हिन्दी ही ओढ़ती बिछाती हूँ

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अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष

हिन्दी ही ओढ़ती बिछाती हूँ मैं
माथे पर बिंदी हिन्दी की लगाती हूँ मैं !

स्वर-व्यंजन से सजकर और निखर आती हूँ मैं !
जिधर रुख़ करूँ हिन्दी से ही पहचानी जाती हूँ मैं !

सूरज की रश्मियां भी हिन्दी पर नर्तन करती हैं !
सागर की लहरियां भी हिन्दी का वंदन करती हैं !

यहां नीर ,पवन, मद्धम मद्धम हिन्दी स्वर में बहती हैं
यहां कोयल भी अमराई बागों के संदेशे हिंदी धुन में कहती है !

यहां हिन्दी रगों में बहती है
यहाँ हिन्दी दिलों में रहती है !

( रचना-शालिनी सिंह)

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