कहानियाँ भी रुलाती हैं !

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हाथ हटाइये ! …..मैंने कहा मेरी थाई से हाथ हटाइये …बुढ्ढे ..खूंसट !

उसने घृणा से मेरे चेहरे को देखकर …मेरा हाथ अपनी जाँघों से झटक दिया …बस मैं ऐसा कोई नही था …जिसकी थूथकार मेरे चरित्र पर न गिरी हो ….

मेरे कुछ बोलने अथवा प्रतिक्रिया देने से पहले ही बस.. ..बस -अड्डे पहुँच गई …सभी यात्रीगण उतर कर अपनी -अपनी मंजिल को लौट गए …..!

मैं अशोक वर्धन अब भी उसी बस मैं बैठा हूँ …क्यूँकि चाहकर भी मैं उससे उतर नही सकता …वो लड़की यही कोई 16-17 साल के बीच की रही होगी ….मेरी पोती श्रद्धा भी इतनी ही बड़ी है ,, बस खाली हो चुकी है …बस कंडेक्टर और ड्राईवर भी मेरी चुप्पी और खमोशी से ये समझे की बस में अब कोई नही ….रात का तीसरा पहर है ,,पीछे से एक आगे वाली सीट पर बैठा हूँ …जहाँ सिर्फ अँधेरा है घना अँधेरा ..।।।

मेरे दो जिन्दा पुत्र है , अमित वर्धन और सुमित वर्धन …इनको जनने वाली अब से दो बरस पहले कुत्ते की मौत मर गई ,,, जब तक उसका दम सरकारी हस्पताल में न निकला …तब तलक मैंने चैन की साँस न ली …उसके मरते ही ,,, मैंने अपने बेटे के ड्रायर से रात को एक व्हिस्की की बॉटल चुराई और अपने जीवन साथी के लौट जाने का जश्न मनाया ।।।

दो पैग में ही आदमी औकात से आगे निकल गया …और जहाँ खड़ा था वहीँ उल्टी करने लगा ,,, और उसी में गिरकर -घिसकर आँख लग गई .. सुबह अमित ने बड़ी बेइज्जती करके जगाया ..और कहा –

” शर्म करो बाबूजी ..शर्म करो …आप तो कहते थे कि आपने कभी शराब को हाथ नही लगाया …आपसे बड़ा ढोंगी और बेशर्म कोई नही देखा… नीचे अम्मा की मृत देह लगी है और आप यहाँ …. …आप तो अध्यापक रहें है …क्या यही शिक्षा दी बच्चों को आपने ….? ”

शिक्षा… जैसा घण्टा भी कोई शब्द नही होता ,,,अध्यापक हूँ ..और अपने सम्पूर्ण शिक्षक जीवन में मैंने सबसे अधिक बलात्कार इसी शब्द का होते देखा है ….. एक अध्यापक के रूप में , मैं इसलिए भी असफल रहा क्यूँकि ..मैं अपनी सन्तानों को ही शिक्षा नही दे पाया ….

देता भी कैसे …उस दौर शिक्षक बनने से पहले ही शांति जैसी देवी से विवाह हो गया ,, ..पिता जी के देहांत के बाद , अम्मा , चार बहनों और दो भाइयों की जिम्मेदारी मेरे सर आ लगी ,,, खेती -खलिहानी की ,, बताशे कोरे ,,कांधे में इमली , टॉफी , चूड़ी ,पतंग बेची ,,, और तो और लोगों के घरों में ईंटें भी चढ़ाई …पिता जी भी शिक्षक थे …उनके आदर्शों की गहरी छाप थी मुझमें ,,,वो चाहते थे कि मैं भी शिक्षक बनूँ इसलिए इस मजूरी और भागमभाग में भी मैंने पिता जी के सपने को मरने नही दिया …और आभाव , विपन्नता , संघर्ष की बलि वेदी चढ कर मैंने शिक्षक जैसा पद प्राप्त किया …लेकिन मेहनताना अब भी फ़क़ीरी था …परन्तु क्षणिक सुकून सा हो गया था….

अम्मा को यमराज ने प्राण हड़प कर निपटाया …चार बहनों को मैंने ब्याह कर ..भाइयों को पढ़ा-लिखाने शहर भेजा …कुछ बन गए तो वापिस न लौटे ….

शांति .. तीन फ़टी साड़ीयों ..में शादी के 3 साल काट गई …और दो औलादें भी जन गई ….समझती थी मुझे ,,, मैं विद्यालय तो वो खेतों में ,, मैं घर में तो वो रसोईघर में ,, मैं बिस्तर में तो वो बर्तनों के बीच …मैं बेखटक सोया तो वो उठ-उठ कर बच्चों को कम्बल ओढ़ाती …

उफ़्फ़ और शिकायत और फरमाइश क्या होती है शांति तब समझती जब उसे फुरसत मिलती …अपने खून से उसने औलादों को सींचा ,,, वो अच्छा और ताकतवर खा सके तो कंगन गिरवी रखवाकर गाय खरीद लाई मुई ….घी ..दूध ने अपना चमत्कार दिखाया …उसे बनाने वाली सूखती रही और उसे गटकने और चाटने वाले जिस्म बनाते रहे ….

