परी लोक

(लघु कथा)

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उस दिन शाम से मां के पेट में हल्का हल्का दर्द था जो रात आठ साढ़े आठ बजे तक बहुत तीव्र हो गया। उन्होंने मुझसे रुक्कम्मा के घर से सेंक करने वाली थैली लाने को कहा। एक तो इतनी रात ,दूसरे बादलों की गड़गड़ाहट , तीसरा मुझे रुक्कम्मा से बहुत डर लगता था। लेकिन क्या करती मां का ध्यान रखना बहुत आवश्यक था। मेरे अलावा उनका था ही कौन ।मां करहाते हुए बोली,” मैंने रुक्कम्मा को फोन कर दिया है, वह थैली सीढ़ी पर रख देगी। तुम घंटी मत बजाना, बस बाहर से उठाकर ले आना ।”मैंने टुनटुनिया को अपनी गोद में लिया और बाहर आ गई।

एक बार रुक्कम्मा को मैंने सुबह स्कूल जाते हुए कुत्तों के पीछे डंडा लेकर भागते हुए देखा था ।खुले घुंघराले बाल ,बदरंगा सा गाऊन और चीखती चिल्लाती रुक्कम्मा बिल्कुल चुड़ैल लग रही थी ।जैसे मोहल्ले वाले उनके बारे में कहते थे। उन्होंने घर में ही एक छोटी सी दुकान खोल रखी थी जहां मोहल्ले वालों को जरूरत का सामान मिलता था। लेकिन सबकी रुक्कम्मा से किसी ना किसी बात को लेकर कहासुनी हो जाती थी। सबको शिकायत थी कि रुक्कम्मा कुछ अधिक पैसे लगाती है सामान के। कोई यह बात बोल देता तो वह गुर्राकर बोलती,” चालीस रुपए बाजार आने जाने में खर्च कर दोगे लेकिन यहां दो रुपए ज्यादा देने में जान निकलती है। आइयो कोई सामान लेने ,तेरे पैर नहीं तोड़ दिए तो रूक्कम्मा नाम नहीं मेरा।”

लोग चुपचाप सामान ले लेते लेकिन जाते हुए अवश्य बडबडाते ,” चुड़ैल कहीं की।”
मुझे उन दिनों चुड़ैल जादूगर और परियों की कहानी सुनने का चस्का लगा हुआ था ।सनी की दादी के पास पिटारा था ।जितने चाव से सुनती थी उतना ही डरती थी बाद में। मां मेरे स्कूल में ही शिक्षिका थी लेकिन बड़ी कक्षा को पढ़ाती थी ‌इसलिए दो घंटे बाद आती थी ।अक्सर कहती थी स्कूल से आकर कोई परेशानी हो तो रुक्कम्मा के पास चली जाना‌। लेकिन मैं कभी रुक्कम्मा के पास अकेले जाने की हिम्मत नहीं कर पाई। जब भी गई रुक्कम्मा की दुकान पर मां के साथ जाती थी। वहां उनकी बिल्ली लिली मुझे बहुत प्यारी लगती ।

एक दिन लिली के पास चार पांच छोटे छोटे बिल्ली के बच्चे देख दंग रह गई, कोमल से गुदगुदे। मैं उन बच्चों को देख उत्साहित सी हो रही थी ,रुक्कम्मा मां का बताया सामान निकालते हुए बोली,” थोड़े बड़े हो जाए तो जो तुझे अच्छा लगे ले जाइयो।” मुझे विश्वास नहीं हुआ चुड़ैलें अच्छी भी हो सकती है क्या।

