श्रीतंत्रालोक के अध्ययन के अनुभव एवम् विनम्र आकलन

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कौन हूँ? एक मूलभूत सार्वभौम प्रश्न है,जो हमें हर प्रकार से,हर दिशा से,हर माध्यम से;चाहे वह विज्ञान हो,दर्शन हो,शास्त्र हो,साहित्य कला हो,लोक परम्परा हो जो कुछ भी हो,उतर खोजने की प्रेरणा देता रहता है।

अपनी मातृभूमि से निष्कासन के बाद यह प्रश्न मेरे पूरे अस्तित्व में अत्यंत नुकीला,तीक्ष्ण हुआ कि इस प्रश्न की छाया में जो उपग्रह प्रश्न मेरे भीतर उभरे वे थे कि मुझे ऐसा विराट दुख मिला,इस दु:ख के निराकरण का क्या उपाय है।मैं वर्तमान में किस स्वरूप में हूँ तथा मुझे भविष्य कैसा चाहिए।

श्रीतंत्रालोक जैसे महाग्रंथ में से होकर गुज़रना प्रकाश के अछोर पुंज में से होकर गुज़रना है।इस अछोर को समझने के लिएअपने ऊपर एक शब्द भावित करना है।यह शब्द एक ऐसी कुंजी है जिससे इस प्रकाश आकाश का ताला खुलता है।यह शब्द हमारे बोध में अमृत की तरह खुलता एवं घुलता है।यह शब्द है-संविति।

इस शब्द को ऐसे पकड़ना और समझते जाना है जैसे हम जन्म के बाद अपनी मॉ का छोर पकड़े रखते हैं औरउल्लास के साथ जीवन के दु:खसुख भरे सागर में तैरने लगते हैं।इसे किसी पर्यायवाची से अर्थित नहीं किया जा सकता।अपितु यह स्वयं ही अर्थ बनकर हमारी अस्थि,मज्जा,मेद,माँस,स्नायुतंत्र और मन बुद्धि समेत सम्पूर्ण चित्ति में उतर जाता है।

धीरे धीरे विमर्श की ये रश्मियाँ हमें आह्लादित एवम् विस्मित करने लगती हैं।संवित्तप्रकाश!इसी संवित्त में प्रवेश हमारा परमलक्ष्य है।संविद्विसर्ग संघट्ट:। संविति-पराम्बा,संवित्तनाथ(संविद्वपुष)शिव।इस परम् संघट्ट के उन्मुख जब हम आते हैं,तो हमारे चित्त में सूर्योदय होता है।

वास्तव में यही द्विजत्व है।द्विजन्मता एक प्रकार का चिद्धर्म है।संवित्ति में प्रवेश के लिए किसी जाति का स्वीकार नहीं। इस बात को पूरी वैज्ञानिकता के साथ इस ग्रंथ में समझाया गया है।क्योंकि संविति को परिष्कृत करने पर मूढ़ भी शिवात्मक हो जाता है।शिवात्मक होना अत्यधिक विवेकवान होना तथा संवेदनशील होना ही है व्यवहार के लोक में।

मैं या मेरा समुदाय एक प्रकार से विशिष्ट है,क्योंकि अपनी उस धरा से निष्कासित है,जो हमारी है और जिसके हम हैं।कारण है धर्म।

यह अत्यंत विभीषिकास्पद है कि ,धर्म और धरा जो हमें धारण किए होते हैं, जिनमें हमारा धृत्तित्व है,हम इन दोनों से च्युत हैं |विलग हैं ।हम दोनों सेबेदखल हैं।एक से विलग दूसरे के कारण।कितनी करुण दशा है।

राजनीतिक दृष्टि से हम भले ही तीव्रेच्छा से धरा के लिए कुछ उठा न रख रहे हों,किंतु हम अपनी उस धरा जिसे धर्म कहते है के धरात्व या धृत्तित्व को बेहद हल्के में ले रहे हैं।उसका अनुसंधान करने में कहीं चूक गए हैं।

