Rudali : जानिये क्या है रुदाली

रुदाली क्या है- जो नहीं जानते पर उन्होंने यदि रुदाली नाम की एक दो दशक पूर्व की एक फिल्म देखी है तो उनके मस्तिष्क में यह शब्द एक चित्र उभार देता है काले कपड़े पहने एक रुदाली का जिसकी भूमिका निभाई थी डिम्पल कापड़िया ने 

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रूदाली सामाजिक तौर पर बहुत जाना-पहचाना सा शब्द नहीं है. कारण ये है कि आधुनिकता का पथिक वर्तमान भारत कई पुरानी परंपराओं को भूलता जा रहा है और कई को भूल चुका है. रुदाली एक परंपरा भी है और प्राचीनकालिक जन-व्यवसाय भी जो अब समाप्तप्राय ही माना जा सकता है.
जो लोग रुदाली का परिचय जानते हैं उनके लिये तो रुदाली के विषय में कुछ बताना आवश्यक नहीं है परंतु जो नहीं जानते हैं और उन्होंने यदि रुदाली नाम की एक दो दशक पूर्व की एक फिल्म देखी है तो उनके मस्तिष्क में यह शब्द एक चित्र उभार देता है.  निर्देशिका कल्पना लाज़िमी की फिल्म जिसे पद्मविभूषित लेखिका महाश्वेता देवी ने लिखा था तब से ही रूदाली शब्द यदा-कदा बोल-चाल की भाषा में प्रयुक्त होने लगा.  लोग जानने लगे कि रूदाली  का शाब्दिक अर्थ क्या है.
वैसे आम भाषा में लोग अक्सर ज़्यादा टेसुएँ  बहाने वाली औरत या लड़की को “रोवणी-रात” या “रूदाली” की उपाधि दे देते हैं परन्तु रूदाली का अर्थ इससे भिन्न  होता है. रूदाली का अर्थ  है ज़ोर-ज़ोर से छाती पीट-पीटकर रूदन करने वाली महिला. हृदय स्वयं ही “हुम-हुम” कर उठता है आपका ऐसा दिल दहलाने वाला रूदन व चीत्कार सुनकर. ऐसा नही है कि दुनिया में ऐसी औरतें नही जो सामान्य जीवन में  इस प्रकार का नाटकीय व्यवहार नही करती.  ऐसी महिलाएँ भी होती हैं.  कुछ महिलाओं में करूणा इतनी अधिक होती है कि हर छोटी बात पर उनके आँसू निकल आते हैं परन्तु वे ज़ोर-ज़ोर से रोने का स्वांग नही करती परन्तु रूदाली  का किरदार इन दोनों से भिन्न  है.

रूदाली का अर्थ

रूदाली वो स्त्री होती है जो किसी के मातम में रोने के लिए भाड़े पर बुलाई जाती है.  जिसमें दर्द  का एहसास नही बस रूदन व क्रंदन होता है. बिना ग्लीसरीन  का प्रयोग किये ये घंटों  रो लेती हैं छाती पीट-पीटकर. मृत व्यक्ति के अंतिम संस्कार होने  तक ये दर्दनाक स्वर में दहाड़े मार-मारकर रोती हैं जो संवेदना रहित परन्तु डरावना दृश्य उपस्थित करता है.

रूदाली  का इतिहास 

रूदाली का इतिहास लगभग 200 साल से भी अधिक पुराना व राजस्थान  की पृृ्ष्ठभूमि से जुड़ा है.  राजस्थान के जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर तथा सीमा से लगे इलाकों में राजे-रजवाड़े और ज़मींदार (राजपूत) बसते थे. उनके घरों में पुरुष सदस्य की मृत्यु पर रोने के लिये रुदालियों को बुलाया जाता  था.  शोक का यह नाटकीय कार्यक्रम बारह दिनों तक चलता है. एक और बात है कि इन रूदालियों द्वारा जितना अधिक रूदन किया जाता है उनके किरदार  की नाटकीयता  उतनी  सार्थक होती है और पैसे वसूल हो जाते हैं.  ऐसे संवेदनशील  अवसर पर इस प्रकार का स्वांग  बेहद अजीब  लगता है पर राजस्थानी रजवाड़ा  खानदानों का यही इतिहास  रहा है.
हालांकि  अब लोग साक्षर हो रहे हैं और जागरूक  भी तो अब इस प्रकार की नाटकीयता और मूर्खतापूर्ण परंपराओं से लोग परहेज़  करने लगे हैं. हिंदू  धर्म में अंत्येष्टि के उपरांत के कार्यक्रम लोग-बाग  अब शांतिपूर्ण  ढ़ंग  से करने लगे हैं.  कॉपियों पर राम-राम लिखना और गीता पाठ किया जाता है ताकि दिवंगत आत्मा को शांति  मिले.  परन्तु ये प्रथा अभी पूरी तरह से  प्रतिबंधित नही हुई है पर बहुत हद तक कम अवश्य हुई है.

