बिन किये करै सो सूरमा..

(अभिनंदन शर्मा)

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“हाँ, संभव तो है | तुम भी इसका प्रयोग कर के देख सकते हो | तुम्हारे घर में यदि कोई बीमार हो, गंभीर रूप से बीमार हो तो जो भी प्रियजन हैं, यदि वो जल को हाथ में लेकर (जल को साक्षी मानकर) संकल्प करें कि हम अपने जीवन में अर्जित आधे अथवा पूरे पुण्यों का फल, इस बीमार व्यक्ति को देते हैं, तो उस व्यक्ति के स्वास्थ्य में सुधार आ सकता है, बशर्ते कि उसकी मृत्यु न आ गयी हो | यदि उसकी मृत्यु ही आ चुकी है तो फिर उसे कोई नहीं साध सकता किन्तु यदि अभी मृत्यु नहीं आई है और बीमार व्यक्ति कष्ट में है (ऐसे रोग को ज्योतिष में कष्टसाध्य कहा जाता है) तो ऐसा अवश्य हो सकता है कि देने वाले कि पुण्य कर्मों के फलों के दान से, बीमार व्यक्ति स्वस्थ हो जाए |”

“इसी संकल्प शक्ति से ययाति के पुत्र ने ययाति को, अपनी जवानी दे दी थी | (१*) इसी तेज बल की संकल्प शक्ति से, शैव्या ने सूर्य को रोक दिया था (२*)| इसी तेज के बल से, बहुत से दानियों ने, जाने कितने लोगों को संकल्प करके, अपने तेज का दान दिया है | जब आप किसी वैद्य के पास जाते हो, तो बहुत बार सुना होगा कि फलाने वैद्य के हाथ में बड़ा शफा है | उसकी दवाओं में बड़ा असर है | बहुत से डॉक्टर फेमस होते हैं और बहुत से फेमस नहीं हो पाते हैं क्योंकि कुछ डॉक्टरों के मरीज, जल्दी ठीक हो जाते हैं | दवाओं में उतना असर नहीं होता है, जितना देने वाले के हाथों में होता है | इसीलिए आयुर्वेद में, औषधि देने से पहले, ईश्वर से प्रर्थना करने का नियम भी है | सिर्फ दवाओं से पेशेंट ठीक नहीं होते | एक ही दवा, एक ही बीमारी के सभी पेशेंट्स को ठीक नहीं कर सकती | दवाओं के आलावा, जो दुआएं होती हैं, वो दुआ क्या है ? आपको अपने तेज का दान देना है |”

“इसी तेज से देवताओं में वरदान देने और शाप देने का बल होता है | इसी तेजबल से, ऋषि वरदान और शाप दे सकते हैं | हर कोई ये नहीं कर सकता, सिर्फ वो ही कर सकता है, जिसके पास इतना तेज हो | यदि तेज अधिक हो तो आप पत्थर में भी फूल उगा सकते हैं | नारियल से भी सृष्टि कर सकते हैं (विश्वामित्र) | क्योंकि आज के मनुष्य में तेज नहीं होता (बहुत कम होता है,क्योंकि कोई तप ही नहीं होता) इसीलिए आजके मनुष्य की दुआओं में, असर भी नहीं होता | जब तेज अधिक होता है, तो आप शिवजी की तरह जटा को भी अलग कर दोगे तो उसमें से संतान उत्पत्ति हो जायेगी, जैसे भैरव, वीरभद्र आदि हुए | यदि तेज अधिक होगा तो आपके पसीने से ही पुत्र पैदा हो जाएगा | तेज नहीं होगा, तो आप बीमार होंगे, गरीब होंगे, मानसिक कष्ट में रहेंगे | ये सब तेज का ही फल है | तेज आता है, तपोबल से और उसके लिए बहुत भारी तप करने पड़ते हैं | योग करने पड़ते हैं | परोपकार करने पड़ते हैं | लेकिन लोग करते कुछ नहीं है, पर चाहते सब हैं |”