विडम्बना है कि हम अपने इस धरात्व के बारे में कम जानते हैं।हम शिव स्वातंत्र्य के बारे में कम जानते हैं,तथा अपने शिवत्व के बारे में कम जानते हैं परिणामत: हम एक नौका में सवार नहीं;हम एक सूत्र में बँधे नहीं।

हमारा सारा सामाजिक ताना बाना बेहद छिन्न भिन्न है,तिस पर भारत राज्य जिसने अपने संविधान में सेक्युलर शब्द को शत्रु-सहायक बीज-मंत्र की तरह रख दिया है तथा धरा से धर्म का संतुलन हटा दिया है।ऐसे में हमारे जीवन से इस्लामीजिहाद का त्रास रुक नहीं पा रहा। और अब तो हम शेष देश के लिए चिंतित हैं।

जब धरा से धर्म का पहिया निकाला गया,तब हमारी संवित प्रकाश का रुकना तथा भविष्य हीनता का भय है।हमारा समय की गतिमान गाड़ी से उतर ,गिर तितर बितर और लावारिस हो जाना अवश्यंभावी परिणाम है।

मोक्ष? मोक्ष किसका?पूरे जन गण का ।श्रीतंत्रालोक के प्रकाश पुंज में से होकर गुज़रने की तीव्रेच्छा का कारण।मोक्ष उस धरा का भी जिसका प्राण वह आदिधर्म है जिसकी हत्या धीरे धीरे की जाती रही । हम “माता भूमि पुत्रो अहं पृथिव्यां……” के पद/ कर्तव्य से विमुख होते गए।

हमारी इच्छाएँ बँट गईं।परिणामत: इच्छाहीनता व्याप गई।महामाहेश्वर श्री तंत्रालोक में कहते हैं -इच्छा से योग्यता का संवर्धन होता है।इच्छा का घटित होना शिवानुग्रह है।इच्छा के एक्य से वह घटित हो सकता है तथा संवित्ति में सामूहिक प्रवेश का आस्वादन भी तत्क्षण घटित हो सकता है।

इस छिन्न भिन्न जीवन में यह जानना हमारे लिए प्रथम ध्येय है कि ऐसा क्यों हुआ तथा जिस के कारण हुआ कहीं उसी में इस का उतर भी तो नहीं छिपा है।चलो धर्म का अनुसंधान करें! उस के धरात्व के उपकरणों की खोजबीन करें।वह क्यों हमें धारण करने में चूका या हम उसको धारण करने में कहीं चूके हों।

हमें एक त्रिक समझना है-संविति,प्राण और विश्वास।संविति के इस अकाट्य,विराट,अद्वय,अविभाज्य चैतन्य की परिणति है प्राण।प्राण शरीर में संवित्ति है।फिर ये दोनों सम्मुख हैं।इनके बीचवाले संबंध सूत्र है विश्वास।गहन विश्वास।यह गहन विश्वास ही दृष्टि है।शिव दृष्टि।

श्रीतंत्रालोक इस दृष्टि को गहन कर शिव दृष्टि का आलोक हम में भर देता है हम अपने जीवन में स्वयं को ढूंढ लेते हैं।तथा अपनी संवित्तप्राप्ति कर लेते हैं।संवित्त हीप्राण रूप में आती है–प्राक् संवित प्राणे परिणत:।”फिर दोनों के औन्मुख्य में प्राण जिस प्रकाश से देखता है वही विमर्श है।दोनों के अभिन्नता का जो बोध कराएगा वह बोध का प्रकाश ही विश्वास है।