बच्चों की परीक्षाओं में शांति की भूमिका और प्रभावी हो जाती …सुबह बच्च्चों को उठाना …रात उनके साथ जागना ..उन्हें पंखा झलना …कभी खिड़की के सींकचे से सर टिकाकर 10-7 मिनट की पॉज श्वान नींद ले लेना …

आज अमित और सुमित क्रमशः बैंक और कृषि विभाग में अफसर के पद पर कार्यरत है …तो बीवी भी अफसर लाये …मैं तो उनमें कुछ रत्ती भर एडजेस्ट भी कर लेता हूँ … मगर उम्र से पहले कोशों बूढ़ी और कमजोर , गंवार शांति मिसमैच कर गई …

हाँलाकि शादी के वक्त क्या अनुपम सुंदरी थी मेरी शांति …और आज उसका रूप किसी श्मशान की आधी भस्म लकड़ी सा हो गया है ….अपनी वही काम की आदत उसने बड़े घर में भी नही छोड़ी इसलिए अमित ,सुमित और उनकी पत्नियों को कभी नौकरानी की कमी महसूस नही हुई ….मैं अक्सर समझाता था उसे कि चल गाँव लौट चलते है …पेंशन बहुत है दोनों हँसते -खेलते पल जायेंगे …लेकिन उसे श्रद्धा यानि अपनी पोती का लालच कभी दुबारा गाँव से नही जोड़ पाया …श्रद्धा जब तक बच्ची थी दादी की छाती से चिपकी रहती थी …आज जब वो आधुनिक दुनिया में समाई तो दादी के फ़टे-कटे हाथों से उसे घिन आती है ….

शांति बीमार रहने लगी …हद से जियादह उसकी तबियत बिगड़ती गई …. अफसर औलादों ने उसके ईलाज का खर्चा बाँट लिया और ये इतना निकला कि उसे सरकारी हस्पताल में एक बैड मिल गया …..

जिंदगी भर घुटते -पिघलते वो मुझे आदमखोर औलादों के बीच अकेला छोड़ गई …..लेकिन मैं खुश था बहुत खुश कि उसे मुक्ति मिल गई …..

उसकी मृत्यु के मात्र दो महीने बाद मुझे पैरालेसिस अटैक पड़ा ..शरीर का दांया हिस्सा सुन्न पड़ गया …जब औलादों को मेरी पेंशन लूटने में मेरे दस्तखत की आवश्यकता पड़ी तो उन्होंने मेरा ईलाज ..मेरे ही पेंशन के जमा पैसे से करवाया ….

महज रत्ती भर फर्क पड़ा ..हिल -झूल कर थोड़ा चल लेता हूँ …लेकिन हाथ को अपनी इच्छा से अभी भी कोई हरकत नही दे सकता …

उस दिन जब शांति की बारसी पर मैंने अपने पुत्र और उनकी वधुओं को वीकेंड पिकनिक प्लान बनाते पाया …तो रोया उस दिन भी नही मैं …सिर्फ दो कुर्ते ,, शांति की तस्वीर , अपने चश्मे का बक्स , अपना तौलिया , और कुछ किताबें बैग में भरी और अपना दाहिना हाथ , बांये हाथ से पकड़ कर अपने उस कुर्ते की जेब में डाला जो कभी भी फट सकती थी …उसके बाद चुपके से मैं उस नर्क से बाहर निकल आया …

बस में बैठा था …तभी एक प्यारी बच्ची मेरी बगल में आ बैठी …श्रद्धा की छवि उसमें नजर आई …लेकिन रास्ते भर अंदर ही अंदर रोता रहा और खिड़की से बाहर देखता रहा ..तभी मेरी जेब फट गई और मेरा दांया हाथ उस बच्ची की जाँघ पर चला गया …उसने उसे उठाकर झटक दिया लेकिन मुझे तब पता चलता जब उसमें जान होती …फिर वो हाथ फिसल कर उसकी जांघ में चला गया …..

हाथ हटाइये ! हाथ हटाइये …बुढ्ढे ..खूंसट …!!!!!!!

खैर अब कुछ नही बचा खोने को तो अब बस से नही बस जिंदगी की नैय्या से उतरना चाहता हूँ ….शांति हाथ दे रही है …वो नवेली दुल्हन सी नजर आ रही है ….मेरे बाबूजी …मेरी अम्मा भी उसके साथ है …मेरे दिल ने मेरी तड़प और उनसे मिलने की प्यास को इस बार अनदेखा नही किया और एक आखरी धड़कन मेरे दिल से होकर गुजरी और मैं स्वयं से मुक्त हो गया … ……

– जुनैद रॉयल पठान
(रानीखेत)

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