी विशेष परिधान को पहनना और अपने दैनिक जीवन में शामिल करना बुरा नही पर अपने धर्म और संस्कृति की प्राथमिकता और झलक आपके व्यक्तित्व में अवश्य नज़र आनी चाहिए.
चंचल किशोर सुंदरता की
मैं करती रहती रखवाली।
मैं वह हलकी सी मसलन हूँ
जो बनती कानों की लाली |
आपको स्मरण हो तो शकुंतला, सत्यवती सभी वन्य कन्या थीं. उनके अद्भुत रूप का वर्णन हमारे साहित्यिक ग्रंथों में है. ये भी पुष्पों से अपनी साज-सज्जा किया करती थीं. भारतीय परिधानों में उतनी ही सुंदर और आकर्षक लगती थीं जितनी कि चंद्र की सोलह कलाएँ.
कहने का अर्थ ये नही कि आज की नारी को भी फूलों से सज-धज कर बैठ जाना चाहिए. आज की नारियों का कार्य क्षेत्र स्कूल, दुकान, आफिसों ,मॉल, अस्पताल आदि है जहाँ उन्हें फॉर्मल तरीके से प्रज़ेंट होना पड़ता है. महिलाओं का सोलह-श्रृंगार हमारी पुरातन हिंदू संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है जो आजकल प्राय: लुप्त होता जा रहा है. प्रश्न ये भी है कि यदि हम सचमुच अपनी सनातन संस्कृति के सच्चे सिपाही हैं तो हमें इसे जीवंत रखने के प्रयास अवश्य करने चाहिए.
थोड़ा मुद्दे से अलग होकर नेपाल के विषय में कुछ जानकारी देखें. नेपाल एक हिंदू राष्ट्र है जबकि अभी उसे ये मान्यता नही मिली है परन्तु यहाँ की नब्बे प्रतिशत जनता हिंदू है. हिंदू धर्म को मानती है. यहाँ आपको पग-पग पर मंदिर दिखेगें जो यह सिद्ध करता है कि हिंदू देवी-देवताओं की पूजा यहाँ की जाती है. यहाँ बच्ची से लेकर, नवयौवना और वृद्धा सभी नित्य मंदिर जाती हैं. ये यहाँ का कल्चर है. अब मुद्दे की बात पर आते हैं और आपको बता दें कि इस देश में आज भी हमारी प्राचीन हिंदू सभ्यता और संस्कृति की झलक आपको देखने को मिलेगी. यहाँ के गाँवों से लेकर राजधानी काठमांडू में भी ये दृश्य आपको दिखेगा. ये महिलाएँ ब्रह्म मुहुर्त में उठकर अपने आराध्य की अर्चना करती हैं.
अपने घर के मुख्य द्वार पर अंधेरे मुँह दीपक जलाती हैं ताकि उनके घर में माँ लक्ष्मी विराजमान रहे और घर में सुख-समृद्धि बनी रहे. ऐसा हमारी नानी-दादियाँ भी किया करती थीं.
सुबह-सवेरे मंदिर जाकर पूजन-वंदन करने के उपरांत ये लड़कियाँ और महिलाएँ अाराध्य पर अर्पित पुष्प को आशीर्वाद स्वरूप अपने केशों में धारण करती हैं. ये देख कर थोड़ी हैरानी हुई परंतु काफी प्रभावित हुई ये देखकर. यहाँ आप हर उत्सव और धार्मिक अनुष्ठानों में महिलाओं को हिंदू धर्म से जुड़े नियमों का पालन करते देखेगें जिसमें बाध्यता नही अपने धर्म के प्रति आस्था और सम्मान का भाव दिखता है. मस्तिष्क पर सिंदूर घी से निर्मित टीके के साथ अक्षत और सभी पूजन प्रावधानों का अनुसरण करते हुए बालों में पुष्प को प्रसाद स्वरूप धारण करने मेंं झिझकती नहीं ये बालाएँ बल्कि गर्व महसूस करती हैं. ऐसी आधुनिकता और संस्कारों का संगम कहीं और नही देखा अब तक. साथ तस्वीर शेयर की है ताकि आपको भी भरोसा हो जाए.

इससे ये बात पूर्णत: सिद्ध होती है कि “आधुनिक रहें विचारों से मगर बंधे रहे संस्कारों से”….

पीयूष-स्रोत-सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में।
हमें भी इससे सीख लेनी चाहिये. ये भी एक प्रयास है अपने हिंदू धर्म व संस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत रखने का जो आवश्यक भी है. वरना आज के युग में सब कुछ शॉर्ट कट हो गया है. त्योहारों की मिठाई से लेकर रीति-रिवाज़ तक सब कुछ सिमटता जा रहा है. नई पीढ़ी के लिये सिर्फ तस्वीरों के अवशेष मात्र रह जाएगें. फिर कहानी होगी हर एक की ज़बानी…. “Once Upon A Time There Was…. ” ऐसा हो उससे पूर्व हमें जागना होगा….
मैं उसी चपल की धात्री हूँ
गौरव महिमा हूँ सिखलाती।
ठोकर जो लगने वाली है
उसको धीरे से समझाती।

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