अत्यंत महत्वपूर्ण आहनीक है पैंतीसवां आहनीक।इसमें समाजशास्त्रीय दृष्टि से शैवागम के अनुसार लोक एवं शास्त्र पर प्रकाश डाला गया है।यहाँ महामाहेश्वर लोक और शास्त्र की बात करते हुए कहते हैं—प्रसिद्धिरागमो लोके….”अर्थात लोक में प्रसिद्धि को ही आगम कहते हैं।–प्रसिद्धिमनुसंधाय सेव आगमुच्यते” अर्थात् मनुष्य का लौकिक जीवन व्यवहार पर निर्भर करता है,और व्यवहार की पद्धति एक दो दिन में नहीं बनती।

इसके बनने,इसके सामाजिक समरस बनने में सदियों का समय लगता है।इसमें कुछ विशिष्ट व्यवहार प्रसिद्धि का रूप लेते हैं।ये कभी टूटते नहीं।शाश्वत हो जाते है और प्रसिद्ध अर्थात्त् विशेष रूप से गतिशील रहते हैं परम्परा से निरंतरता की अजस्रता में गतिशील रहते हुए आते हैं और अंत तक गमनशील रहते हैं।अनुन्मीलित रहते हैं।

प्रश्नकर्ता फिर भी संतुष्टनहीं।तिस पर उसे पुन: कहा जाता है”अपश्यन्कार्यमन्वेति विना व्याख्या तृभिजन:” यानी एक अदृष्ट घटित हुआ।फिर उसका अदर्शन हुआ।घटित होते हुए उससे कुछ कार्य अन्वित हुए।जैसे हम १९ जनवरी १९९० का त्रासदायी दिन लें।

यह स्मृति हमें इसे बार बार स्मरण कराने,करने के दायित्व भर देती है,जब तक कि इस का अंत पुनर्प्राप्ति के साथ न हो।न इसमें ख्याति की न अख्याति की अपेक्षा होती रहती है।जनता अपना काम कर लेती है।व्यवहार अन्वित होता है।
व्यवहार प्रसिद्धि के आधार पर होते हैं।इस में यदि स्वायत्तता बरती जाएगी तो अनर्थ होगा।ऐसा करने पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

श्रीतंत्रालोक पढ़ने पर हम स्वयं को जान लेते हैं ।हम यह भी जानते हैं कि हमारी बहुत सी रीतियाँ ,बहुत से विश्वास आगमिक हैं।बहुत से पर्व जिनके स्रोतों की जानकारी ,
विश्वस्नीय रूप से हमें मिलती है।किसी के लिए व्रत,किसी अन्य का व्रत ,रहस्यमय अन्तरण जिनकी हम कल्पना तो करते हैं किंतु सोचते हैं कि ऐस संभवत: संभव न हो।इसमें यह भी कहा गया है कि हम अपने उन असंबंधी बाँधवों के मोक्ष का उपाय कर सकते हैं,जो अपमृत्यु को प्राप्त हुए हों।

ऐसे में पनुन कश्मीर द्वारा सम्पन्न महाश्राद्ध को हम एक आगमिक राजनीतिक अनुष्ठान कह सकते हैं।इक्कीसवें आह्नीक में श्राद्धों का विशद वर्णन कर महामाहेश्वर हमें समझाते हैं कि मृतक की आत्मा का सम्मान तथा उसके मोक्ष का उपाय कैसे करना चाहिए।

यह विवरण पढ़ कर आपको संविद्प्रवेश की सी अनुभूति होगी।ऐसे में जीवन की व्यवहार दृष्टि से शैवागम का अनुसंधान एवं स्वाध्याय हमें इस बात का बोध कराएगा कि हम बहुत कुछ प्रसिद्धि के अनुसार बराबर कर रहे हैं किंतु उसमें हमारा विश्वास का सूत्र कहीं जीर्ण हुआ है।इस जीर्णता का कारण हमारे सामाजिक जीवन में विच्छिन्नता है।इस विश्वास को पुनर्जीवित कर अपने जीवन में आनंदभरना हमारा कर्तव्य है।