गीता जी एक साथ इतनी अधिक बातें कह दी कि मेरी तो समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे प्रतिक्रिया दूं | जो इन्होने बीमार व्यक्ति को तेज और संकल्प से ठीक करने वाली बात कही है, ये तो मात्र प्रैक्टिकल करके देखने से ही संभव है | हो सकता है, मुझमें अधिक तेज न हो किन्तु यदि ४-६ शुभचिंतक मिलकर, यदि इस प्रकार अपने पुण्यों के फलों का ट्रान्सफर करें, तो इस बात को चेक तो किया जा सकता है | लेकिन इनकी बातें कैसे मानूं ? ये सब गले नहीं उतर रहा था ! हनुमान जी के पसीने से पुत्र (3*) की बात तो मैंने भी सुनी है | रामायण तो बहुत पुरानी बात है लेकिन क्या ये सही में संभव है ? क्या बिना स्त्रीगर्भ के, बिना मनुष्य के मिलन से, सृष्टि उत्पन्न हो सकती है ! मुझे तो लगता है, ये असम्भव है ! पुरानी कहानियों में इतना भी क्या विश्वास करना कि किसी भी गल्प को सही मान लिया जाए !

“जी, मुझे किशोर जी ने कहा था कि यदि किसी बात से असहमति हो, तो उस पर अविश्वास बाद में करना चाहिए, पहले पूछना चाहिये | आप जो कह रही हैं, वो आज के हिसाब से असम्भव है | बिना स्त्री गर्भ के संतान उत्पन्न नहीं हो सकती है | कोई नहीं कर सकता है ! रामायण में हनुमान जी के पुत्र की जो कथा है, वो भी गल्प है, एक कहानी है | आप ऐसी अवैज्ञानिक बात को, कैसे सत्य मान सकती हैं ? मुझे तो इस बात के सत्य होने की, कोई भी सम्भावना नहीं दिखती | आप मुझे सिर्फ एक उदाहरण दें, जहाँ बिना स्त्री के गर्भ के, बिना पुरुष के कोई सजीव सृष्टि उत्पन्न हो सकती हो | मैं आपकी बात मान लूँगा अन्यथा ये सिर्फ कथा, कहानी है, ये असम्भव है और इसे नहीं माना जा सकता |”

मैं अपनी बात को जितने आराम से कह सकता था, मैंने कह दिया क्योंकि पिछली बार जब उत्तेजित होकर कहा था तो किशोर जी नाराज हो गए थे और बाद में उन्होंने अपनी बात को सत्य सिद्ध कर दिया था | अतः यहाँ मैं कोई चांस नहीं लेना चाहता था, इनको नाराज करने का |

गीता जी, मेरी बात सुनकर प्रसन्न नहीं हुई फिर भी मुस्कुराते हुए, मेरे सामने ही, उसी पलंग पर आकर बैठ गयी, जिस पर मैं बैठा था | एक अकेले कमरे में, यदि कोई स्त्री, जो देखने में, एकदम अप्सरा सी लगती हो, आपके एकदम पास आकर बैठ जाए, तो दिल जोर से धडकने लगता है | मेरा भी दिल थोडा झटका तो खाया लेकिन मैंने उसे, विषय की गंभीरता के लबादे से ढक दिया |

गीता जी, मुस्क्रुराते हुए, बड़े ही प्रेम से, बोली – “तुम अपनी नाजानकारी का ठीकरा, रामायण पर क्यों फोड़ना चाहते हो ! तुम अगर कुछ नहीं जानते हो, तो इसमें क्या रामायण का दोष है ? तेज में बल होता है, इसके कितने उदाहरण मैंने तुमको अभी तक दिए, पर तुम आसानी से मानते नहीं हो | समस्या ये है कि जिस विज्ञान की तुम बार बार बात करते हो, तुमने उसे तक ढंग से नहीं पढ़ा है | और उस अधकचरे विज्ञान के ज्ञान से, तुम शास्त्रों पर प्रश्नचिन्ह उठाते हो | तुमने अपने जीवन को कभी ढंग से देखा ही नहीं है, अन्यथा तुम ऐसी बात नहीं कहते | अच्छा, एक बात बताओ, अगर एक बोतल में आटा रख कर, उसे बंद करके १० दिन के लिए रख देंगे तो क्या होगा ?