मनहूसियत की प्रतीक

रूदालियों  के इस व्यवसाय पर उनका जीवन-यापन  निर्भर करता है.  लोप होती इस प्रथा  के कारण उनके पास  और कोई विकल्प नही. अक्सर  विधवाएँ ही रूदाली  की भूमिका  में देखी जाती हैं या पति साथ नही रहते.  ये अपने बच्चों  का पालन-पोषण स्वयं ही करती हैं. इन्हें गाँव के बाहर बसर करना पड़ता है,क्यूँकि इनको ” मनहूस”  समझा जाता। है.  एक प्रकार से अच्छा  भी है इस दम तोड़ती  प्रथा का अंत हो जाना परन्तु सरकार को इनके भरण-पोषण हेतु कोई ठोस  कदम  अवश्य ही उठाना चाहिए.

शोक संतप्तता  और दृश्य वैचित्र्य

कुछ लोगों  का मानना है कि साक्षरता बढ़ने  के साथ  अब रूदालियाँ नज़र नही आती परन्तु राजस्थानी संस्कृति में रंगों और खान-पान , वस्त्रों की सुंदरता  के साथ-साथ मृत्यु पर रूदालियों के स्वांग  काफी विचित्र दृश्य को प्रस्तुत करता है जो उनके लिये तो स्वाभाविक है जो इससे परिचित हैं परंतु प्रथम बार देख रहे किसी भी दर्शक के लिये ये दृश्य बहुत अजीब सा होता है. अमीर परिवारों  में पुरूष सदस्य की मृत्यु पर बुलाई जाने वाली  रूदालियों को  रोने के लिए ही बुलाया जाता था ताकि परिवार  की औरतों को शोकाकुल दिखने की मजबूरी से  बचाया जा सके और शोक-संतप्तता भी कायम रहे.

विदेशों का रूदाली इतिहास 

 कितना  दकियानूसी रिवाज़  है परन्तु आपको ये बता दें कि इस प्राचीन परंपरा से विदेश भी अछूता  नही है. 19वीं शताब्दी में यूरोप में किराए पर लोग बुलाकर शोक मनाने का रिवाज़ था. रुदालियों का इतिहास हमारे देश के साथ-साथ  विदेशों से भी जुड़ा  है.  इनमें अफ्रिका, मिस्र, ग्रीस, रोम,चीन और एशिया के कुछ अन्य देश भी शामिल  हैं.

धर्म-ग्रंथों और कहानियों में मिलता है इनका उल्लेख 

ऐसा इस आधार पर कहा जा सकता  है क्योंकि विदेशी ग्रंथों विशेषकर क्रिश्चियन धर्म-ग्रंथों में इन रूदालियों के होने की बात कही गई है. शेक्सपीयर की कथा-कहानियों  में भी इनका ज़िक्र है.  सुप्रसिद्घ कवयित्री महाश्वेता  जी की कहानियों में निचले और पिछड़े वर्ग की महिला-दशा का चित्रण तो है ही, इन रूदालियों के जीवन-शैली का भी उल्लेख मिलता है.

काले रंग को मनहूसियत का प्रतीक बनाना अनुचित 

 शिक्षित लोग अब इस नौटंकी रिवाज़  से पलायन  करने लगे और काले कपड़े तथा मौन से शोक व्यक्त करने लगे हैं शोक जितना सामान्य हो उतना शालीन है.  मौन  ही उत्तम है परन्तु इसके लिए काले रंग को शोक का प्रतीक  बनाना भी उचित नही.  राजस्थान में रूदालियाँ काले कपड़े पहन कर शोक मनाने जाती हैं जबकि रंगों का कार्य जीवन में उर्जा  का संचार  करना होता है . शायद यही वजह है कि हमारे हिंदू समाज में उत्सव और विवाह जैसे मंगल कार्यों में महिलाएँ जल्दी काले वस्त्र नही पहनती इसे अशुभ माना जाता है तो कहीं न कहीं ये मान्यता भी रूदाली  इतिहास  से ही प्रभावित  है.

दम तोड़ती रूदाली प्रथा और उनका भविष्य 

रुदालियों का महत्व अब दिन ब दिन कम होता जा रहा है.  इनके भविष्य  पर सवालिया  निशान  लग रहे हैं.  मान्यता  है कि रुदाली महिला से जन्मे बच्चे को सिर्फ माँ का नाम मिलता है. पिता का नाम न मिलने के कारण इनको हेय दृष्टि से देखा जाता  है. इनकी बेटियों  को अच्छी शिक्षा ग्रहण करने की अनुमति नही मिलती.  इनके साथ  दुर्व्यवहार  और भेद-भाव होता है.  रूदालियों का उच्च व कुलीन वर्ग के ठेकेदारों द्वारा शोषण भी होता है वहीं सवेरे-सवेरे इनका चेहरा देख लेना अशुभ माना जाता है. बताईये भला  जिस ईश्वर  की हर रचना इतनी सुंदर है तो कोई मनुष्य मनहूस  कैसे हो सकता है. हालांकि अब कुछ रूदालियाँ  पतन की कगार पर  झूलते इस पेशे को छोड़ खेती-बाड़ी करने लगी हैं.  इन्हें भी अधिकार  है एक सुंदर और बेहतरीन  जीवन को सुरूचिपूर्ण ढ़ंग  से जीने का.

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