मनुष्य जन्म लेता है।उसमें दो महत्वपूर्ण बातें घटित होती हैं।एक कि वह यहाँ सदा से था दूसरा कि वह यहाँ बना रहेगा ।पहले का कारण प्राग्वासना एवं दूसरे का कारण मायावरण है।यानी अचेत में वह स्वयं को संविति मानता है तथा अचेत रूप से वह स्वयं को स्वतंत्र मानते हुए अपने आवरण को पहचान नहीं पाता।ज्यों ही बोध के प्रकाश की प्रथम किरण उसमें पड़ती है वह इन दोनों का अनुसंधान करता है।यही स्वामर्श है।यहीहै प्रसिद्धि पौर्वकालिकी ।

यह प्राग्वासना क्या है?बालक जन्म लेते ही माँ का स्तन मुँह में लेता है ,दूध पीता है।यही विमर्शमयी प्राग्वासना है।प्राग्वासना ही विमर्शरूप में उच्छलित होती है।सा सा प्रसिद्धि विगीतिका” इन्हें ही रीतियां कहते हैं ।
प्रश्न है कि ऐसा क्यों?

इसलिए कि जन में ,लोक में सभी सर्वज्ञ नहीं हो सकते हैं ,अत: सर्वज्ञ की परिकल्पना के बिना ही काम चलाना है।
तदविमर्श स्वभावों असर भैरव: परमेश्वरा”।

पारमेश्वरी वाक् की इन धाराओं का रहस्य लोक और शास्त्र उद्घाटित करते हैं।एक शिष्य पूछता है –प्राग्वासना में सिद्धि!यह कहाँ से आई?

उतर है-सिद्धिकहीं से आती नहीं ।विमर्शमयी पौर्वकालिकी वासना ही प्रसिद्धि कहलाती है।यही आगम का तात्विक रूप— है।और रीतियों पर शंकात्मक प्रश्न करने वाले को महामाहेश्वर अभिनवगुप्त शंकालु कहते हैं,जिज्ञासु नहीं।शंकालु अपनी शंका का विस्फोट करता है ।इसका ज्वलंत राजनीतिक उदाहरण इस समय ‘सबरीमाला’ है|

शंका का उदय अथवा रोपण विनाश का कारण बनता है।भगवद्गीता के शब्दों में -संशयात्मा विनश्यति।”अत: आगम में जब विश्वास टूटता है तो सब कुछ उलट जाता है।शंकया जायते ग्लानि शंकया विघ्न भाजनम्।१ अ।आगम की एक धारा मौखिक रूप से चलती है।यही परम्परा कहलाती है।

पैंतीसवा आह्नीक लोक और शास्त्र की विवेचना का आह्नीक है।लौकिके व्यवहारे हि सदृश्यौ बाल पण्डितौ।”१ अर्थात् लौकिकव्यवहार में बालक और प्रौढ़ समान है।इसके खण्डन में अनिश्चय का योग तथा निश्चय का अयोग है। क्योंकि शैवागम अर्थात् हमारी रीतियाँ सतत उदित तत्व है।इसको संवित्ति निहारती रहती है।

धर्मेकेन देवेशि बद्धं ज्ञान हि लौकिकम्।”२ लोक बुद्धि और भावना के आधार परसंचालित होता है।अब प्रश्न है कि लोक में धर्म का विपरीतत्व कैसे जड़ पकड़ता है।तो महामाहेश्वर का कथन देखिए और देखिए यह कथन
आज के संदर्भ में कितना सटीक है ,प्रासंगिक है कि” विभिन्न मेधावी विद्वज्जनों के द्वारा प्रणयन से और परस्पर विरुद्ध अर्थों के प्रतिपादन से लोक मुग्ध हो उठता है–जनों भ्रामयति मोहित:”।

सैंतीसवें आह्नीक में महामाहेश्वर भाव सिक्त कवि हो उठे हैं।वेद इत्यादि को अधर शास्त्र कहा है तथा शैवागम को परिपूर्ण कहा है।

