सावधान : कहीं ऑक्सीजन की कमी का कारण आपका मास्क तो नहीं?

ये सवाल न तो बेवकूफी भरा है और न ही ये वो सवाल है जो आज पैदा हुआ है, इस पर लगातार सोचा गया है लेकिन कहा कुछ भी नहीं गया..यदि सवाल गलत है तो सोचा क्यों जाता है इस पर?

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सोचियेगा जरूर इस बात पर. सोशल मीडिया रक्षक है देश का और देश के नागरिकों के जीवन का भी. इसने फिर से एक पोस्ट के माध्यम से कोरोना अटैक के इस दौर में भारतीयों के लिये अपनी जिम्मेदारी निभाई है और एक विचार पेश किया है. इस विचार ने बड़े-बड़ों के कान खड़े कर दिये हैं. आपको भी पढ़नी चाहिये ये पोस्ट: 
कहीं आकस्मिक ऑक्सीजन की कमी का कारण ‘मास्क’ तो नहीं । कहीं इस एक जानकारी के अभाव में ही तो नहीं एक साल से अंधेरे में मर रहे हैं सभी।
सोशल मीडिया पर बहुत से जिम्मेदार लोग और डॉक्टर्स भी हैं — इसलिये इस विचार को हल्के में लेने का कोई कारण नहीं है.
लोगों से एक सीधा सा सवाल है — जो वैज्ञानिक तोर पर सही हैं या नहीं — पता नहीं — पर दमदार जरूर हैं…
-इंसान को दिन भर में 550 लीटर ऑक्सीजन की जरूरत होती है जो वो प्राकृतिक तरीके से लेता है…
-मास्क का अवरोध लगने से वो 250-300 लीटर ही ले पा रहा है…
-जब कार्बन डाई ऑक्साइड जो हवा में घुलनी चाहिए थी वो वापस उसके lungs सिस्टम में जा रही है, क्या इसी कारण ऑक्सीजन की जरूरत तो नहीं पड़ रही??
-कोरोना पिछले साल भी था, मास्क पर बंदिश ज्यादा नहीं थी, मास्क की बंदिश ज्यों ज्यों बढ़ती गयी, ऑक्सीजन कम होती गयी और लोग खुद की ही कार्बन डाई ऑक्साइड से मरने लगे।
-वायरस, बैक्टिरिया क्या मास्क के छेदों से भीतर नहीं घुस सकते — जिसे लगाने के बाद भी बदबू/खुशबू तक हम महसूस करते हैं।वायरस तो बहुत छोटा सा है।
-कहीं ये विदेशी माफिया का फैलाया हुआ जाल तो नहीं है — जिसमें भारत जैसे देश के गरीब लोग उलझ गए हैं??
-मास्क भीड़ में, एक दो घण्टे के लिए ठीक हो सकता है पर 8 घण्टे, 12 घण्टे तो lungs में ऑक्सीजन कम करेगा ही करेगा और कार्बन डाई ऑक्साइड फेफड़े खतम कर देगी…
-विश्व के कई देशों ने मास्क को आवश्यकता की प्राथमिकता से हटा भी दिया है…
प्रश्न कई हैं, जवाब कोई नहीं है — क्योंकि जिम्मेदार कोई नहीं है — सब भेड़ चाल में जनता को मौत के मुंह में डालते जा रहे हैं, इतना छोटा सा प्रश्न तो हम 5 क्लास में ही पढ़ चुके थे कि हम ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ते हैं, क्या ये साधारण बात हो तो कहीं मौत का खेल नहीं खेल रही…!!
-जितनी ऑक्सीजन हम मास्क से जबरदस्ती खींच पा रहे हैं — जब छोड़ते हैं तो कार्बन डाई ऑक्साइड पसीने/पानी के रूप में खतरनाक रूप से नाक/मुंह पर जम जाती है… सोचिए फेफड़ों का क्या हाल होता होगा…
“कृपया आप जिम्मेदार लोग उचित स्तर व उचित मंच पर ये प्रश्न पहुंचाए और मानवता की रक्षा करें”
कानून, विज्ञान सदा सही ही होता हो ये सम्भव नहीं, रेमडीसिविर में भी कुछ यही खेल हो रहा है… ज्यादातर मौतें हॉस्पिटल में ही हो रही हैं, घरों में नहीं।
रिसर्च इस पर भी हों कि जो ऑक्सीजन के लिए भाग रहे हैं उन लोगों ने कितने घण्टे से मास्क लगा रखा था…
ऐसा नहीं है कि बीमारी है ही नहीं पर उसे ‘पेंडेमिक’ कहीं हम ही तो नहीं बना दे रहे।
लिफ्ट रुकते ही आपका दम बिना मास्क ही घुटता है, बंद कार में आपका दम घुटता है तो मास्क में क्यों नहीं घुटता होगा???

 

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