समय रथ

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एक सामान्य कद काठी की वयोवृद्ध स्त्री अपने परिजनों के द्वारा तिरस्कृत होते हुए भी हर दीन दुखी की सेवा करती । भिक्षाटन द्वारा अर्जित अन्न वस्त्र से उनकी क्षुधा शांत करती और उनके तन ढकती ।

धीरे धीरे वृद्धा की ख्याति फैलते फैलते देश के राजा तक पहुँची। राजा ने वृद्धा को सम्मानित करने के लिए दरबार में बुलाया पर वह न गई । संदेश भेजा कि एक संस्कार हीन राज़ प्रमुख मुझे क्या सम्मानित करेगा। राजा को वृद्धा पर बहुत क्रोध आया। अपना अपमान समझ कर राजा ने उसको अपने राज्य से निकाल दिया। कालांतर में राजा ने अपने उत्तराधिकारी को राज्य सौंप दिया।

उसका पुत्र भी शायद इस प्रतीक्षा में ही था। उसने भी आनन फानन में पिता को तीर्थ यात्रा पर भेजने की योजना बनाई । राजा के सेवक रथ पर बैठा कर तीर्थ यात्रा के लिए चल दिए । राज्य की सीमा आने पर उन्होंने राजा को रथ से नीचे उतार दिया और नये राजा का आदेश सुनाया।
“हे राजन!अब आप का राज्य में प्रवेश वर्जित है।राजाज्ञा का उलंघन करने पर आपको कारागार में डाल दिया जायेगा ”
मरता क्या न करता ।

पुत्र द्वारा निर्वासित राजा मायूस हो कर पास ही बनी एक झोंपड़ी की तरफ बढ़ गया जहां से धुआं उठ रहा था । भोजन की सुगंध उसके नथुनों में प्रवेश कर रही थी।ये उसी वृद्धा की झोंपड़ी थी जिसे राजा ने अपने राज्य की सीमा से बाहर निकाल दिया था । झोंपड़ी के द्वार पर पहुंच कर राजा ने पुकारा –
,”कोई है , मैं राहगीर हूँ शरण का अभिलाषी हूँ।”

“अंदर आजाओ।

राजा अंदर जा कर आश्चर्यचकित रह गया।

उसका अपना बेटा सुयश ,जो अब राज प्रमुख था, वृद्धा के चरण पखार रहा था और महिला उसे वात्सल्य मय दृष्टि से निहार रही थी। अब उसने गौर से वृद्धा की ओर देखा। ये स्त्री और कोई नहीं स्वयं उस निर्वासित राज पुरुष की अपनी माँ और राजा सुयश की पूज्य दादी थी । अब उसकी आँखों से धुंध छंट चुकी थी। वह निढाल हो कर अपनी माँ के चरणों पर गिर पड़ा । समय रथ घूम कर वापस वहीं आ गया था।

-लता यादव
30-09-2018
(कैलीफोर्निया)

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