श्रीतंत्रालोक के स्वाध्याय में आपके भीतर बहुत कुछ स्वयमेव घटित होगा।आपका द्विजत्व घटित होगा।आप वह नहीं रहेंगे जो आप इससे पूर्व थे।कहीं आपको यह भी लगेगा कि आप भी अनायास ही एक साधक हैं।आप की साधना में क्या त्रुटियाँ और परिष्कार है,सब पता चलेगा।आप को सुखमय आश्चर्य से भर देगा यह विस्मयकारी ग्रंथ।।

मेरे विचार से यह ग्रंथ हर गृहिणी को पढ़ना चाहिए,वह जान जाएगी वास्तव में सृष्टि सारी उसी पर टिकी है।शिव का शिवत्व उसी के माध्यम से उल्लसित है।आज की स्त्री विमर्श की ध्वजारोही ललनाओं के लिए यह ग्रंथ एक समाधान है,क्योंकि स्त्रीत्व की बात करते हुए वे अपनी ही कितनी परोक्ष अवज्ञा करती हैं,उन्हें इसका अवभास नहीं ।विशेषकर देह के संविद्मय वैशिष्ट्य को लेकर।

उन्नतीसवें आह्नीक जिसपर अनेक स्वतंत्र पुस्तकें लिखी गई हैं,जिसको पढ़ने की उत्कंठा सभी में रहती है के विषय में इस पुस्तक के ईश्वरस्वरूप व्याख्याता अथवा तो भाष्यकार श्री परमहंस मिश्र ‘मिश्र’कहते हैं”स्त्री-पुरुष का यह भाव समाज में प्रचार के योग्य है।विवाह के पूर्व वर-वधू को इस शास्त्रीय रहस्य की जानकारी रहने पर सामाजिकता का स्वरूप बदल सकता है।”

तथा ऐसा करने से योगिनी-भू अवतरितहोने की संभावनाएँ बढ़ेंगी।यही विश्व का सर्वोच्च यज्ञ है।यहाँ संवित्ति समावेश पूर्ण होता है।

इस पुस्तक को अधिकाधिक पढ़ें हम ।इसमें जिस केंद्रीय ग्रंथ का समानांतर्य है वे मालिनी विजयोतर अथवा श्रीपूर्वशास्त्र,स्वच्छंदतंत्र ,तंत्रसार ,शिवसूत्र,विज्ञानभैरव आदि के साथ श्रीमद्भगवद्गीता जो आधुनिकतम एवम् उतना ही सनातनहै ।

सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तक है,इसके साहचर्य से महामाहेश्वर की सभी बातों कोसमझने में सहायता मिलती है।जैसे कहा’स्वाध्याय तप आर्जवम।

महामाहेश्वर कहते हैं कि स्वाध्याय जीवन का वास्तविक कर्म है और यहाँ तक कि आप तीन संध्याओं में से भले एक ब्रहममूहुर्त की संध्या करो शेष दो संध्याओं का समय आप स्वाध्याय करो ।स्वाध्याय स्वयं में निर्विकल्प समाधि की तरह है।

क्योंकि स्वाध्याय एक ऐसा त्रिक निर्मित करता है कि आप रहस्यों का सत्य जान लेते हैं ।सत्य की गहनता के सूत्र आपके हाथ लगते हैं आप परम तत्व की झलक पा लेते हैं ।

आप संविति में प्रवेश पा लेते हैं।उक्ति भी है कि “जो जिसको जान लेता है ,वह उससे मुक्त होता है।”इससे भावनामय ज्ञान आता है और इदम् ज्ञानम् उपाश्रित्य मम् साधर्म्यम् आगत:।” अत: ज्ञानम् भावनमयं उत्तमम्,”।अत: ऐसा ज्ञान ही आपकी दीक्षा है।इस गुरु विहीन समय में आपको गुरू अपने भीतर से उपजाना है और वह स्वाध्याय से ही संभव है।