मुझे बेचैनी रहती कहीं रुक्कम्मा अपनी कही बात भूल ना जाए। लेकिन रुक्कम्मा ने मुझे एक मेरी पसंद का बिल्ली का बच्चा दे दिया। मैंने उसका नाम टुनटुनिया रखा। रुक्कम्मा के पड़ोस में अरविंद बाबा रहते थे। फौज से रिटायर हो चुके थे और क्योंकि मेरे पापा फोज में लड़ते हुए शहीद हुए थे अरविंद बाबा हमारे घर अक्सर आते थे । बिजली का बिल भरना ,कोई उपकरण ठीक करना, बाजार से कुछ सामान लाना, ऐसे काम वो अक्सर कर देते थे ।

मेरे पास टुनटुनिया को देख कर बोले ,”अरे बड़ी प्यारी बिल्ली है, तुझे इसके लिए एक टोकरी चाहिए हो तो मुझसे ले ले ।”

रुक्कम्मा की तरह उनका भी कोई नहीं था ,बिल्कुल अकेले रहते थे। वह अपने कमरे में टोकरी ढूंढ रहे थे। एक दरवाजे की तरफ इशारा कर मैंने पूछा ,यह दरवाजा कहां जाता है। वह हंसते हुए बोले,” यह दरवाजा मुझे मेरे परीलोक ले जाता है ।”

इससे पहले की मैं आश्चर्य से कुछ पूछ पाती उनके सारे दांत मुंह से निकल कर बाहर गिर गए। उन्होंने अपने दांत उठाकर एक कटोरे में रख दिए और बड़बड़ाने लगे ,”पता नहीं कैसा जबड़ा बनाया है एकदम ढीला है।”

मेरी तो घिग्घी बंध गई, तो ये जादूगर है अपने दांत पैने करने के लिए मुंह से निकाल लेते हैं। किसी तरह जान बचाकर मैं घर भाग गई।

मां ने मुझे पसीने से लथपथ आते हुए देखा तो पूछा क्या हुआ? मैंने बताया तो मां हंसते हुए बोली,” तू बुद्धू है, बड़ी उम्र में जब अपने दांत टूट जाते हैं तो डॉक्टर से नए दांत लगवाने पड़ते हैं, जो बाहर निकल जाते हैं ।”

मां को जादूगर चुड़ैलों के बारे में कुछ नहीं पता। मेरा पिछले महीने एक दांत टूटा था उसकी जगह दूसरा उग आया है। मैं अब अरविंद बाबा के सामने नहीं जाती। एक दिन मां के साथ रुक्कम्मा के यहां गई तो टुनटुनिया को देख उन्होंने पूछा ,”बड़ा सुंदर हो गया यह तो, क्या नाम रखा है इसका ?”
जैसे ही मैंने कहा टुनटुनिया ,तो वह मुंह बना कर बोली ऐं यह भी कोई नाम हुआ।” मैंने वहां भी जाना छोड़ दिया कहीं टुनटुनिया को वापस ना मांग ले।

और सोचो अब ऐसे मौसम में इतनी रात को मुझे रुक्कम्मा के घर जाना पड़ रहा है ।बगीचे के गेट को खोलकर में अंदर गई तो देखा सीढ़ियों पर बोतल रखी थी। मैं उसे जल्दी से उठाकर भागने ही वाली थी कि रुक्कम्मा और अरविंद बाबा के घर के बीच में बने कमरे से संगीत की आवाज आ रही थी और वहां की बत्ती जल रही थी। डर तो बहुत लग रहा था लेकिन जिज्ञासा भी हो रही थी।

मुझे पक्का यकीन था दोनों मिलकर किसी बच्चे को मेंढक या चूहा बना रहे होंगे ।खिड़की खुली हुई थी जरा सा पर्दा हटा कर मैंने झांका। अंदर रुक्कम्मा ने हल्के नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जुड़ा बनाकर उसमें फूल लगाकर बैठी मुस्कुरा रही थी ।अरविंद बाबा भी रुक्कम्मा को बड़े प्यार से देख मुस्कुरा रहे थे। टेबल पर खाना रखा हुआ था। मुझे उन दोनों को देख एक सुखद एहसास की अनुभूति हुई । तो यह था परी लोक।  

(सीमा जैन)

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