कसक

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निशा का बयालीसवा जन्मदिन था, वह मंदिर जाने के लिए तैयार हो रही थी ।उसने अपनी मां की साड़ी पहनी, बड़ी सी बिंदी लगाई और अपने छोटे बाल खींचकर मां की तरह जुड़ा बनाया ।जब आईने में देखा तो लगा मां सामने खड़ी है ,लेकिन उदास लग रही थी ।निशा भी तो मुस्कुरा नहीं रही थी।

मां बयालीस साल की थी जब उनकी मृत्यु हुई थी ।निशा की पंद्रह दिन बाद शादी थी ।उसी दिन पिताजी गहने लेकर आए थे, ना जाने लुटेरों को कैसे भनक लग गई, रात को घर में घुस आए।
निशा ,उसके पिता और दादी को रस्सी से बांध दिया और मां को बंदूक दिखाकर तिजोरी में से गहने निकालने के लिए कहा। गहनों का डब्बा निकालकर, सीने से लगा मां ने साफ कह दिया वह गहने नहीं देंगी। निशा और उसके पिता चिल्लाते रह गए ,” दे दो गहने जान से अधिक कीमती नहीं है ।”

लेकिन माँ नहीं मानी, छीना झपटी में गोली चली और मां घायल हो गई ।गोली की आवाज सुनकर पड़ोसियों ने शोर मचा दिया, दरवाजा पीटने लगे तो चोर घबरा कर भाग गए ।मां चल बसी नि,को उन गहनों से नफरत सी हो गई ।वह उन्हें हाथ भी नहीं लगाना चाहती थी। लेकिन दादी ने समझाया,” इन गहनों को बचाने के लिए बहू ने जान गवा दी और तू अब इन्हें ले जाना नहीं चाहती ।पहले ही तेरा बाप इतना दुखी है दूसरे कहां से बनवा कर लाएगा ?”शादी चार महीने बाद हुई, लेकिन निशा के दिल में हमेशा कसक रही मां होती तो कुछ और बात होती।

निशा को नियति की इस नाइंसाफी पर बहुत गुस्सा आता । उसको लगता मां को और जीना चाहिए था, जब तक सारे बाल सफेद नहीं हो जाते ,कमर झुक नहीं जाती ।अगर मां होती तो नाती पोतों को खिलाती। पिता को इतना अकेलापन नहीं महसूस होता ।इतने सालों बाद भी उसे लगता मां को यह बताना था ,वो पूछना था ,यह दिखाना था ।

निशा ने अपनी शादी के गहनों में से पहली बार सोने की चेन निकाल कर पहनी। उसे महसूस हुआ वह बदल गई है, बालों में इधर-उधर से झांकती सफेदी, गंभीरता ओढ़े चेहरा, लगा वह अपनी मां बन गई है ।जिंदगी के नए पडाव में प्रवेश कर रही थी। अब वह अपनी मां से बड़ी होती जाएगी, उसके दिमाग में तो मां की बस अब तक की छवि अंकित थी।

इस बात पर उसे हंसी आ गई ,तो देखा आईने में खड़ी मां भी हंस रही थी ।उसे महसूस हुआ वह पागल थी, मां तो हमेशा उसके अंदर ही जीवित थी ।वह अपनी मां की तरह काम करती और सोचती थी। मां की बढ़ती उम्र ,बालों का सफेद होना, चेहरों का झुर्रियों से भरना ,वह सब देखेगी और महसूस भी करेगी स्वयं के माध्यम से।

(सीमा जैन)

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