तंत्र में गोपनीयता एवं उद्घाटनीयता का द्वंद्व चलता ही रहता है।जहाँ तक मेरी समझमें आया ललद्यद ने श्रीत्त्ंत्रालोक का विशद पारायण किया होगा,बहुत स्थलों पर उनके वाक्यों का प्रतिबिम्ब और प्रतिध्वनि स्पष्ट हैं।आप पढ़कर स्वयं जान जाएँगे।जैसे ‘ऊषरे कृषि न कुर्यात्’का सीधाऔर सुंदर अनुवाद किया
है ललद्यद ने,’स्यकिशाठस ब्योल नो वविजे……. सुंदर बोधगम्य अनुवाद।

छब्बीसवें आह्नीक में महामाहेश्वर कहते हैं कि शैव साधकों में आश्चर्यचकित कर देने वाला वैचित्र्य होता है।’यह उनकी क्रिया गुप्ति होती है।

इस विलक्षण पुस्तक को समूहों में पढ़ना चाहिए,चूँकि महामाहेश्वर कहते हैं कि अवश्यंभावी सत्ता का प्रतीक भी कर्म होता है ,अत: शत्रुमुक्ति के यज्ञ के प्रसंग में इंद्रयस्फुरण घटित होता है कि आप शत्रु उच्छेद के इस उपाय को अपना महती कर्म मान कर इसे सामाजिक प्रसार देने की इच्छा से भर जाते हैं।

श्रीमद्भदवद्गीता में भी भगवान अर्जुन को कर्म करने को उद्यत करते हैं ।वह कर्म क्या है?वह तो युद्ध है।शत्रु- उच्छेद है।वही मोक्ष है।

महामाहेश्वर अभिनव गुप्त ज्ञान को ही मुक्ति कहते हैं ,श्रेष्ठतम कहते हैं।वह कहते है ज्ञानवान व्यक्ति देश और राष्ट्र को पवित्र बना देता है।वह राष्ट्र धन्य है जहाँ ज्ञानी पुरुष अवतरित होते हैं।सत्ताईसवें आह्नीक में महामाहेश्वर कहते हैं ,”शत्रुच्छेद की पूजा हमें अस्त्र-शस्त्र में करनी चाहिए,” मुझे लगता है हमें महामाहेश्वर श्री अभिनवगुप्त के इस महत्त्वपूर्ण संकेत को पकड़ना चाहिए और तदनुसार क्रियान्वित करना अनिवार्य मानना चाहिए।

“शत्रुच्छेदादिकर्तार: काम्योअ् बड़े ध्यान से देखने की आवश्यकता हैं कि राम ने अंतत: शक्ति पूजा की आश्विन शुक्ल नवमी को एक अनुष्ठान किया,वही पूजा रावण ने की पर शिव की सहमति से वह खण्डित कर दी गई ।एक कालजयी विजय प्राप्त कर ली गई।तात्पर्य कि महामाहेश्वर हमें कुछ रहस्यों का पता देते हैं ।

हम शत्रु के मारे लोग हैं।सबसे बड़ी बात कि शैवागमानुसार मोक्ष किसी अकेले का नहीं होता ,मोक्ष लोक सहित होता है।और इस विधि के बेहद बोधगम्य संकेत हैं इसमें,जो हमारे अायुद्ध हैं।

महामाहेश्वर कहते हैं अपने सम्मानित होने पर,चाहे आप राज्य द्वारा सम्मानित हुए हों,अथवा समाज द्वारा। इसलिए कि यह संविद्सम्मान है।आप उत्सव मनाएँ ।गुरुनिर्वाण परहर्षोल्लास मनाना चाहिए क्योंकि इसे शिवैक्य दिवस कहते हैं।तथा अपना जन्मदिन मनाना चाहिए क्योंकि इस दिन त्रिक घटित हुए होते हैं ,वह है आनंद,मूर्ति एवम् प्रकाश।

