हमारी अधूरी कहानी

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 ” हैलो …”           

” हाँ  , संजीव बोलो । 

” अरे ! किसी सुमित नाम के लड़के का फोन आया था मेरे पास । ….मैंने कह दिया ” अभी मैं आफिस में हूँ ” । ….”सुनो तुम्हारा नंबर दे दिया है ”    

” कौन सुमित  ? , मैंने आश्चर्यमिश्रित भाव से कहा।           

” कह रहा था , वो तुम्हारे , बचपन का दोस्त है… क्यों , नाम सुनकर अच्छा नहीं लगा ? ”   

“इसमें अच्छा लगने वाली कौन सी बात है । इतने सालों बाद उसका , फोन करना …. अच्छा नंबर कहाँ से मिले उसे , कुछ बताया क्या उसने । “

     ” हाँ , कह रहा था , तुम्हारे भाई से मेरे नंबर लिये उसने । संजीव के फोन रखते ही मैं विचारों के भँवर में जैसे खो सी गयी । जीवन के सुनहरे पल कब बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता । 

” अरे ! छोड़ मेरी चुटिया ….छोड़ता है कि नहीं ”            

” नहीं , पहले बता मेरे कंचे तुमने क्यों फेंके ।”     

” ठहर , तू    , बाबू जी से तेरी शिकायत लगाती हूँ ”        

” क्या , हो रहा है ? …क्यूँ उसको रूला रहा है “सुमित “

बाबू जी की आवाज सुनते ही सुमित रूक गया ।   ” बाबू जी  ! इसने मेरी चिकोटी भी काटी , और चोटी खींच कर कह रहा है .। …भीलनी , तू भीलनी है । ” 

 “चाचाजी , ! ये भीलनी बहुत बेईमान है ,..हारने लगती है तो  …मेरे सारे कंचे फेंक देती है ।…अब मैं किससे खेलूँ ?” 

” पर तुम उसके कंचे क्यों फेंकती हो , ?          “

”वो, वो बाबू जी , ये मुझे काली कलूटी , बैंगन लूटी कहकर चिढ़ाता है ।”

“अच्छा , रोना धोना बंद करो , जाओ अब से नहीं कहेगा … क्यों रे ! तू अब से नहीं कहेगा ना ” 

” ना , कहूंगा , पर वो मेरे कंचे ना फेंके ” 

” बेईमानी भी खुद करे , मेरी शिकायत भी करे ”     

” हाँ , ये बात भी सही है ।….मुस्कुराते हुए बाबू जी ने कहा । 


इन्हीं शरारतों के बीच हम कब बड़े हो गये , पता ही नहीं चला । हम दोनों ने एक ही युनिवर्सिटी में दाखिला लिया । उसने पत्रकारिता में एडमिशन लिया और मैं दर्शन शास्त्र में स्नातक करने लगी ।

 समय निर्बाध गति से आगे बढ़ने लगा । बाबू जी ने उसी गली में दो मकान छोड़कर एक बड़ा मकान ले लिया ।  उनका कहना था – ” बच्चे अब बड़े हो रहे हैं अब हमें बड़े घर की आवश्यकता पड़ सकती है । “

” तुम्हें याद है , तुम मुझे देखने के बहाने । ..मेरी खिड़की के नीचे से जाया करते थे । ” …..तुम्हें मैंने एक बार फटकार लगाई थी ”  क्या ताँक झाँक करते रहते हो , कभी कोई लड़की नहीं देखी क्या ?”

और तुम सकपका गये थे । कई दिनों तक तुम गुजरे नहीं उस रास्ते से । फिर एक दिन मैंने ही रोका।   

” बुरा मान गये क्या? …..तुम समझ नहीं पा रहे थे मेरा व्यवहार । तुमने कहा ” एक तरफ तो तुम मुझे दूर कर रही हो , और दूसरी तरफ मेरे दूर रहने पर तुम्हें दिक्कत भी है ।” 

तुम अक्सर गली के मोड़ पर बैठे रहते मुझे देखने को और जब मैं उधर से गुजरती तो मुझे लगता कि तुम मुस्कुरा रहे हो ..जबकि मैंने कभी मुस्कान नहीं देखी तुम्हारे चेहरे पर ।              

समय बीतता रहा , मैं मजबूरन तुमसे दूर होती लगी ।  …..वो दिन भूलाए नहीं भूलते , जब मैं कहती ” देखना एक दिन मैं शादी करके चली जाऊँगी , तब तुम मेरे लिए कितना रोओगे । .” ..तुम्हारा वही अल्हड़ सा जवाब  होता …” भीलनी , तूझसे शादी कौन करेगा , कोई भी नहीं  ! “.. 

बाबूजी मेरे लिए लड़का देख रहे थे , “…..मैं चाह रही थी कि तुम्हारी भी पढ़ाई पूरी हो गयी है और अब समय आ गया है कि तुम आगे बढ़कर बाबूजी से मेरा हाथ माँगो …..हो सकता है बाबूजी मान जाएँ …..और मैं तुम्हारी, तुम मेरे हो जाओ।

लेकिन मेरे चाहने से क्या होता । ….मेरी शादी तय हो गयी। घर में चहल कदमी हो रही थी ” ….माँ , दीदी से कह रही थी , ” जल्दी तैयार करो , सब पहुँचने ही वाले हैं .। …..सभी कह रहे थे , तैयार करने से इसका चेहरा कितना खिल उठा है ।  माँ ने मुझे नजर भर कर देखा।  ” मेरी बेटी को किसी की नजर ना लगे , कितनी सुंदर लग रही है , इसका चेहरा कितना दमक रहा है “। .

” मुझे लेकर बाहर जाने को मुड़े ही थे कि तुम फूलों  का हार लिए हुए  लिए हुए कमरे में आए ,  पुरानी दोस्ती थी दोनों परिवारों में इसलिए बाबूजी ने तुम्हें भी काम सौंप दिए थे । ”  मुझ पर नजर पड़ते ही तुम पलक झपकाना भी भूल गये थे , मैंने अपनी नजरें झुका ली …..उधर सभी पूछ रहे थे सुमित फूलों का हार  लेकर आया क्या , उधर पूरी व्ववस्था हो गयी ना ।….. बारात बस आती होगी ।

बारात का नाम सुनते ही ” तुम धम्म से वहीं बैठ गये …जैसे किसी ने धरातल पर पटक दिया हो । ….सभी उधर  ” सुमित , सुमित सभी तुम्हें ही आवाजें लगा रहे थे । …” जी , चाचीजी , सब काम हो गया । 

” मेरी शादी हो गयी , …विदाई के समय … मेरे लिए रुलाई रोकना असंभव हो गया था । ….मैंने नजरें घुमायी तो देखा दीवार  से छुपकर तुम भी रो रहे थे । ”  …..काश ! तुम रोक लेते मुझे । तुमने मुझे समझा ही कब था । “

आज भी भूले कहाँ कुछ , वो सभी पल जो हमने साथ बिताए थे । …..कुछ तो तुम्हें भी याद होगा । …..जाने कितनी बातें मन में घुमड़तीं हैं और आँखों के रास्ते बह जाती हैं ।  काश ! बिना कहे ही सब कुछ सुन लिया होता तुमने …..

(तनुजा दत्ता) 

2 COMMENTS

  1. हृदय में दबे प्रेम के सत्य को मार्मिक ढ़ंग से प्रस्तुत किया । अधूरे प्रेम का दंश ताउम्र दर्द देता रहता है ।

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