ओ मेरे सहचर!

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हाँ, होता है ऐसा रोज ही
देखती हूं उसे हँसते हुए मुझ पर
उभर आता है एक चेहरा वही
मेरी आँखों में अक्सर
मेरे न चाहते हुए भी
शामिल हो जाता है मेरी प्रार्थना में
प्रयास करती हूँ न रहे वो
मेरे आसपास
लेकिन बस गया है वो मेरी आत्मा में
शायद मुझसे भी मेरे बहुत पास
कुछ भी नहीं होता मेरा उसके बिना
मेरे हर काम में जीता है वो
जैसे कोई जागता सा सपना हो
मेरे घर में आंगन में
तीज त्योहार पूजा पाठ में
रहता है वो मेरे साथ में
कहती हूँ कि चले जाओ
क्यों चले आते हो
चाहती हूं वो कुछ बताये
मुझ पर न हंसे
मुझे न रुलाये
पूछा है मैने अक्सर
अब क्या चाहते हो
फिर वही बात कुछ नहीं
हाँ, उसके पास जवाब कुछ नहीं
जानती हूँ मैं कि वो
क्या सोचकर हँसता है मुझ पर
बड़ा अभिमान था जिसे
अपनी दृढ़ निष्ठा पर
अपनी बौद्धिकता पर
जीवन मूल्यों पर
और अपनी नैतिकता पर
किन्तु कदाचित नष्ट कर दिया
मैंने बस कल्पना में लाकर
अपनी गहन निशा में
वो जाज्वल्यमान दिवाकर
अब नहीं रही शेष मोहरात्रि
शेष है बस अवशेष
यथार्थ के पथ पर
अंतहीन यात्रा और
किंकर्तव्यविमूढ़ बेबस
मैं एक यात्री !!

– रूपम मिश्रा
(गोरखपुर)

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