यादों की बैंक का बैलेंस शीट : शादी के बाद पहला नया साल

0
861

(लघु कथा)

शादी के बाद पहला नया साल। हफ्तों पहले से न जाने क्या-क्या प्लानिंग कर ली थी मैंने। पति को सरप्राइज देना था। वैसे उस छोटे से कस्बे में ज़्यादा कुछ नहीं था करने को; फिर भी पहली तारीख को रविवार था, तो सोचा बाहर ही कहीं घूमने चलेंगे।

घुमक्कड़ी में हम दोनों का कोई सानी नहीं था, ये बात जग जाहिर थी। इनके सहयोगी कई बार हमें ताने दे चुके थे “अरे यार! तुम्हारे घर जब भी जाओ ताला ही लगा रहता है।” ये तब की बात है जब हर जेब में मोबाइल नहीं होते थे और टाउनशिप के बाहर किराए पर मकान लिया था तो हमारे पास लैंडलाइन की सुविधा भी नहीं थी। 

इकतीस दिसंबर को पतिदेव के ऑफिस जाने के बाद मैं शाम के स्पेशल खाने की तैयारी में लग गई। खाना खाने के बाद फिल्म देखेंगे मैंने मन ही मन सोचा। सीमित संसाधनों में भी खुशियों से समझौता नहीं करना है। आखिर हमारा पहला नया साल हैं। पिछले साल हमारी शादी तय हुई थी। रात ठीक बारह बजे इन्होंने फोन किया था, और हम जो बातों में लगे!!

फोन पर बार-बार बीप की आवाज़ आती और हमारी बातें ही न खत्म होती। चाचा, बुआ, मामा सबको फोन इंगेज्ड मिला और अगले दिन मेरी वो खिंचाई हुई कि पूछो मत!! ये मीठी यादें ही होती है जो हमारे जीवन को खुशनुमा बनाती है। पुरानी यादें सोच-सोच कर मुस्कुराती मैं! कब शाम हो गई पता ही न चला।

आज के दिन को भी ऐसा ही यादगार बनाना है। माँ कहती थी छोटी-छोटी खुशियां तितली जैसी होती है इन्हें सहेज कर मुट्ठी में रखा करो। ये यादें ही तो हमारा बैंक बैलेंस है। जितनी ज्यादा यादें उसके रिश्तों का भविष्य उतना ही सिक्योर।

अभी आते ही होंगे पांच बजे से हर एक गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर झांक आती। पांच के छः बजे, छः के सात। दरवाजे में घंटी बजी। थोड़ा सा गुस्से का नाटक करूँगी। ये खूब मनायेंगे फिर मानूँगी। इतनी लेट आता है क्या कोई!! नयी बीवी से इतना इंतजार कौन करवाता है!! झूठा गुस्सा लिए दरवाजा खोला।

मकान मालकिन आंटी थी। “भूमिका ये चाबी रख लो। क्लब में न्यू ईयर पार्टी है। हम जा रहें हैं। ज़्यादा रात हो जाएगी आते-आते। तुम लोग कहीं जाओ तो गेट पर अच्छे से ताला लगा कर जाना। दूसरी चाभी हमारे पास है।” आंटी की पार्टी में जाने की हड़बड़ी दिख रही थी। आँधी की तरह आयीं और तूफान की तरह निकल गई और मुझे पूरी तरह से हिला गईं।

अब मुझे सच में गुस्सा आ रहा था। अंकल रिटायरमेंट के करीब है और अभी भी ‌देखो तो बैंक से सीधे पांच बजे निकलकर घर हाजिर। पार्टी भी मनाने चले गए। और एक ये और इनका ऑफिस सिर्फ काम और काम!! अरे! एक दिन जल्दी नहीं आ सकते। घड़ी में आठ बजते-बजते मेरा क्रोध आँखों से बह रहा था। अब कब आयेंगे। कब हम स्नैक्स खायेंगे।

