हां अब मैं भी समझदार हो गई!

(सीमा जैन)

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जब से हिमानी ने फोन पर बताया था उसने दोबारा शादी करने का निर्णय ले लिया है मेरा तो दिमाग खराब हो गया। पागल हो गई है यह लड़की, पहली गलती से कोई सबक नहीं लिया ।बिना सोचे समझे फिर वही बेवकूफी करने जा रही है। एक बार मुझ से मिलवा तो देती ,अपने आप ही निर्णय ले लिया। आनन-फानन में बेंगलुरु की टिकट बुक कराई और हवाई जहाज पर सवार हो गई।
दो बच्चों में हिमानी हमेशा मेरे लिए चिंता का कारण रही है ।बहुत भावुक है ,बिना सोचे समझे कुछ भी कर जाती है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी, चौथे साल की शुरुआत में ही अपने से एक साल बड़े कमल के इश्क में ऐसी दीवानी हुई पढ़ाई छोड़ कर उसके साथ शादी कर कोलकाता चली गई। कमल मुझे कुछ ठीक नहीं लगा था ,लेकिन बेटी की पसंद स्वीकार कर लेती अगर वह अपनी पढ़ाई पूरी करके जाती । हम दोनों के मुंह के बोल खत्म हो गए। कोर्ट में शादी करके वह मुझसे बिना बोले चली गई । मां थी कई बार फोन किया लेकिन कोई संपर्क नहीं हुआ। एक साल हो गया था कोई खोज खबर नहीं मिली तो बेटे को लेकर पहुंच गई ।किसी पुरानी सहेली से पता लेकर उसके घर पहुंची तो बेटी को देख हैरान रह गई। आधा वजन रह गया था ,बीमार लग रही थी, शरीर पर चोटों के निशान थे। वह बहादुरी का नाटक कर रही थी, आंसू टपकने नहीं दिए लेकिन मैं उसकी हालत देख फूट-फूट कर रो पड़ी।
पति का साया जल्दी उठ गया था इसलिए अपनी परवरिश का दोष लग रहा था ।अपने भविष्य की चिंता नहीं की, गलत इंसान का चयन किया और अत्याचार भी सहन कर रही थी। लगा बेटी नहीं मैं हार गई ,अपनी मां पर इतना विश्वास नहीं था उसको। गलती मेरी भी थी, पहले ही खोज खबर क्यों नहीं ली बच्ची की। इतना अत्याचार सहने से बचा लेती या हो सकता है शुरू से नजर रखती तो स्थिति इतनी बिगड़ती नहीं। उसको तुरंत दिल्ली ले आई ,मनोबल बढ़ाया, कमल से तलाक दिलवाया और दोबारा पढ़ाई पूरी करवाई। नौकरी लग गई ,एक साल मेरे पास रही, फिर बेंगलुरु तबादला हो गया। भारी मन से भेजा, कब तक अपने पल्लू से बांधकर रखती ।
बगल वाली सीट पर बैठी महिला कुछ बोल रही थी ,लेकिन मेरा ध्यान हिमानी में पड़ा था ।उसने हल्के से हाथ पर स्पर्श करते हुए कहा,” लगता है कुछ गहन चिंता में हो।”
मैंने चौक कर देखा उस महिला की तरफ तो आत्मीयता नजर आई। मैंने ठंडी सांस भरते हुए कहा,”हां बस कुछ ना कुछ दिमाग में चिंता लगी रहती है ।”
वह मुस्कुराते हुए बोली ,”मत किया करो इतनी चिंता ,जब अपने हाथ में कुछ है ही नहीं तो बेकार परेशान होने से क्या लाभ?”
मुझे गुस्सा आ गया ह,कोई उपदेश देने के लिए बैठा रहता है। मैंने तल्खी से कहा ,”कहना बहुत आसान है, अपने बच्चों को एक तरफ खड़े होकर गलती करते देखना बहुत मुश्किल है।”
वह शांत स्वर में बोली,” हां लेकिन मां-बाप के पास समझाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता। फिर उनके कर्मों को उनकी नियति मानकर अपने आप को समझाना पड़ता है।”