महामाहेश्वर विशेष रूप से आनन्द भैरव के उपासक हैं,आनंद भैरवी तां विमर्शरूपमहं वंदे |तथा वे कहते हैं कि “विश्वमेधमययज्ञ याजिन:” मैं तो विश्वमेध करने वाला याज्ञिक हूँ।

हम कितने योगों के विषय में सुनते हैं,जानते हैं,महामाहेश्वर ‘महासाहसयोग की बात करते हैं।
“जगतजाल को,शत्रु को जलाने की किरणें इस शैव साधना में हैं। जो लोग कश्मीर को भारत का स्थल नहीं मानते,उनको पढ़ना चाहिए सैंतीसवें आह्नीक में अंकित वर्णन तथा भुवन अध्वा अर्थात् आह्नीक आठ में वर्णित “महाकाल जैसे करोड़ों रुद्रों का यह देश गंगा सदृश्य पवित्र नदियों का यह नितांत पवित्र देश है।यहाँ जन्म प्राप्त करना अत्यंत महत्व पूर्ण है।

बड़े पुण्य से ही यहाँ जन्म मिलता है।अन्य देशों में पशुवत प्रवृत्ति और उसके परिणाम होते है।

“इष्टापूरतरता देवि ये नीरा:पुण्य भारते,त्र्यंबकं सकृतर्चन्ति मेरुं गछंति ते नरा:।”भारते चतुर्युगम्”कश्मीर का वर्णन कर कहते हैं”ललितादित्य शासित शांत सुव्यवस्थित कश्मीर राज्य में स्थान स्थान पर मननशील मुनियों के आश्रम थे।

एक तरफ़ भगवान चंद्रचूड़ की लीलास्थली का प्रतीक थी,तो दूसरी ओर पावन ऋषियों की तपस्थली भी थी।तपस्थली तो स्थान स्थान पर थी पर चंद्रचूड़
प्रतिपद अध्यासीन थे।अत: छोटी मोटी सिद्धियों की ही नहीं अपितु सम्यक् रूप से अभिलषित
अशेष अर्थात संपूर्ण सिद्धियों को प्रदान करे वाला कश्मीर से बढ़कर कोई स्थान इस ब्रह्माण्ड मण्डल में नहीं।२ 
तथा महामाहेश्वर माता शारदा के अनन्य भक्त हैं,कहते हैं ,- यंत्र स्वयं शारदचन्द्रशुभ्रा,श्री शारदेति
प्रथिता जनेषु”।

कि कश्मीर में माता शारदा का विग्रह विद्यमान है,तथा समाज में उसकी बड़ी मान्यता थी।”शांडिल्य सेवारस सुप्रसन्ना,सर्व जने स्वैभिवैयुनक्ति”
माँ शारदा की सेवा में शाण्डिल्य गोत्रीय विप्रवर का व्यक्ति नियुक्त था हमने अपने इस सम्मेलन से संबंधित पुस्तिका में बताया है वह प्रसंग जहाँ महामाहेश्वर योग एवम् ध्यान के पीठों की स्थापना का निर्देश दिया है।

पीठ का अर्थ वह समूह बताते हैं।तथा यह भी स्पष्ट करते हैं कि बंधु!मोक्ष तुम को व्यक्तिगत रूप से नहीं मिलेगा ,वह समूह या पूरे समुदाय के साथ ही संभव है।अत: हमें विमर्श करना है कि कैसे और किस मोक्ष का वरण करना है,क्यों कि सातवें निष्कासन तक हमें अपने भैरवी विचार “पनुन कश्मीर” की उपलब्धि हुई,एक परभैरव समूह के प्राकट्य से,और सामूहिक मोक्ष अपनी धर्ममयी धरा पर राजनीतिक क्रियागुप्ति से संभव बनाना हमारा लक्ष्य है।

तब हम भी गाएँगे “नृत्यति, गायति,हृषति गाढ़ं,संविदियम् मम् भैरवनाथ।

(क्षमा कौल)

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