अब तो डिनर का टाइम हो गया। बीट की हुई काॅफी और आधे तले वड़े मुँह चिढ़ा रहे थे। भूख लगी थी पर क्रोध और क्षोभ, भूख पर हावी हो गई। साढ़े आठ बजे मैंने डी.वी.डी. ऑन किया। मन बहलाने के लिए पिक्चर ही देखी जाए। अभी बस मन थोड़ा बहल ही रहा था कि ओह! लाइट चली गई। उफ़!! लो जी हो गया सोने पर सुहागा। अंधेरे में टटोलते हुए कैंडल लाइट डिनर के लिए सजाए गए कैंडल जलाएं। कैंडल के साथ-साथ सारे अरमान पिघल कर आँसुओं के साथ बह रहें थे। बिस्तर में लेट कर तकिया भिगोती हुई कब सो गई पता ही न चला।

सुबह छः बजे के अलार्म से आँखें खुली। पास देखा तो बिस्तर खाली था। ओह अभी भी नहीं आएं। अब गुस्से ने चिंता का रुप ले लिया था। नीचे जाऊं, अंकल-आंटी से कहूं। उनके फोन से फोन करूं। सारे समीकरण लगाते जैसे ही कमरे से बाहर निकली पूरा फर्श गीली मिट्टी से सराबोर दिखा। बूट के निशान दूसरे बेडरूम में जा रहें थे। सारी हमदर्दी, प्यार अचानक से छू हो गया। गुस्सा सातवें आसमान पर था। बेड पर ये यूनीफार्म पहने ही सो रहें थे। 

मैं बाहर आ गई। अपने लिए चाय बनाई, न्यूज़ पेपर उठाया। गीज़र ऑन किया, लाइट अभी भी नहीं आई थी, झल्लाते हुए चाय का प्याला लेकर बाॅलकनी में आ गई। पेपर के पहले पेज में बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, नये साल की पूर्व संध्या में प्लांट में बड़ी दुर्घटना। १९ मजदूर फंसे, सुरक्षा बल के अधिकारी तथा जवान बचाव कार्यों में जी-जान से जुटे।

मेरी खटर-पटर सुनकर पतिदेव जग चुके थे। बाहर आते बोले, “नया साल मुबारक हो। कल मैंने इतने फोन किए आंटी ने उठाया नहीं।”

“आप कैसे हैं? वहां सब ठीक है ना! कोई कैज्यूल्टी तो नहीं हुई।” मैं अपनी नाराज़गी भूल चुकी थी।
“नहीं, हमने सबको बचा लिया। इंजर्ड है कुछ लोग लेकिन ज़्यादा सिरियस नहीं। तुम्हें कैसे पता??”
मैंने पेपर दिखाया।

“हां कल हम पांच बजे घर के लिए निकल ही रहें थे कि काॅल आई प्लांट में आग लगी है। दो घंटे में हमें लगने लगा कि एक्सट्रा फोर्स बुलानी होगी और सबको सेफ्ली निकालने में देर लगेगी। तुम्हें बताने के लिए आंटी को बहुत बार फोन किया पर किसी ने नहीं उठाया।”

“आंटी अंकल पार्टी में गए थे। मैं आपके लिए चाय बनाकर लाती हूँ।”

“तुम बैठो! मुझे जल्दी निकलना है। साल की पहली चाय हम-दोनों आधी-आधी बांट लेते हैं।” कहते हुए इन्होंने आधी प्याली से घुंट ली और मेरे बैंक बैलेंस में थोड़ी और बढ़ोतरी हो गई।

उसी साल छब्बीस जनवरी के कार्यक्रम में जब पतिदेव को गैलेंटरी अवार्ड मिला तो मेरा सर फक्र से उठ गया। मजदूरों के परिवार जनों के खुशी के आँसू, उन सबका पतिदेव के हाथों को पकड़ कर धन्यवाद देना! उनकी आँखों में उम्मीद कि जब तक सुरक्षा बल है, हमें कुछ नहीं हो सकता। मेरे यादों के बैंक में इतनी सारी खुशनुमा यादों का बैलेंस शीट बढ़ाने के लिए धन्यवाद पतिदेव।

(सोमा सुर)

सोमा सुर।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here