उसके बोलने के अंदाज से ऐसा नहीं लग रहा था वह उपदेश दे रही है, बल्कि स्वयं अपनी आप बीती सुना रही थी। मैंने धीमे से पूछा,” लगता है आपने भी कुछ अनुभव किया है इस तरह का।”
अतीत में खोई हुई सी बोली,” हां एक ही पुत्री थी हमारी जान उसमें अटकी रहती थी ,लेकिन वह स्वयं अपनी जिंदगी को लेकर बेफिक्र थी ।बहुत तेज गाड़ी चलाने का शौक था। कितना समझाती थी नहीं मानती थी। शादी के तीन साल बाद ही एक दुर्घटना का शिकार हो गई । कमर से नीचे का हिस्सा बेकार हो गया। हम दोनों पति-पत्नी तो मां-बाप थे बहुत कोशिश की उसका मनोबल बढ़ाने की। हमारे दामाद जयंत में भी कोई कसर नहीं छोड़ी ।पर हवा में उड़ने का शौक रखने वाली व्हीलचेयर से बंध कर जीने की विवशता को नहीं झेल पाई ,खुदकुशी कर ली ।”
वह चुप हो गई ,खिड़की से बाहर उड़ते हुए बादलों को देखने लगी। अपने आप को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी।
कुछ देर बाद मैंने कहा,” मुझे बहुत दुख हुआ आपकी आपबीती सुनकर।”
वह मेरे चेहरे को देखते हुए बोली,” यह स्वीकार करना कि वह हमारे बीच नहीं रही बहुत कठिन था, लेकिन उससे भी कठिन यह स्वीकार करना था कि हम इससे अधिक और कुछ नहीं कर सकते थे उसके लिए। बेटी के जाने के बाद जयंत हमारे साथ ही रहने लगा ।बिल्कुल बेटे की तरह रहता था ।बहुत भला और अच्छा इंसान है ।अभी एक साल पहले बेंगलुरु शिफ्ट हुआ है। नई नौकरी नई जिंदगी शुरू करने के लिए, कब तक पुरानी यादों को ओढ़े रहेगा। उसी से मिलने जा रही हूं।”
मेरी आंखें नम हो चुकी थी, धीरे से उसका हाथ दबाते हुए मैंने कहा,” बहुत हिम्मत वाली है आप।”
वह मुस्कुराते हुए बोली,” समय घाव भी भरता है और हिम्मत भी देता है। किसी लड़की से मिलवाना चाहता है।”
मुझे लगा उसने सचमुच समय के साथ जीना सीख लिया है। वरना कितना मुश्किल है अपनी पुत्री के स्थान पर किसी और स्त्री को देखना। हम फिर इधर उधर की बातों में मशगूल हो गए।
हवाई अड्डे पर मेरी निगाहें हिमानी को खोज रही थी तभी वह महिला भी मेरे पास आकर खड़ी हो गई । फिर एक बंदे की तरफ हाथ से इशारा करते हुए बोली ,”वह मेरा बेटा जयंत खड़ा है।”
उसके बगल में खड़ी लड़की पर निगाह गई तो वह हिमानी थी। मैंने उस महिला से मुस्कुराते हुए कहा,” जयंत के चक्कर में मुझे हिमानी मिल गई ।चलिए भगवान ने चाहा तो फिर मुलाकात होगी ।वैसे हम इतनी देर बात करते रहे लेकिन एक दूसरे का नाम तक पूछना भूल गए।”
वह हंसते हुए बोली,” भगवान चाहता है हम बार-बार मिले। हिमानी ही वह लड़की जिससे जयंत मुझे मिलना चाहता था। उसने फोटो भेजी थी मुझे ।”
तब तक दोनों बच्चे हमारे पास आ गए । जयंत नेअभिवादन में हाथ जोड़े और हिमानी मुझसे लिपट गई। कान में फुसफुसाते बोली ,”माम इस बार मैंने कोई गलती नहीं की । मैं समझदार हो गई हूं।”
उसे कसकर गले लगाते हुए मैं ने कहा,” हां अब मैं भी समझदार हो गई।”

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