गीता जी, ये सब बातें, बड़े ही मुस्कुरा कर कह रही थी, इसलिए बात भले कडवी थी, पर मुझे मीठी ही लग रही थी | इतनी सुन्दर स्त्री अगर मुस्कुराते हुए, थप्पड़ भी मार दे किसी को, तो शायद आदमी बुरा न माने, मुझसे तो इन्होने बस २ बातें ही बोली थी | मैंने, अपना ध्यान उनकी सुन्दरता और खूबसूरती से हटाकर, उनके प्रश्न पर लगाया |

“जी, उस बोतल में कीड़े पड़ जायेंगे |”

“अब बताओ, वो कीड़े कहाँ से आये ? कौन है माता और कौन है पिता ? किसने गर्भ धारण किया ? ये सृष्टि कहाँ से आई ?”

मैने थोडा प्रयास किया – “जी, ये तो प्रकृति है, कोई चीज सड़ जाती है तो उसमें कीड़े पड़ ही जाते हैं |”

“बिल्कुल सही | इसी को थ्योरी ऑफ़ evolution कहा जाता है | एक बंद बोतल में यदि एक स्पेसिफिक तापमान पर और आद्रता के साथ और हवा के साथ कुछ रखो तो वहां सृष्टि पैदा हो जाती है | तुम्हारे हिसाब से ये प्रकृति है, मेरे हिसाब से ये धरती, जल, आकाश, वायु और अग्नि, पंचभूत हैं | इन्हीं के तेज से, ये प्रक्रिया चलती है | इसी प्रयोग को सबसे पहले किया था, रशियन माइक्रोबायोलोजिस्ट Winogradsky ने | उसने जिस बोतल में इस प्रकार का evolution का प्रयोग किया, उसे Winogradsky coulmn (४*) कहा गया |”

मैं सोच रहा था कि मेरी बात का इस बात से क्या सम्बन्ध है ? मैं तो बात कर रहा था, मनुष्य के तेज से बच्चा पैदा होने की | यहाँ सृष्टि का सर्जन हो रहा है, बिना स्त्री-पुरुष के किन्तु वो बेक्टेरिया हैं, किसी आदमी से पैदा थोड़े ही हैं | इसका मतलब, मैं सही हूँ, आदमी से बिना स्त्री और गर्भ के सृष्टि नहीं हो सकती | आदमी के तेज से, कोई भी सृष्टि संभव नहीं है |

“जी, पर बात तो आदमी के तेज से सृष्टि पैदा होने की चल रही थी | बिना स्त्री और गर्भ के, वो तो असम्भव है | केवल मनुष्य के तेज से, मुझे लगता है कोई सृष्टि पैदा नहीं हो सकती | हनुमान जी के पसीने से, बच्चा पैदा होने की बात भी एक गल्प ही है मात्र !”

“अच्छा ! क्या तुम्हें पता है कि तुम भी बिना स्त्री और गर्भ के, मात्र अपने तेज से सृष्टि पैदा कर सकते हो ?” – ये कह कर गीता जी, फिर से मुस्कुराने लगीं |

पलंग पर वो मुझसे करीब १ हाथ की दूरी पर बैठी थी | मेरा ध्यान बार बार, बातों से हटकर उनकी मुस्कराहट पर जा रहा था |

“मैं ? कैसे ? असम्भव !”

“तुम्हें बस इतना करना है कि १० दिन नहाना नहीं है | फिर तुम्हारे अंदर जो थोडा बहुत तेज होगा, जो तुम्हारे पसीने से बाहर आएगा, उससे तुम्हारे शरीर में जुएँ पैदा हो जायेंगी | बस तुम्हारे अन्दर इतना ही तेज है | उसके लिए,न तो किसी स्त्री की आवश्यकता है और न किसी गर्भ की | वो सृष्टि, केवल तुम्हारे तेज से पैदा की हुई होगी | पुराने जमाने में, ऋषियों के पास, तपस्वियों के पास, ये तेज बहुत अधिकता में होता था, तपोबल से पैदा होता था अतः उनके पसीने में भी इतनी शक्ति थी कि उसमें से कुछ भी पैदा कर सकती थी किन्तु आज के मनुष्य के अन्दर, तेज है ही नहीं | जो है, उससे केवल कीड़े ही पैदा हो सकते हैं, मनुष्य नहीं | शिवजी जब जटा निकालते हैं तो उसमें से वीरभद्र (गण/देवता) निकलता है (5*), विश्वामित्र जब चाहते हैं तो अपने तेज से नारियल में भी प्राण डालने का संकल्प ले लेते हैं और हनुमान जी का पसीना निकलता है तो उसमें से पुत्र होता है, और तुम्हारे तेज से, कीड़े पैदा होते हैं | सिर्फ काल का ही फर्क है, जिसमें तेज, कम होता जा रहा है | तुम चाहे मानो या मत मानो, तुम्हारे मानने या न मानने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा पर देख लो, बिना स्त्री और गर्भ के भी सृष्टि होती है | इस तेज से अनेकों सिद्धियाँ होती हैं |”

“सूक्ष्म रूपधरि सियहिं दिखावा । विकट रूप धरि लंक जरावा (६*) तो यहाँ पर सूक्ष्म रूप और विकट रूप कैसे हुआ ? तेज से ! योगबल से ! ऋषि लोग अपना रूप बदल लेते थे, इसी तेज से, इसी तपोबल से | पांडु को शाप देने वाले मुनि जब पांडु द्वारा मारे गए तब वो हिरन के रूप में मैथुन कर रहे थे (७*) तो वो मनुष्य से हिरन कैसे बन गए ? इसी तपोबल से | सूर्य भगवान ने घोड़ी के रूप में अपनी पत्नी के साथ रमण किया, तो कैसे किया ? इसी तेजबल से | कश्यप ऋषि की संतानों में कभी गरुड़ पक्षीराज हो जाते हैं, कभी सर्प हो जाते हैं,कभी मनुष्य पैदा हो जाते हैं ? कैसे ? इसी तपोबल से | यही वजह है कि स्त्री के पेट से भी अंडा निकलता है, क्योंकि वो उस समय पक्षी रूप में थीं | यही वजह है कि हमारे शास्त्रों में जानवरों को बोलता हुआ दिखाया गया है क्योंकि लोग अपने शरीर को बदल सकते थे, इसी तेज से और मनुष्य वाणी में बोल सकते थे | इस तेज को प्राप्त करने के लिए, असंख्य मन्त्र जप करने पड़ते हैं, तपस्या करनी पड़ती है, योग करना पड़ता है | तुम्हें भी योगी ही होना है, यही हमारा टास्क है | यही बाबा की आज्ञा है | ” – ये कहकर वो मुस्कुराने लगीं |

मैं अपना सर खुजाने लगा कि ये पिछले २-3 घंटों से मुझे तेज के बारे में समझा रही थी | एक पूरी अनालोजी इन्होने दी, तेज के बारे में | तेज का परिक्रमा से पैदा होना, ट्रांसफर होना, उसका प्रयोग करना, उससे बीमारियों के ठीक होने की संभावना, तेज से ही मनुष्य के जीवन में ग्रोथ होना आदि | ये सब तारतम्य जुड़ता तो है | सारी बात सुनने में लोजिकल तो लगती है | उदाहरण भी इन्होने सारे, साधारण जीवन से ही दिए हैं, चाहे हो मोटर का हो या evolution का | और कोई भी बात पाप-पुण्य के किशोर जी के कांसेप्ट को भी नहीं काटती | मैं इतना सोच ही रहा था कि गीता जी, पलंग पर से उठकर, कुछ गुनगुनाते हुए, सामने लगे, शीशे के पास जाकर खड़ीं हो गयीं |..

(अघोरी बाबा की गीता से साभार)

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